Thursday, May 24, 2018

822


1-कृष्णा वर्मा

आओ फिर मुसकाएँ

बहुत हो गई रूठा-रूठी
आओ चलो मुसकाएँ
चलो कहीं नदिया के तीरे
पांव भिगो बतियाएँ
हाथों से लहरों को ठेलें
काग़जी नाव तिराएँ
पानी के दर्पण में झाँक के
चेहरे पढ़ें पढ़ाएँ।
ज़िंदगी की दौड़ में
जो पीछे छूटे ख़्वाब
ढूँढ के लाए उन्हें फिर
हाथ में ले हाथ
अनकही बातें पड़ीं जो
मन के कोने में
बांट के आपस में
चलो मन को सरसाएँ।
छल रही है उम्र पल-पल
रोक लें कैसे इसे
क्यों ना अब हम संग
चलने के बढ़ाएँ सिलसिले
ज़िंदगी की धूप में
जो चाहते कुम्हलाई थीं
क्यों ना सींच प्यार से
फिर से तरुणाई भरें।
पूर्णिमा की रात है
चंद्रिका पुरज़ोर है
शबनमी कतरों में भीग
मन को मन से जोड़ लें
चलो भरें ख़लाओं को और
मन की छीजन को मिटाएँ
चांदनी के घूँट पीके
ज़िंदगी को जगमगाएँ।
-0-
2-स्वप्न उनके ही फलें

काल के संग जो चले
आज उसको ही फले
रोशनी न हो सकेगी
वर्तिका जो न जले।

जो निगल लेते हैं संकट
धैर्य को धारण किए
लड़खड़ाएँ  लाख लेकिन
वो कभी गिरते नहीं।

बूँद माथे पर टपकती है
उसी के स्वेद की
जिसने पहरों की मशक़्क़त
चिलचिलाती धूप में।

पार करना आ गया
कठिन राहों को जिसे
मंज़िलें बाहें पसारे
मुंतज़िर उसको मिलें।

शूल चुभने की ख़लिश को
जो नहीं करते बयाँ
चरण उनके चूमता है
एक दिन झुककर जहाँ।

-0-
2 -पूनम सैनी
1-समर-

जब-जब होता है आगाज़
उस स्वप्न, नहीं,
दु:स्वप्न  का।
सिहर उठता है,
मेरा हर रोम।
काँप जाती है,
साँसों की रफ़्तार भी।
कैद -सी हो जाती है जुबाँ
सिले होठों के पीछे।
क्रूर आँखों से लड़ती ये
हैरान परेशान नज़रें।
उसके बढ़ते कदमों की आहट से,
खामोश होती धड़कन,
महसूस होती है अब भी।
बस चीखता है दर्द दिल में,
लिए उलाहने अनेक।
प्राणहीन-सी कर देने वाली,
वो काली परछाई,
फिर वो एक बर्बर मुस्कान,
जैसे कर जाती है जड़,
मेरी स्तब्धता को।
फिर होती है शुरूआत,
एक नए युद्ध की।
चिर, सर्वव्यापी समर,
खुद-से-खुद तक।
-0-

Sunday, May 13, 2018

821

मातृदिवस पर हार्दिक शुभकामनाओं के साथ दो रचनाएँ - 


      1
 माँ की खुशबू 

-डॉ. भावना कुँअर

आज एक अजीब -सी बेचैनी थी मन में...
जाने  क्यों  बार-बार
आज भटक रहा था मन
रह-रहकर माँ  क्यों  याद रही थी...
पिछले बरस ही तो आई थी  मेरे पास
दिनभर जाने क्या-क्या करती...
कभी खाली ही नहीं रहती...
जब मैं ऑफिस से आती
खुल जाता हमारी यादों का पिटारा...
और रात ढले हौले-हौले बन्द होता
घर का हर कोना महकता रहता...
माँ की खुशबू से
बॉलकनी में जाते वक्त माँ का हाथ हिलाना...
आने से पहले यूँ खड़े-खड़े इन्तज़ार करना...
आज मन दुखी है,माँ को याद करता है...
मैं बैठी हूँ सात संमदर पार
ढूँढती हूँ उस खुशबू को...
जो दब गई है कहीं धूल में
झाड़ती हूँ धूल
और रख लेती हूँ खुशबू को सहेजकर
रसोई में खोजती हूँ कुछ डिब्बों में...
खुशी से बाछें खिल जाती हैं...
माँ के हाथों से बने कचरी और पापड़ पाकर
चूल्हे पर जल्दी-जल्दी भूनती हूँ
तभी दिख जाती है माँ की पसन्द की चाय...
उन्हीं की तरह बनाती हूँ छोटे से भगोने में
खूब पका-पका कर
अब बैठ जाती हूँ, चाय की चुस्की लेती हूँ
कचरी पाप खाती हूँ
पर जाने  क्यों  होठों तक आते ही...
सील जाती है कचरी
और नमक भी जाने  क्यों  तेज -सा लगता है
कुछ सीली-सीली, कुछ गीली-गीली कचरी...
चाय की चुस्की या फिर दबी-दबी सिसकी...
सूनी बॉलकनी, सूना घर...
रसोई में बसी माँ के खाने की खुशबू आज भी है...
और आज भी है इन्तजार...
अलगनी पर टगें कपड़ों को...
तहाने का
आज भी शीशे पर चिपकी बिन्दी को...
है इन्तज़ार उन हाथों का
मेरी  नन्ही  चिरैया को है इन्तज़ार...
उन मीठी-मीठी बातों का
मैं सब यादों को समेटकर...
माँ से मिलने के दिन
लग जाती हूँ उँगलियों पर गिनने...
     2
     माँ
-शशि पाधा

जीवन की क्यारी में महकी 
मन चन्दन सुवास सी 
माँ ही देहरी माँ ही मंदिर 
माँ निष्ठा विश्वास सी|

माँ ही छाया, माँ ही माया 
माँ माथे की रेख में 
माँ ही गंगा, माँ ही काशी 
माँ वेदों के लेख में 
रोम रोम में सिरहन जैसी
बसती देह में श्वास सी|

सब प्रश्नों के उत्तर तुझ में 
सब उलझन की सुलझन तू 
संस्कारों की तू ही गठरी 
तू ही चिन्तन, मंथन तू 

माँ संझा की शीत चाँदनी 
ऊषा के उजास सी|

ज्ञान कोष का पहला अक्षर
सुर लहरी की तान तू   
घी मिश्री की चूरी तू ही
मेरी तो पहचान तू 
तू अँखियों की नील–झील में 
तू अधरों के हास सी |

तू तो हर पल संग ही रहती 
फिर क्यूँ तुमको याद करूँ 
मन दर्पण से तू ही झाँके
व्यर्थ ही विवाद करूँ 
    
तेरे जैसी लोग कहें पर  
मैं तेरा आभास सी

शशि पाधा