Friday, January 18, 2019

867


भारत भूमि(माधव मालती छन्द)
 पूनम सैनी 
भोर में फूटी किरन, है कर रही जग में उजाला।
खिल रहा है मन कमल,ये देख अम्बर पथ निराला।

भीगता नभ छोर है, यह भीगती धरती  विमल भी
धार अमृत बह रही,यह भीगता है मन कमल भी

खेत में उपजी फसल,बागों में तितलियाँ झूमती।
देख लो आकाश को,ये इमारतें  सभी चूमती।

पंछियों के नीड़ से,अब उठ रही परवाज देखो।
जिंदगी के सफर का ,अब हो रहा आगाज़ देखो।

जन्म सबका एक है,जीवन न कोई  भी  छीनता।
जब एक सा अंजाम, बोलो है कहा फिर भिन्नता।

दिव्य भारत भूमि का,अब जयगान चारों  ओर है।
ज्ञान के आकाश का ,तू पावन उभरता  छोर है।
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Tuesday, January 15, 2019

866

मुक्तक
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1
ख़ून हमारा पीकर ही वे
जोंकों जैसे बड़े हुए।
फूल समझ दुलराया जिनको
पत्थर ले वे खड़े हुए।।
जनम जनम के मूरख थे हम
जग मेले में ठगे गए।
और बहुत से बचे जो बाक़ी
वे ठगने को अड़े हुए ।।
2
पता नहीं विधना ने कैसे
अपनी जब  तक़दीर लिखी ।
शुभकर्मों के बदले धोखा,
दर्द भरी तहरीर लिखी ।
हम ही खुद को समझ न पाए
ख़ाक दूसरे समझेंगे।
जिसके हित हमने ज़हर पिया
उसने  सारी पीर लिखी ।।

Sunday, January 13, 2019

665-तुम नहीं आए


मंजूषा मन

नैनों ने भरना चाहा था तुम्हें
अपने भीतर
और छुपा लेना था पलकों में,

हाथों ने चाहा था छू लेना
और महक जाना
ज्यों महक जातीं हैं उंगलियाँ
चंदन को छू,

कान चाहते थे
दो बोल प्रेम के
जिन्हें सुन जन्म जन्मांतर तक
कानों में घुली रहे मिश्री,

मस्तक को चाहिए थी
तुम्हारे चरणों की एक चुटकी रज
जिसके छूते ही
मन मे भर जाए चिर शांति,

होठों ने चाहा था कह देना
मन की हर पीड़ा
कि फिर न रहे कोई दर्द,

सिर झुका रहा देर तक
इस आस में कि रख दोगे तुम हाथ
और दोगे सांत्वना
दोगे साहस जीवन जीने का,

सब मिल करते रहे प्रतीक्षा
पर तुम नहीं आए
तुम नहीं आए।
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Thursday, January 10, 2019

864

 डॉ .जेन्नी शबनम
1.   
मेरे अंतर्मन में पड़ी हैं   
ढेरों अनकही कविताएँ   
तुम मिलो कभी   
तो फुर्सत में सुनाऊँ तुम्हें।   
2.   
हजारों सवाल हैं मेरे अंतर्मन में   
जिनके जवाब तुम्हारे पास हैं 
तुम आओ गर कभी   
फुर्सत में जवाब बताना।   
3.   
मेरा अंतर्मन   
मुझसे प्रश्न करता है -   
आख़िर कैसे कोई भूल जाता है   
सदियों का नाता 
पल भर में   
उसके लिए   
जो कभी अपना नहीं था   
न कभी होगा।   
4.   
हमारे फ़ासले की मियाद   
जाने किसने तय की है   
मैंने तो नहीं,   
क्या तुमने?   
5.   
क्षण-क्षण कण-कण   
तुम्हें ढूँढती रही   
जानती हूँ   
मैं अहल्या नहीं कि   
तुमसे मिलना तय हो।   
6.   
कुछ तो हुआ ऐसा    
जो दरक गया मन   
गर वापसी भी हो तुम्हारी   
टूटा ही रहेगा तब भी यह मन।   
7.   
रात का अँधेरा   
अब नहीं डराता मुझे   
उसकी सारी कारस्तानियाँ   
मुझसे हार गई   
मैंने अकेले जीने की   
आदत जो पाल ली।   
8.   
ढूँढ़कर थक चुकी   
दिन का सूरज   
रात का चाँद   
दोनों के साथ   
लुकाचोरी खेल रही थी   
वे दगा दे गए   
छल से मुझे तन्हा छोड़ गए।   
9.   
अब आओ ,तो चलेंगे   
उन यादों के पास   
जिसे हमने छुपाया था   
समय से माँगी हुई तिजोरी में   
शायद कई जन्मों पहले।   
10.   
सोचा न था   
ऐसे तजुर्बे भी होंगे   
दुनिया की भीड़ में   
सदा हम तन्हा ही रहेंगे।   
11.   
चुप -से दिन   
चुप -सी रातें   
चुप- से नाते   
चुप- सी बातें   
चुप है ज़िन्दगी   
कौन करे बातें   
कौन तोड़े सघन चुप्पी !   
12.   
तुमसे मिलकर जाना   
यह जीवन क्या है   
बेवजह गुस्सा थी   
खुद को ही सता रही थी   
तुम्हारी एक हँसी   
तुम्हारा एक स्पर्श   
तुम्हारे एक बोल   
मैं जीवन को जान गई।   
13.   
वक्त बस एक क्षण देता है   
बन जाएँ या बिगड़ जाएँ   
जी जाएँ या मर जाएँ,   
उस एक क्षण को   
मुट्ठी में समेटना है   
वर्तमान भी वही   
भविष्य भी वही,   
बस एक क्षण   
जो हमारा है   
सिर्फ हमारा !   
14.   
नजदीकियाँ   
पाप-पुण्य से परे होती हैं   
फिर भी   
कभी-कभी   
फासलों पे रहकर   
जीनी होती है ज़िन्दगी।   
15.   
चाहती हूँ   
धूप में घुसकर   
तुम आ जाओ छत पर   
बडे दिनों से   
मुलाकात न हुई   
जी भर कर बात न हुई   
यूँ भी सुबह की धूप   
देह के लिए जरूरी है   
और तुम   
मेरे मन के लिए।   
 (9. 1. 2019)  
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Wednesday, January 2, 2019

Tuesday, January 1, 2019

862


 

हे वर्ष नव
  1-  डॉ शिवजी श्रीवास्तव 


काल के गतिमान रथ पर बैठकर
आ रहा है वर्ष नव।

करें अगवानी 
उतारें आरती
और दें शुभकामनाएँ हम परस्पर 
हास की, उल्लास की 
मधुमास की
करें शुभ संकल्प सारे
प्रिय अभी
वक्त का रथ 
लौटकर
आता नहीं है फिर कभी
क्या पता कब 
काल हो शिव -सम सदय
राह में मंगल बिखेरे
दे अभय
और कब हो रुष्ट
बनकर रुद्र 
भीषण करे ताण्डव
मचे विप्लव।

चलो हम सब करें
मिलकर प्रार्थनाएँ 
हँसें कलियाँ 
और भौंरे गुनगुनाएँ
उड़ सकें आकाश में 
निर्द्वंद्व चिड़ियाँ
बाज के दुःस्वप्न
उनको ना डराएँ
ग्रस न पाए 
खिलखिलाती धूप को
आतंक का कोहरा 
कर न पाएँ 
आँधियाँ उन्माद की
रक्तिम धरा

हर दिशा में 
हो छटा ऋतुराज की
मृदु समीरण चलें मंथर
गंध की ले पालकी
फले- फूले वृक्ष पर हों 
नीड़ सुंदर
चिरई-चिरवा कर रहे हों 
केलि मनहर 
भोर से ही चहचहाएँ
करें कलरव
इस तरह रहना बने
तुम वर्ष भर
नवल रथ पर आ रहे 
हे वर्ष नव।
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2-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
नई भोर की
नई किरन का
स्वागत कर लो !
आँखों में सब
आशाओं का
सागर भर लो !
भूलो बिसरी बातें
दर्द-भरी अँधियारी रातें
शुभकामना की
देहरी पर
सूरज धर लो !
वैर-भाव मिट जाए
मन से , तन से
इस जीवन से
    जगे प्रेम नित
    दुः सारी
दुनिया का हर लो !
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Wednesday, December 26, 2018

861

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु
मुक्तक
1
वो जब कभी दूर होते हैं
हम बहुत मजबूर होते हैं।
खो गए सन्देश बीहड़ में
सपन चकनाचूर होते हैं।
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ताँका
1
तर्पण करें 
आओ सब सम्बन्ध
रुलाने वाले
धोखा देकर हमें
सदा सताने वाले।
2
एक तुम हो
जीवन में यों आए
खुशबू जैसे
जो कुछ है पास
तुम्हें अर्पण करें।

Monday, December 24, 2018

860- औरत क्या है?


औरत क्या है?
श्रीमती सरला सैनी

क्या नहीं है औरत?
सरला सैनी
बेटी है औरत
बहन है औरत
माँ है औरत
बीवी है औरत
दुःख की गागर है औरत
सुख का सागर है औरत
ठण्डी-ठण्डी छाँव है औरत
सुलगती हुई धूप है औरत
बहता हुआ पानी है औरत
महकता हुआ फूल है औरत
दहकता हुआ अंगारा है औरत
सहनशक्ति की मिसाल है औरत
धरती पर स्वर्ग है औरत
ममता और प्यार की मूरत है औरत
देवियों में दुर्गा है औरत
ज्ञान का भंडार है औरत
शिक्षा का सार है औरत
धड़कते दिलों की पहचान है औरत
नव युग का निर्माण है औरत ।
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