Sunday, October 21, 2018

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1-सीढ़ी
डॉ.सुषमा गुप्ता

सीख तो सकते थे हम भी
ज़माने का चलन 
पर ये हम से हो न‌ सका ।
अब लोग ज़मीं नहीं
इंसानों को बिछाते हैं
पैर जमाने के लिए 
और सीढ़ियों की कोई अहमियत नहीं 
बस चंद लोग चाहिए ,
गिराके खुद को ऊँचा उठाने के लिए ।

-0-
2-दरिया थे हम 
मंजूषा मन

दरिया थे हम
मीठे इतने
कि प्यास बुझाते,
निर्मल इतने कि
पाप धो जाते।

अनवरत बहे
कभी न थके
निर्बाध गति से
भागते रहे,
सागर की चाह में
मिलन की आस में
न सोचा कभी
परिणाम क्या होगा।

अपनी धुन में
दुर्गम राहें
सब बाधाएं
सहते रहे हँस के
और अंत में 
अपना अस्तित्व मिटा
जा ही मिले 
सागर के गले।

पर हाय!!!
स्वयं को मिटाया
क्या पाया?
ये क्या हाथ आया?
कि
खारा निकला सागर,
खाली रह गई
मन की गागर।
-0-

16 comments:

Vibha Rashmi said...

सुषमा व मन जी बहुत सुन्दर सृजन । बधाई ।

Sudershan Ratnakar said...

सुषमा,मंजूषा जी, बहुत सुंदर भाव लिए हुए दोनों की कविताएँ अच्छी लगीं।बधाई

Kavita Bhatt said...

सुन्दर रचनाओं हेतु हार्दिक बधाई आप दोनों रचनाकारों को।

Dr.Bhawna said...

Bahut sundar rachnayen hardik aabar dono rachnakaron ko

Shiam said...

डा. सुशमा गुप्ता जी एवं मंजूषा दोनों की रचनाएं अत्यंत सार गर्भित हैं | अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाली ! इतनी भावपूर्ण कविताओं के लिए आपको हृदय से बधाई | श्याम त्रिपाठी -हिन्दी चेतना

ज्योति-कलश said...

बहुत सुन्दर रचनाएँ , दोनों रचनाकारों को हार्दिक बधाई !

jyotsana pardeep said...


सुषमा जी, मंजूषा जी, बहुत सुंदर कविताएँ लिखी हैं !
हार्दिक बधाई आप दोनों को !!

मंजूषा मन said...

हार्दिक आभार आपका विभा जी

मंजूषा मन said...

हार्दिक आभार आपका सुदर्शन दीदी

मंजूषा मन said...

बहुत बहुत आभार कविता जी

मंजूषा मन said...

बहुत बहुत आभार भावना जी

मंजूषा मन said...

हार्दिक आभार आपका आदरणीय

मंजूषा मन said...

हार्दिक आभार आपका ज्योत्स्ना जी

मंजूषा मन said...

हार्दिक आभार आपका ज्योत्स्ना जी

Krishna said...

बहुत सुंदर रचनाएँ...सुषमा जी, मंजूषा जी को बहुत बधाई।

Kamla Nikhurpa said...

दोनों रचनाएं अति भावपूर्ण
खासकर मीलों चलकर भी मन की गागर खाली रह जाने और मिठास को खोकर खारेपन को पाने का मार्मिक चित्रण
बधाई