Wednesday, November 28, 2018

858-खोखला तन


खोखला तन
डॉ. सिम्मी भाटिया

खामोश आँखें
अनगिनत सवाल
बातें बेबात
कैसी उधेड़बुन
होती बेचैनी
करे वेदना
भूखा पेट
सूखे स्तन
देखे बचपन
रोता दिल
खोखला तन
बचाए कजरा
सूनी दुनिया
काँपते हाथ
सजाए गजरा
होता  तिमिर
सजे दुकान
देह -व्यापार ।
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8 comments:

  1. मार्मिक, कम शब्दों में सार्थक लिखा। बधाई।

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  2. बहुत ही उम्दा , बेहतरीन सृजन
    हार्दिक बधाई

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  3. क्या कहूँ ? हृदय को स्पर्श करती रचना....

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  4. मर्मस्पर्शी रचना ..हार्दिक बधाई |

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  5. हृदयस्पर्शी रचना. .. .. .दिल से बधाई सिम्मी जी !!

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  6. बहुत प्रभावी रचना

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  7. मार्मिक रचना कुछ सोचने को मजबूर करती है

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  8. Bahut khub bahut bahut badhai

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