Monday, April 22, 2019

895


प्रदूषण (अहीर छंद)
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

बढ़ा प्रदूषण जोर।
इसका कहीं न छोर।।
संकट ये अति घोर।
मचा चतुर्दिक शोर।।

यह जंगल की आग।
हम सब पर यह दाग।।
जाओ मानव जाग।
छोड़ो भागमभाग।।

जंगल किए विनष्ट।
हता है जग कष्ट।।
प्राणी रहे कराह।
भरते दारुण आह।।

धुआँ घिरा विकराल।
ज्यों विष उगले व्याल।।
जकड़ जगत निज दाढ़।
विपदा करे प्रगाढ़।।
गूगल से साभार

दूषित नीर-समीर
जंतु समस्त अधीर।।
संकट में अब प्राण।
उनको कहीं न त्राण।।

विपद न यह लघुकाय।
शापित जग-समुदाय।।
मिल-जुल करें उपाय।
तब यह टले बलाय।।
-0-

Saturday, April 20, 2019

894-सपनों में भरनी है जान



डॉ.सुरंगमा यादव

सपनों में भरनी है जान
यदि बनानी है पहचान
क्षमताओं को अपनी जान
भर के देख फिर सही उड़ान
एक बार जो लेना ठान
उस पर ही करना संधान
धूप-ताप आए बरसात
मन की छतरी लेना तान
खुद बनना अपनी प्रेरणा
हालात पर नहीं बिफरना
पीछे मुड़कर नहीं निरखना
भ्रमजाल भी जाने कितने
मिल जाएँगे पथ में
मगर तुझे है बढ़ना
अपनी ही धुन में
गहराए यदि कहीं अँधेरा
मुसकानों के दीप जलाना
मन-सुमन खिलाए रखना
निश्चित है मंजिल को पाना
-0-

Wednesday, April 17, 2019

893


रमेश राज
1-कुण्डलिया
जनता युग-युग से रही भारत माँ का रूप 
इसके हिस्से में मगर भूख गरीबी धूप
भूख गरीबी धूप, अदालत में फटकारें 
सत्ता-शासन रोज, इसे पल-पल दुत्कारें
बहरी हर सरकार, चलो कानों को खोलें 
जनता की जय आज, आइये हम सब बोलें
-0-
2-दुर्मिल सवैया छंद में तेवरी
[ आठ सगण=112  के क्रम में 24 वर्ण ]
इस कोमल से मन को मिलता, अपमान कभी, विषपान कभी
सुख से न रही पहचान कभी, मुख पै न सजी मुसकान कभी। 

मन को दुःख के अनुप्रास मिले, सच को जग में उपहास मिले
रचती मुरली मधुतान कभी, हम भी बनते रसखान कभी।

हमको कटु से कटु भाव मिले, अलगाव मिले, नित घाव मिले
मधुमास-भरे, अति हास-भरे, हम पा न सके मधुगान कभी।

अभिवादन बीच सियासत है, दिखने-भर को बस चाहत है
जग बादल-सा छल में झलका, गरजा न कभी-बरसा न कभी।


-0-

Saturday, April 13, 2019

892


फिर से राम चले वन पथ पर
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'


अंधकार ये कैसा छाया
सूरज भी रह गया सहमकर
सिंहासन पर रावण बैठा
फिर से राम चले वन पथ पर ।

लोग कपट के महलों में रह,
सारी उमर बिता देते हैं
शिकन नहीं आती माथे पर
छाती और फुला लेते हैं
कौर लूटते हैं भूखों का
फिर भी चलते हैं इतराकर।

दरबारों में हाजि़र होकर,
गीत नहीं हम गाने वाले
चरण चूमना नहीं है आदत
ना हम शीश झुकाने वाले
मेहनत की सूखी रोटी भी
हमने खाई थी गा ­गाकर

दया नहीं है जिनके मन में
उनसे अपना जुड़े न नाता
चाहे सेठ मुनि ­ज्ञानी हो
फूटी आँख न हमें सुहाता
ठोकर खाकर गिरते पड़ते
पथ पर बढ़ते रहे सँभलकर
-0-  सितम्बर 2008

Thursday, April 11, 2019

891


डॉ. पूर्वा शर्मा
1.      
जबसे तुझसे हूँ मिली
मैं खुद से ना मिली ।
2.      
महकती  हैं खुशियाँ
ज़िन्दगी के हर कोने में
बस महसूस कीजिए ।
3.      
हौले-हौले दरारों से
 रिस रही थी खुशियाँ
 सहसा ज़िंदगी का दर खोल
 यूँ बिन कुछ बोल
 ये ज़िद्दी चिपकू दुःख
 आ ही धमके ।   
4.      
तुम्हारे इंतज़ार में
बेइंतहा बेकरारी
सुकूँ भी साथ में
कि अब मुलाकात
तय है हमारी  
5.      
साल दर साल, बीतते गए
पर वो लम्हा नहीं बीता
जो तेरे साथ था बीता
           तू मेरे ख़्वाबों में जीता 
6.      
तू दफन है मेरे सीने में कुछ इस तरह
कि साँसें चल रही है सिर्फ तेरे ही दम पर ।
7.      
वो अपनी तड़प को लफ़्ज़ों में बयाँ कर चले
हमें ना हर्फ़ मिले, ना आँखों ने साथ दिया ।
8.      
तुम पर कौन-सा रंग डालूँ कान्हा ?
मैं तो खुद ही रँगी हूँ तुम्हारे रंग में ।  
9.      
रात भर नींद नदारद
कभी मिलने की बेसब्री में
कभी मिलन के सुकूँ में ।
10.  
दिल से महफूज़ कोई जगह नहीं,
देख लो ... तुम आज तक महफूज़ हो यहाँ ।
11.  
तू साथ है तभी तो चल रही है ये ज़िंदगी
ये बात और है कि तू सिर्फ ख्यालों में साथ है ।
12.  
थमता  नहीं
किसी के चले जाने से
ये गतिमान जीवन,  
बस कटने लगता है  
बेरंग, बेजान, बेमतलब,
फीका एवं निराधार-सा ।


Monday, April 8, 2019

890


प्रो. इंदु पाण्डेय खंडूड़ी 


मुझे इतिहास रचना था
मुझे नीर भरी,
दुःख की बदली बन,
अपने परिचय को न तो
समेट लेना था,
और ना ही 

अपने इतिहास की
 इतिश्री करनी थी।
मुझे तो अपने एहसास के,
दरख़्त पर संघर्ष की,
एक गाथा लिखनी थी।
बदली सा मचलना था,
घनघोर घटाओं की 
अलमस्त छाँव में ठहरना था,
बारिश की बूदों सा गिरना था।
अनायास ही अभेद मन को
सराबोर भिगोना था,
नीर बनकर सड़कगली से
गुजरना था।
झरना बन नदी में
और नदी बन समंदर में
मिल विस्तृत होना था।
फिर,
दर्द से जमना था,
बेचैनी की ऊष्मा से उबलना था,
फिर बेशक्ल आसमान मे
उड़ना था और,
इस चक्र का एक
इतिहास बनाना था,
कुछ निशां छोड़ जाएँ,
वो इतिहास रचना था।

889



बे - वजह किसी की वफ़ा को ना टटोला करो,
मन  में  कोई शक है तो मुँह से बोला करो I
रख दी  खोल के किताब सामने दिल  की
कभी अपनी किताब का भी वरक खोला करो I
जिन  लफ़्ज़ों से शर्मिंदगी  उठानी  पडती  है, 
जुबां  खोलने  से  पहले उन्हें तोला करो I
किसी की जिंदगी में दखलअंदाजी अच्छी नहीं,
ख्वामखां किसी को  शबनम   ना  शोला  करो I
अमृत  नहीं है पास तो कोई बात  नहीं,
किसी  की  जिंदगी में विष भी ना घोला करो I

बाबूराम प्रधान
नवयुग कॉलोनीदिल्ली रोड़,
बड़ौत (बागपत) उ .प्र.  २५०६११

Sunday, April 7, 2019

888

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1
किताबें जलाने से जली कब कहानियाँ।
 रोक सके पहाड़ कब  नदी की रवानियाँ।
सुबह या शाम इक दिन जाना है हमें भी
छोड़ जाएँगे पीछे कुछ तो निशानियाँ।
2
घाव सारे सी लूँगा मैं
ज़हर दे दो पी लूँगा मैं
दूँगा दुआएँ सदा तुझे
यादें साथ जी लूँगा मैं।
3
जग की सब नफ़रत  मैं ले लूँ
तुझको केवल प्यार मिले।
हम तो पतझर  के वासी हैं
तुझको सदा बहार मिले।
सफ़र हुआ अपना तो पूरा
चलते चलते शाम हुई
तुझको हर दिन सुबह मिले
नील गगन -सा प्यार मिले।

Wednesday, April 3, 2019

887


2- दो  कुण्डलियाँ, 
रमेशराज
1
बोतल के सँग बाँटते, फिरें करारे नोट
नेताजी को चाहिए, मतदाता का वोट।
मतदाता का वोट, सभी से मीठा बोलें
तज अपराधी-रूप, सभा में अमृत घोलें
सबसे जोड़ें हाथ, कहें चुपके से पल-पल
हमें दीजिये वोट, लीजि गड्डी-बोतल।
2
दीखे है हर ओर अब, अजब तमाशा हाय
हाथी लेकर साइकिल, सरपट दौड़ लगाय।
सरपट दौड़ लगाय, कमल की कला निराली
पीट रहे हैं भक्त, सभा में जमकर ताली।
चतुराई के पेंच, हाथ ने भी कुछ सीखे
राजनीति की भाँ, पिए मतदाता दीखे।
-0-


Friday, March 29, 2019

886


साँझ खिली है- अनिता ललित
1
तपती धरा पे
बूँदों जैसे,
क्यों तुम आए,
कहाँ गए?
2
मेघ-मल्हार के
गीतों जैसी,
गूँज रही मैं
सदियाँ बीती।
3
बहती हूँ
ख़ामोश नदी सी,
कंकड़ बन क्यों
आ गिरते हो?
4
झील बनी हैं
आँखें मेरी,
चाँद के जैसे
तुम ठहरे हो!
5
रात हो गई
फिर से भारी,
खुली यादों की
बंद अलमारी।
6
मुस्काऊँगी
खिलूँगी,  मेरा वादा!
फूल -सा चेहरा
ओस का पहरा।
7
सहरा जीवन
तुम हो मंज़िल,
पाँव थके
न छाले फटते।
8
साँझ खिली है
दूर गगन में,
माँग पे मेरी
अधर तुम्हारे।
-0-

(26/03/2019, 19.40)