Saturday, March 23, 2019

885


इंसान पेड़ नहीं बन सकता कभी
रश्मि शर्मा

पेड़ अपने बदन से 
गिरा देता है 
एक-एक कर सारी पत्तियाँ
फिर खड़ा रहता है 
निस्संग
सब छोड़ देने का अपना सुख है
जैसे
इंसान छोड़ता जाता है
पुराने रिश्ते-नाते
तोड़कर निकल आता है
उन तन्तुओं को
जिनके उगने, फलने, फूलने तक
जीवन के कई-कई वर्ष
ख़र्च किए थे
पर आना पड़ता है बाहर
कई बार ठूँठ की तरह भी
जीना होता है
मोह के धागे खोलना
बड़ा कठिन है
उससे भी अधिक मुश्किल है
एक- एककर
सभी उम्मीदों और आदतों को
त्यागना
समय के साथ
उग आती है नन्ही कोंपलें
पेड़ हरा-भरा हो जाता है
पर आदमी का मन
उर्वर नहीं ऐसा
भीतर की खरोंचें
ताज़ा लगती है हमेशा
इंसान पेड़ नहीं बन सकता कभी।

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Tuesday, March 19, 2019

884


कैसे आज मनाऊँ होली
भावना सक्सैना

कैसे आज मनाऊँ होली
सरहद पर फिर चली है गोली,
धरा का आँचल लाल हुआ 
मूक बाँकुरों की हुई बोली।

क्या उल्लास पर्व का दिल में
आँगन उजड़े, टूटी टोली,
लाल गँवाकर जानें अपनी 
खून से खेल गए हैं होली।

आँख गड़ाए कुर्सी पर जो
गिद्ध न समझे खाली झोली,
कानों में पिघले सीसे- सी
उतरे नेताओं की बोली।

अश्रुधार निरन्तर बहती
तीखा लवण जिह्वा पर घोली,
पकवानों का स्वाद कसैला
शान्त पड़े हैं सारे ढोली।

रंग तीन बस दिए दिखाई
सुबह आज जब आँखें खोलीं,
श्वेत, हरे केसरिया जग में
कोयल जयहिंद कूकती डोली।
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Saturday, March 16, 2019

883


कलम गा उनके गीत
डॉ. सुरंगमा यादव

कलम गा उनके गीत
जिन्होंने बदली रीत
दीपक बनकर
अँधियारों से लड़ते
मरहम बन
पीड़ाएँ हरते
समय भाल पर
अंकित करते जो पद-चिह्न
बढ़ाते सबसे प्रीत
स्वकी अंधी दौड़ छोड़कर
परहित में सर्वस्व त्यागकर
नष्ट-भ्रष्ट कर जीर्ण पुरातन
सिंचित करते हैं मानव-म
जग के हित जिनका
मौन हुआ जीवन संगीत
तूफानों से घिरे रहे जो
फिर भी सदा अडिग रहे जो
औरों को करने को पार
मोड़ गये नदिया की धार
बाधाओं को करें सदा जो
साहस से विपरीत
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Tuesday, February 26, 2019

882


1-सौ-सौ नमन !
भावना सक्सेना

सौ-सौ नमन उन्हें जो लिख आए
जय हिंद’, धरा पर दुश्मन की।
कर आए हस्ताक्षर अपने 
भर उड़ानें हौसलों की।
जग सोया नींद चैन की जब
वो थर्रा आए उस माटी को
पोषित करती जो कलुषित मन
है जननी आतंक के कर्दम की।
वो वीर बाँकुरे वायुपुत्र बाँच आए
दर्प देश के बल का अरि देहरी,
सौ नमन उन्हें जो लिख आए
'जय हिंद', धरा पर दुश्मन की।
-0-
2-जो काश्मीर माँगा अबके
विपन कुमार

जिस धरा की रक्षा को
दिन रात को दाव लगा बैठे
शिव की पावन माटी पे
हम लाखों वीर लुटा बैठे। 
भारत के मस्तक की गरिमा
जब भी संकट में आई है
इस पर चलने वाली गोली
हमने सीने पर खाई है। 
शहीदों की सींची माटी को
जब भी पाना चाहोगे
कारगिल जैसा  दोहराओगे
 तो हर बार मुँह की खाओगे। 

जन्नत की इस माटी का
क्या तुमने हाल बनाया है
लाखों के भाई छीने हैं, 
अनगिन का का सिंदूर मिटाया है। 
याद  रहे जिस दिन पानी
सिर के ऊपर चढ़ जाएगा
भारत का  हर एक विरोधी
सूली पर लटकाया जाएगा। 
भारती की संतान हैं हम
यही भाव मन में रखना होगा
जो आँख दिखाएगा हमको, 
उसे फल मौत का चखना  होगा। 

याद करो जब भी तुमने
घाटी पर अत्याचार  किया
तुम ज्जैसे गीदड़ झुंडो का
सिंहों ने  है शिकार किया। 
वो कैसे भूल हो  गए तुम , 
जब आतंक मचाया था
भारत के वीर सपूतों ने
झंडा लाहौर तक तुम्हें दौड़ाया था। 
चुल्लू भर पानी डूब मरो
कोई अपमान नहीं होगा
जो काश्मीर माँगा अबके 
तो पाकिस्तान नहीं होगा। 
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Monday, February 18, 2019

881-दहशत का रास्ता


मंजु मिश्रा  

सरहदों पर यह लड़ाई
न जाने कब ख़त्म होगी
क्यों नहीं जान पाते लोग
कि इन हमलों में सरकारें नहीं
परिवार तबाह होते हैं

कितनों का प्रेम
उजड़ गया आज
ऐन प्रेम के त्योहार के दिन
जिस प्रिय को कहना था
प्यार से हैप्पी वैलेंटाइन
उसी को सदा के लिए खो दिया
एक खूँरेज़ पागलपन और
वहशत के हाथों

अरे भाई!
कुछ मसले हल करने हैं
तो आओ न...
इंसानों की तरह
बैठें और बात करें
सुलझाएँ साथ मिलकर
लेकिन नहीं, तुम्हें तो बस
हैवानियत ही दिखानी है
तुम्हें इंसानियत से क्या वास्ता
तुमने तो चुन ही लिया है
दहशत का रास्ता ....
तुम्हारी मंज़िल तो केवल तबाही है।
-0-
मंजु मिश्रा 
#510-376-8175

Thursday, February 14, 2019

880-मुक्ताकण

डॉ.कुमुद रामानन्द बंसल
  •  
विविधता -भरे जग में मत रोको सृजन
मत बाँधो सीमाओं में हृदय-स्पन्दन
प्रार्थना बना दो इस जग का हर क्रन्दन
तप,सत्य-साधना में बन जाओ कुन्दन
  •  
ज़िन्दगी की ढीली तारों को कस दे
या रब !जीवन में कुछ तो रस  दे ।
  •  
उम्मीद नहीं, मंज़िल नहीं,कारवाँ नहीं
सत्य हो साथ तो किसी की परवाह नहीं
  •  
जग की कटुता ने जब -जब रुलाया
परिन्दे को नई परवाज़ का ख़्याल आया।
-0-

Tuesday, February 12, 2019

879




सुदर्शन रत्नाकर
1
इससे पहले कि
फ़ासले बढ़ते जाएँ
तुम्हारे और मेरे बीच
आओ, तन्हा होने से पहले
मन की दूरियाँ मिटा दें।
2
वक्त ने चेताया था
पर हम ही नहीं सम्भले
और दूरियाँ बढती गईं
पर्वतों, नदियों और
हमारे बीच।
3
तुम भी तन्हा हो
मैं भी तन्हा हूँ
चाँद भी तन्हा है
यादें भी तन्हा हैं
चलो चाँदनी में बैठे
और सब एक हो जाएँ।
4
जीवन भर
मोमबत्ती- सी जलती रही
क्षण क्षण पिघलती रही
अंतिम छोर तक पिघली,
मोमबत्ती की सीमा रेखा थी
जली, पिघली और
अस्तित्वहीन हो गई।।
5
उडना है तो
पंख खोलने होंगे
वरन् , उड़ना तो क्या
धरा के भी नहीं रहोगे
बिना पंख खोले
औंधे मुँह ही गिरोगे ।

-0-ई-29, नेहरू  ग्राउण्ड,फ़रीदाबाद -121001
मो. 9811251135



Sunday, February 10, 2019

878- वसंत


अवनि मैं आऊँगा
कमला निखुर्पा

अवनि मैं आऊँगा
तुम करना इंतजार मेरा
मैं बावरा बसंत  इस बरस भी
तुमसे मिलने आऊँगा।

प्यारी धरा! न हो उदास
जानता  हूँ मैं …
ग्रीष्म ने आकर तेरा तन-मन झुलसाया था
रेतीली आंधियों में तेरा मन-कमल मुरझाया था।

तड़पकर तुमने प्रिय पावस को पुकारा होगा 
पावस ने आकर तुम्हें बार-बार रुलाया होगा
गरजकर बरसकर तुम्हें कितना डराया होगा 
तन को झकझोर, मन में गिराकर बिजलियाँ 
ओ वसुन्धरा…तेरी गोद में छोड़ नन्हे अंकुरों को,
बैरी चल दिया होगा।

लेकर तारों की चूनर फ़िर छलिया शरद भी आया 
माथे पे तेरे  चाँद का टीका सजाकर भरमाया, बहलाया।
चाँदनी रातों मे उसने भी विरहन बना के रुलाया।
तेरी  करुण चीत्कार… पपीहे की पीर बन उभर आई होगी।
ओ मेरी वसुधा…मैंने सुनी है तेरी पुकार
मै आऊँगा।

शिशिर के आने से तू कितना घबराई होगी
छुपकर, कोहरे की चादर तले 
थर-थर काँपी होगी, पाले सी जम गयी होगी।
प्यारी अवनि तू न हो उदास…।
मै आऊँगा …

तेरे ठिठुरते बदन से उतार कोहरे की चादर धवल
मैं तुम्हें सरसों की वासंती चूनर ओढ़ाऊँगा
मैंने नयी-नयी पत्तियों से परिधान तेरा बनाया है।
खिलती कलियों को चुन हार तेरा सजाया है
सुनो…भँवरे की गुनगुन बन तेरे कानो में मुझे कुछ कहना है
यूँ लजाओ मत…कोयल की कूक बन तुम्हे गीत नये सुनाना है।
किसलय के आँचल को लहरा जब तू शरमाएगी
मैं तेरे पूरबी गालों पर लाली बन मुसकराऊँगा।
अवनि मैं आऊँगा।
तेरे मन उपवन में प्रेम के फ़ूल खिला,
त्रिविध बयार से तेरी  साँसों को महकाऊँगा।
तुम जोहना बाट मेरी…
अवनि मैं आऊँगा।
(रचनाकाल-04-02-2011)

Saturday, February 9, 2019

877


अब तुम याद नहीं आते....
डॉ.पूर्वा शर्मा


जीवन में ऐसा मोड़ आ गया है
कि अब तुम याद नहीं आते,
आज भी भोर किरण धरा-मुख चूमती है                       
पुरवाई हौले से छूकर तन को सहलाती है
पर अब तुम याद नहीं आते,
पलाश पर बैठी कोयल मीठे गीत सुनाती है
रंग-बिरंगे कुसुम क्यारियों को सजाते हैं 
पर अब तुम याद नहीं आते,
वर्षा की बूँदों से महकी मिट्टी मन को महकाती है
चाँदनी में नहाई धरा खिलखिला के दमकती है
पर अब तुम याद नहीं आते,
पर अब तुम याद नहीं आते, नहीं आते...
तुम ही बताओ तुम्हें याद कैसे करूँ ?
तुम्हें भूलूँ, तभी तो याद करूँ
तुम्हें भूल ही नहीं पाती क्योंकि
बसे हो मुझमें यूँ मुझसे ज्यादा तुम कि  
प्रत्येक श्वास-प्रश्वास में तुम ही महकते
हरेक धड़कन में तुम ही धड़कते  
इन नैनों में भी केवल तुम ही बसते
कण-कण में बस तुम ही तुम समाते
प्रतिपल सिर्फ तुम मेरे ही साथ रहते 
बसे हो मेरी आत्मा में कुछ इस तरह  
कि तुम्हें भुलाना अब असंभव है
तुम्हें याद करूँ भी तो कैसे?
तुम्हें भूल ही नहीं पाती
तो याद भी नहीं कर पाती
इसलिए अब मैं यही हूँ कहती
कि अब तुम याद ही नहीं आते
-0-
2-अनिता मंडा
1
हाँडी भीतर ऊँट को, ढूँढ रहा संसार।
ऐसी ही गत प्रीत की, पतझड़ हुई बहार।।
2
मुस्कानों का आवरण, भीतर सौ-सौ घात।
होने लगे बसंत में, पीले पीले पात।।
2
मल्लाहों के पास है, कश्ती बिन पतवार।
और दिखायें ख़्वाब वो, कर लो दरिया पार।।
3
होठों पर हैं चुप्पियाँ, भीतर कितना शोर।
सूरज ढूँढे खाइयाँ, कैसे भोर।।
4
परछाई है रात की, बुझी बुझी सी भोर।
उजियारे के भेष में, अँधियारे का चोर।।
5
जुगनू ढूँढे भोर में, पतझड़ में भी फूल।
कुदरत के सब क़ायदे, लोग गए हैं भूल।।
6
प्रतिलिपियाँ सब नेह की , दीमक ने ली चाट।
पांडुलिपि धरे बैर की, बेच रहे हैं हाट।।
7
सूनी घर की ड्योढियाँ, चुप हैं मंगल गीत।
जाने किस पाताल में, शरणागत है प्रीत।।

-0-