Thursday, August 10, 2017

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1-अम्मा की याद
-डॉ.भावना कुँअर

आज मुझे फिर अम्मा याद आई है
छूकर हवा जब मुझको है लौटी
याद आई है मुझे अम्मा की रोटी।
नहीं भूल पा हूँ आज भी-
उस रोटी की सौंधी-सौधीं खुशबू को
मिल बैठकर खाने के
उस प्यारे से अपनेपन को
साँझ ढलते ही
नीम के पेड़ की छाँव में
अपनी अम्मा के
सुहाने से उस गाँव में
चौकड़ी लगाकर सबका  बैठना
फिर दादा- संग किस्से कहानियाँ सुनना,सुनाना।
नहीं भूली मैं खेत-खलिहानों को
उन कच्चे- पक्के आमों को ।
जब अम्मा याद आती है
तब आँखें भर-भर जाती हैं।
खोजती हूँ उनको
खेतों में खलिहानों में
उस नीम की छाँव में
उन कहानियों में,उन गानों में
पर अम्मा नहीं दिखती
बस दिखती परछाई है।
न जाने ऊपर वाले ने
ये कैसी रीत चलाई है
हर बार ही किसी अपने से
देता हमें जुदाई है
और इस दिल के घरौंदें में
बस यादें ही बसाई हैं।
-0-
वे गलियाँ
भावना सक्सैना

कई धागों की उलझन से     
कई डोरों की जकड़न से
विलगना है उन्हीं सब से
कभी चीज़ें जो प्यारी थीं।

कई किस्से पुराने थे
कई बन्धन सुहाने थे
हो विस्मृत याद वो सारी
यही कोशिश हमारी थी।

कहाँ आसान था ये सब
पिघल रहता मन बरबस
इरादे से हुआ पर अब
कठिन यात्रा ये न्यारी थी।

नहीं अब आँख में आँसू
गजब का शांत मन हरसू
के अब भूली हैं वे गलियाँ
हवा से जिनकी यारी थी।

 -0-

20 comments:

  1. कई किस्से पुराने थे
    कई बन्धन सुहाने थे
    हो विस्मृत याद वो सारी
    यही कोशिश हमारी थी।

    Bahut khub kaha bhawana ji kais lagta hai apna name likhna aaj to dono bhawna eak jagha hain , thanks kamboj ji rachna yaha post karne ke liye...

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  2. और इस दिल के घरौंदें में
    बस यादें ही बसाई हैं।
    अभिनंदन है आप दोनों का । अम्मा की याद बहुत भावपूरित रचना है । जैसे हमारी ही यादों को आपने शब्द दिये । बधाई लें भावना कुँअर जी ।

    के अब भूली हैं वे गलियाँ
    हवा से जिनकी यारी थी।
    भूली यादों की उन गलियों की रसीली कविता के लिये भावना सक्सेना जी हार्दिक बधाई आपको ।
    ख़ास अवसर की शुभकामनाएँ आप दोनों कवयित्रियों को , बहन संधु जी व हिमांशु भाई जी को भी अशेष मंगलकामनाएँ । ।

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  3. यादों की हवा जीवन के हर पत्र को हिलाती हुई जब निकलती है तो उसमें से छन कर आने वाली रौशनी में अन्तस् की गहराइयों में छिपा सब कुछ सामने आ जाता है किन्तु याद तो याद है,भावना जी सही कहा आपने माँ साक्षात् तो नहीं पर उसके कृत्य ही अनेक रूपों में अपनी झलक दिखाते रहते हैं और हमारे दुखी मन का सम्बल बनते हैं | प्यारी चीज़ें भुलाने की कोशिशों के बावजूद भी भुलाए नहीं भूलतीं, मन को समझा कर ही उसे शांत करना होता है,शान्ति में ही तो (दुखों से छीना गया) सुख है|भावना द्वय को भावनापूर्ण अभिव्यक्ति हेतु बधाई

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  4. सहज साहित्य की यह साहित्यिक यात्रा निरंतर आगे चलती रहे,हार्दिक बधाई...संपादक महोदय आ.रामेश्वर जी एवं संपूर्ण साहित्य के पथिकों को...
    डॉ.भावना जी ,एवं भावना सक्सेना जी ...उम्दाभिव्यक्ति...

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  5. यादें तो बस दिल से जुडी होती हैं...और कुछ उसी तरह यादों के अलग-अलग धागों को शब्दों में पिरो कर आप दोनों भावना ने बस मन छू लिया...|
    आप दोनों को हार्दिक बधाई...|

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  6. डॉ०भावना कुँअर की अम्मा की याद,एवम् भावना सक्सेना की वे गलियाँ, अतीत के स्वर्णिम पृष्ठों को खोलती हैं,विषय और भावभूमि अलग होने पर भी दोनों में समानता है,दोनों सम्वेदना के उस धरातल को स्पर्श करती हैं जिसे वर्तमान आपाधापी के युग मे बचाना अपरिहार्य है।ग्यारह वर्षो की यात्रा की आपको हार्दिक बधाई।
    --शिवजी श्रीवास्तव।

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  7. आदरणीया डॉ भावना कुंवर जी एवं आदरणीया भावना सक्सेना जी हार्दिक बधाई आप दोनों को
    बहुत ही भावपूर्ण और मन को छूने वाली रचना का सृजन किया है। जैसे आस - पास ही है सब कुछ बस हम दूर होते चले जाते हैं वक्त के साथ पर अन्तस् में कहीं न कहीं सब कुछ अंकित रह जाता हैं।
    सादर

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  8. आदरणीया डॉ भावना कुंवर जी एवं आदरणीया भावना सक्सेना जी हार्दिक बधाई आप दोनों को
    बहुत ही भावपूर्ण और मन को छूने वाली रचना का सृजन किया है। जैसे आस - पास ही है सब कुछ बस हम दूर होते चले जाते हैं वक्त के साथ पर अन्तस् में कहीं न कहीं सब कुछ अंकित रह जाता हैं।
    सादर

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  9. न जाने ऊपर वाले ने
    ये कैसी रीत चलाई है

    भावना जी इस सवाल का तो शायद उसके पास भी कोई जवाब न होगा, दिल कचोटता सवाल, लाजवाब कविता। बधाई।


    नहीं अब आँख में आँसू
    गजब का शांत मन हरसू
    के अब भूली हैं वे गलियाँ
    हवा से जिनकी यारी थी।

    भावना सक्सेना जी मन छू गई आपकी पंक्तियाँ। बधाई।

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  10. आप दोनों को हार्दिक बधाई . आप दोनों को
    बहुत ही भावपूर्ण और मन को छूने वाली रचना का सृजन किया है।

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  11. सुन्दर रचनायें मन को छूनेवाली ।आप दोनों को हार्दिक बधाई ।

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  12. सार्थक एवं सारगर्भित सृजन हेतु बधाई।

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  13. डॉ भावना कुँवर जी ह्रदयस्पर्शी सृजन के लिए हार्दिक बधाई ।

    उन कच्चे- पक्के आमों को ।
    जब अम्मा याद आती है
    तब आँखें भर-भर जाती हैं।
    खोजती हूँ उनको
    खेतों में खलिहानों में
    उस नीम की छाँव में
    उन कहानियों में,उन गानों में

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  14. कहाँ आसान था ये सब
    पिघल रहता मन बरबस
    इरादे से हुआ पर अब
    कठिन यात्रा ये न्यारी थी।

    भावना सक्सैना जी शानदार सृजन के लिए हार्दिक बधाई ।

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  15. दोनों भावनाओं की सुन्दर भावधारा मन को छू गई !
    हृदय से बधाई स्वीकार कीजिए !!

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  16. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (12-08-2017) को "'धान खेत में लहराते" " (चर्चा अंक 2694) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  17. BAHUT HI BEHTAREEN TAREEKE SE BA
    HAWNAO KI SUNDAR ABHIVYAKTI.. BAHUT BAHUT SHUBH KAMNAYE...

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  18. कितना अच्छा लगा एक साथ दो 'भावना' को पढ़ना. आप दोनों की रचनाएँ बहुत भावपूर्ण है. आप दोनों को बहुत बधाई.

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  19. डॉ. भावना कुंवर जी बहुत भावपूर्ण। आपकी कविता ने मुझे मेरी अम्मा की याद दिला दी। ऐसी ही मीठी यादे हैं मेरे मन में भी।

    मेरी रचना को यहां स्थान देने के लिए आदरणीय काम्बोज भैया का आभार।
    सभी मित्रों की उत्साहवर्धक टिप्पणियों के लिए हृदय से आभार।

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  20. बहुत ही भावपूर्ण और ह्रदयस्पर्शी रचनाएँ !!!
    डॉ भावना कुंवर जी एवं भावना सक्सेना जी .....हार्दिक बधाई!!!

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