Tuesday, June 6, 2017

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कमला निखुर्पा

कंक्रीट के जंगल में रहकर
आखिर सभ्य हो गए हैं हम।

 काटे पेड़ पगडंडी तोड़ी 
धुँआ उगलती चिमनी जोड़ी ।
खाँस-खाँसकर हुए बेदम 
कितने सभ्य हुए हैं हम ।

बेघर हुए वनचर-वनवासी 
हरे-भरे वन हुए हैं ग़ुम।
गमलों में  कैक्टस उगाए
प्रकृति प्रेम का भरते दम
बहुत सभ्य हुए हैं हम। 

नाला बन नदियाँ भी रो लीं
कल-कल कर बहना भी भूली ।
मैला आँचल माँ का करके
बच्चे विकास के पथ पे चलते । 
पीछे छोड़ गए क्या भरम
बहुत सभ्य हो गए हैं हम ।

ताल-तलैया औ झील सुखानी ।
प्यास बुझाए बोतल बंद पानी ।
फिर भी प्यास गर बुझ ना पाई 
अब ज़हर मिला जल पिएँगे हम ?
क्या इतने सभ्य बनेंगे हम ?


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21 comments:

  1. बहुत ही सार्थक और बेहतरीन रचना कमला जी
    बधाई

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  2. बहुत ही सार्थक और बेहतरीन रचना कमला जी
    बधाई

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  3. वर्तमान की कटु सच्चाई को रेखांकित करती बहुत अच्छी कविता

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  4. सुन्दर ,सामयिक रचना ..हार्दिक बधाई कमला जी !

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  5. कमला जी, आज के सच्च को उकेरती रचना | बधाई |

    शशि पाधा

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  6. बहुत ख़ूब और सत्य रचना

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  7. सभ्यता के नाम पर विनाश का यथार्थ चित्रण ।
    बधाई !!

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  8. उम्दाभिव्यक्ति!!कमला जी

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  9. कमला जी सामयिक रचना ने मन मोह लिया |यही तो सत्य है आज |हार्दिक बधाई आपके लेखन को |

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  10. अच्छी सुन्दर कविता। सुरेन्द्र वर्मा ।

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  11. वाह, बधाई कमला जी

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  12. बहुत खूबसूरत कविता । यथार्थ का चित्रण करती सार्थक रचना के लिये बधाई कमला जी ।

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  13. सार्थक ,सामयिक रचना कमला जी

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  14. बहुत सुंदर रचना कमला जी बधाई।

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  15. हरे भरे जंगल उझाड़ कंक्रीट के जंगल में रहने वालो का कड़वा सच जो अपने को सभ्य कहलाने का दम भरते हैं । बहुत सुंदरता से प्रस्तुत किया कविता में कमला जी । बधाई ।

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  16. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (08-06-2017) को
    "सच के साथ परेशानी है" (चर्चा अंक-2642)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  17. सभी विद्वान मित्रों का हृदय से आभार । आदरणीय काम्बोज भाई साहब को नमन जिनसे प्रेरणा पाकर लिखने का साहस जुटा पाती हूँ ।

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  18. Bhavpurn rachna,meri hardik badhai.

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  19. बेहद सार्थक और सामयिक रचना, बधाई कमला जी.

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  20. कटु यथार्थ को उजागर करती सुंदर सामायिक रचना हेतु बधाई आपको कमला जी ।

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  21. जीवन के कटु सत्य को लक्षित करती...एक सार्थक कटाक्ष करती इस बेहतरीन रचना के लिए बहुत बधाई...|

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