Thursday, September 7, 2017

759


1-मंजूषा मन
 रेगिस्तान

लहलहाते प्रेम वृक्ष
काट लिए गए,
घने घने जंगल उजाड़ डाले गए
बंजर कर दी गई
मन की जमीन।

नहीं पाई नेह को नमी
न हुई अपनेपन की बारिश
न मिल पाए 
प्रेम के उपयुक्त बीज ही,
बेहिसाब बरसे नमकीन  आँसुओं ने
और भी किया बंजर।

धीरे धीरे,
पत्थर होती गई मन की मीन
खोती गई 
अपने भावों की उर्वरता
जो बनाये रखती थी
जीवन मे हरियाली।

पत्थर और कठोर हुए
टूटे
टूट कर बिखरे
नष्ट करते रहे स्वयं को
और बदल गए
रेगिस्तान में।

मन की धरती
सदा नहीं थी रेगिस्तान...

प्रेम बन बरसो तो,
सदा नहीं रहेगी रेगिस्तान।
   -0-          
2-ज्योत्स्ना प्रदीप 
1-हरियाली का करो नहीं वध {चौपाई }


पादप अपनें हैं ऋषि-मुनि से 
कभी देवता  कभी  गुनीं से ॥ 
योगी जैसे सब कुछ त्यागे
इनसे ही तो हर सुख  जागे  

सुमन दिये  हैं  दी  है  पाती 
नसों -नसों पर चली दराती
सब  रोगों  की   हैं ये  बूटी 
फिर भी श्वासें  इनकी लूटी ॥

सखा कभी ये  कभी पिता है
सबकी इनसे सजी चिता है ॥
मानव -काया जब  ख़ाक बनी  
इनकी काया  ले  राख बनी  

मानव तेरी नव  ये  नस्लें 
झुलसाई  हैं  इसनें  फसलें ॥
वध हैं करते बल से छल से 
डरे न आने  वाले कल से ॥
  
हरियाली का करो नहीं वध 
भूल न मानव तू अपनीं हद 
जीवन को ना  बोझ बनाओ
पौधे रोपें  मिलकर आओ ॥
-0-
2-तुमको तन -मन सौंपाआँसू छन्द)
 1
तुमको तन -मन सौंपा था
तब गाती , बलखाती थी।
उर -सागर गहरे पानी
पंकज खूब खिलाती थी।
2
छल बनकर तुम ही मेरी
आँखों को छलकाते हो  
 हास छीनकर अधरों का
बस आँसू   ढुलकाते हो  !
3
धरम -करम से उजली थी
अपाला ऋषि कुमारी थी ।
देह रोग  से  त्याग दिया
ये पीड़ा  घन भारी थी  !
 4
मन ना काँपा पल  तेरा
आँखें तूनें  ही  फेरी ।
सघन विपिन में छोड़ दिया
 दमयन्ती मै  थी तेरी 
5
इंद्र छले पल में मुझको
तेरा दिल भी  ना सीला 
कैसा ऋषि स्वामी मेरा?
युगों करा था पथरीला !!
6
मै  भोली  तुझे बुलाया
कुंती का  कौतूहल था ।
सपन बहाया था जल में 
तुझ पर ना कोई हल था?
7
आदर्शों की हवि  तुम्हारी
सिया -सपने जले सारे  
 सागर नें तज  दी सीपी
निर्जन में  मोती  धारे  !
8
पापी लीन रहा  देखो 
मेरे केशों को खींचा !
माँग भरी मेरी जिसनें
सर उसका क्यों था नीचा ?
9
हिय  झाँका होता मेरा
 इक ऋतु  ही उसमें रहती ।
बुद्ध पार करे भव सागर
यशोधरा नद- सी बहती  
10
ऋषि मुनि राजा रे मन के
धरम -करम तप ध्यान किया।
नारी मन गहरे दुख  का 
तूनें ना रे  मान  किया।
11
योग -भोग ,जागे- भागे
बनों कभी तो आभारी  !
तेरे कुल के अंकुर की
मूल सभी मैनें धारी  !

-0-

17 comments:

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  2. धीरे धीरे,
    पत्थर होती गई मन की ज़मीन
    खोती गई
    अपने भावों की उर्वरता
    जो बनाये रखती थी
    जीवन मे हरियाली।


    मन जी सुन्दर भाव, बधाई एवं शुभकामना

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  3. इंद्र छले पल में मुझको
    तेरा दिल भी ना सीला
    कैसा ऋषि स्वामी मेरा?
    युगों करा था पथरीला !!


    ज्योत्स्ना जी सुन्दर भाव, बधाई एवं शुभकामना

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  4. मँजूषाजी, ज्योत्स्नाजी बहुत सुंदर रचनाएँ। बधाई आप दोनों को।

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  5. bahut sundar manjuusha va jyotsna ji badhai

    pushpa mehra


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  6. बहुत भावपूर्ण मंजूषा जी हार्दिक बधाई !

    अनुपम भावधारा ज्योत्स्ना प्रदीप जी बहुत-बहुत बधाई !!

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  7. बहुत सुंदर रचनाएँ....मंजूषा जी, ज्योत्स्ना प्रदीप जी बहुत-बहुत बधाई।

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  8. Bahut bhavpurn rachnayen,bahut bahut badhai.

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  9. मंजूषा मन जी रेगिस्तान एक सुन्दर भावपूर्ण कविता , ज्योत्स्ना जी चौपाई छंदों में पौराणिक चरित्र व घटनाक्रम साकार हो गये । आँसू छंद की सुन्दर रचना । आप दोनों को नेहिल बधाई ।

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  10. बहुत सुंदर सार्थक लेखन के लिए आप दोनों को हार्दिक बधाई ।

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  11. सुन्दर भावाभिव्यक्ति के साथ बहुत सुन्दर रचनाएँ...| आप सभी को ढेरों बधाई...|

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  12. सुन्दर रचनाएँ

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  13. आद. भैया जी का साथ ही आप सभी का हृदय से आभार !!
    बहुत भावपूर्ण मंजूषा जी हार्दिक बधाई !

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  14. कविता पसन्द करने के लिए आप सभी का बहुत बहुत आभार

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  15. बहुत सुंदर छंद ज्योत्स्ना जी

    बधाई

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  16. बहुत बहुत आभार आप सभी का

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  17. मंजूषा जी नेह रस के बिना मन धरती के बंजर होने की बहुत सुन्दर भाव व्यंजना हुई है ।
    ज्योत्स्ना प्रदीप जी हरियाली के प्रति सदभावना का आवाहन करती कविता बहुत सुन्दर लगी । पेड़ों के बिना जीवन की कल्पना ही सम्भव नही । हम पता नहीं कब उन की उपयोगिता समझेंगे । आप का आँसू छंद भी कमाल का है चार पंक्तियों में पूरी पौराणिक कहानी कह दी । आप सब को हार्दिक बधाई ।

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