Saturday, April 29, 2017

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1- सत्या शर्मा  ' कीर्ति '⁠⁠⁠⁠की कविताएँ

 1- पुरुष

जाने कितनी सारी बातें
रख लेता हूँ खुद के ही अंदर
कहता नहीं हूँ किसी से
अपनी नम होती आँखें भी
अकसर छुपा सा लेता हूँ

कितनी बातें जो बेधती है मुझे
जैसे मेरे पिता द्वारा दी गई
लम्बी दहेज़ की लिस्ट पर मेरा सर
शर्म से झुक जाना

तुम्हें विदा कर लाते वक्त
तुम्हारे आँसुओं में खुद को
भीगते देखना

मेरे घरवालों द्वारा तुम्हें
दिए तानों पर आंतरिक वेदना
महसूस करना

तुम्हारी गर्भ की पीड़ा में
 खुद भी छटपटाना
तुम्हारे बुखार में जलते बदन को  देख
अंदर से डर सा जाना
तुम्हारे थके चेहरे को देख तुम्हारे लिए
एक कप कॉफ़ी बनाना

जब मैं तैयार होऊँ
तुम्हारी आँखों में खुद को
ढूँढना
लोगों की भीड़ में तुम्हारा
सानिध्य चाहना

मैं
रख लूँगा
ये सारी की सारी बातें
नहीं लिखूँगा कभी अपने
मन की बातें

लिखता रहूँगा
तुम्हारे सौंदर्य पर कविताएँ
तुम्हारे त्याग और बलिदानों की
अनगिनत बातें

पर नहीं लिखूँगा अपने
सारे जज़्बात
समेटता रहूँगा खुद में ही
खुद को उम्र भर

हीं लिखूँगा अपना
टूटना और बिखरना
क्योंकि मैं हूँ एक पुरुष
नहीं लिखूँगा अपने ऊपर
कोई कविता .......
-0-
2-मैं माँ होना चाहती हूँ

एक बंजर भूमि- सा स्तित्व लिये
संवेदना के तीरों पर खड़ी  कुछ अधूरी हसरतें हैं मेरी
 कि मैं माँ होना चाहती हूँ

हाँ , मैं बंजर हूँ
तो क्या मेरी ममता सिर्फ़ इसलिए अपरिभाषित रह जाएगी
कि मैं माँ नही हूँ ।
पर है क्या कसूर  मेरा
इस जैविक प्रक्रिया को मैंने तो नहीं किया था सृजित
इस अधूरेपन को दूर करके
पूर्ण मातृत्व का एहसास करना चाहती हूँ।
क्या करूँ र्वर नही मेरी कोख
पर बच्चे के नन्हे कोमल स्पर्श
अपने मन , अपनी आत्मा ,
अपने शरीर पर महसूस करना चाहती हूँ।

लोग कहते हैं तुम अपूर्ण हो
पर देखा है मैंने कली खिलते अपने भीतर
छोटी - छोटी  अँगुलियों को सहलाया है अपने ओठों से
मेरे अंदर भी अनेक धाराएँ है ममता की
जो दूध की नदियाँ बहाना चाहती है
क्या करूँ
कि कोंपल नहीं फूटती मेरे अंदर
पर देखो कैसे मेरी रुह ने लिपटा हैं
हजारों भ्रूण पुष्पित होने के लिए
कि कैसे मेरी हृदय की कोख ने धारण की हैं
नव जीवन की अनगिनत कल्पनाएँ
हाँ, मैं करती हूँ महसूस बढ़ते हुए जीव अपने अंदर ।
उसकी चंचलता , उसके पैर मारना उसके हिलने- सा।
उसके तुतलाते शब्द सुन पूरी रात जागने -सा
उसके गीले कपड़े को अपनी ममता से सूखने -सा
उसकी मासूम हँसी पर पूरी उम्र गुजार देने सा ....

लोग कहते हैं बहुत कष्टकारी होता है
प्रसव का सुखद  पल
मैं उस सुखद पल के कष्ट को झेलना चाहती हूँ
हाँ , बंजर, पर माँ बनना चाहती हूँ ...
 -0-
3-मन पंछी

और फिर
मन का पंछी
उड़ जाएगा छोड़
 एक दिन ये शरीर...

ये घर , ये दीवारें
बस यूँ ही देखते रहेंगे
मेरा मरना
पुकारें मुझे
पर उनकी आवाजें
यूँ ही गूँजकर दब सी जागी

पर नहीं सुनूँगी मैं
नही सुनेगा कोई भी
सब मेरे निर्जीव से शरीर के पास
अपने - अपने हिसाब से
करते रहेंगे ईश्वर पर
आरोप - प्रत्यारोप...


फिर भी नही उठूँगी मैं
चाहे चाय का खौलता पानी
सुख ही जाए
चाहे गीले आटे से किसी और से
रोटियाँ बन न पाएँ
चाहे शाम की पूजा अधूरी रह जाए
नहीं उठूँगी मैं

शायद ऑफिस से आ किसी रोज
तुम मुझे पुकारने लगो
शायद बच्चे किसी दिन मेरे
हाथों का खाना खाने
मचल उठें
पर फिर भी
हीं लौटकर आऊँगी मैं;
 क्योंकि मन का पंछी
तो उड़ चुकेगा
जीवन की सरहदों  के पार ....

-0-

48 comments:

  1. भावपूर्ण अभिव्यक्ति..सत्या जी!!

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    1. तहे दिल से आभरी हूँ पूर्णिमा जी इसी तरह मार्गदर्शन करते रहें।

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  2. जितनी प्रशंसा की जाय कम है, मन को छू गयी सभी रचनाएं, मैं माँ होना चाहती हूँ, अद्वितीय। बधाई कीर्ति जी, शुभकामनाएं।

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    1. हृदयतल से सादर आभार धन्यवाद कविता जी । आपकी उत्साहपूर्ण बातें मेरे लेखन के लिए मार्गदर्शन का कार्य करती है।
      पुनः आभार

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  3. कभी कभी कुछ पंक्तियाँ महज कागज़ पर उकेरे शब्द भर नहीं रह जाते, बल्कि एक ऐसी धारदार अनुभूति के रूप में सामने आते हैं कि अन्दर तक चीर जाते हैं...| उनकी पीड़ा से मन भर जाता है और आँखें नम हो जाती हैं...| आपकी तीनों रचनाएँ ऐसी ही हैं सत्या जी...| ऐसी मर्मस्पर्शी रचनाओं के लिए मेरी ढेरों बधाई स्वीकारें...|

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    1. दिल से आभरी हूँ कि आपको मेरी रचनाएँ पसन्द आई और आपने मेरा उत्साह बढ़ाया । यूँ ही सदा अपना मार्गदर्शन देते रहे।
      सादर धन्यवाद

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  4. मार्मिक ,भावपूर्ण कविताएँ। प्रशंसनीय।

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    1. बहुत बहुत आभार एवं सादर धन्यवाद

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    2. बहुत बहुत आभार एवं सादर धन्यवाद

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  5. अत्यंत मर्मस्पर्शी !
    कोख का बंजर होना हॄदय-विदारक है। तीनों कविताएँ बेहद सुंदर।
    कवयित्री को हृदय-स्पर्शी सृजन के लिए हार्दिक बधाई !

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    1. मेरी कविताओं को पसन्द करने के लिए दिल से आभरी हूँ। सादर धन्यवाद सहित।

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  6. पुरुष कविता का कहन चमत्कृत करता है, विश्वास जिन होता कि यह स्त्री रचित हैं, यह परकाया प्रवेश कर रची गई एक बड़े फ़लक की कविता है। बधाई

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    1. रचना सफल हो जाती है जब लोगो द्वारा पसन्द की जाये ।दिल से आभरी हूँ आपके स्नेह की ।

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  7. माँ बनना चाहती हूँ, भावों की अनेकानेक तितलियाँ उड़ती हैं, बैठ जाती हैं, समय जैसे ठहर गया है, एक शरीर की सीमा मन की कैसे हो, मन तो जो चाहता है चाहता ही है, शब्द नहीं इस अनुभूति पर कुछ कह पाने को, सत्या जी का यह सृजन अद्भुत है, मेरी बधाई व शुभकामनायें उनको। आभार इतनी उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू करवाने के लिए सहज साहित्य का।

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    1. मैं हृदय से आभरी हूँ आपने मेरी कविताओं को पसन्द किया ।
      हार्दिक धन्यवाद इसी तरह हमेशा मार्गदर्शन कर मेरी लेखनी को एक दिशा दें ।पुनः धन्यवाद

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    2. मैं हृदय से आभरी हूँ आपने मेरी कविताओं को पसन्द किया ।
      हार्दिक धन्यवाद इसी तरह हमेशा मार्गदर्शन कर मेरी लेखनी को एक दिशा दें ।पुनः धन्यवाद

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    3. सत्या शर्मा जी आप की तीनों कविताये गहराई में डूब कर रची गई हैं । प्रभाव छोड़े बिना नहीं रह सकती ।
      जैसा अनिता जी ने कहा ऐसी रचना परकाया प्रवेश करके मन की शक्ति द्वारा ही सम्भव है । भावनायों में अपने साथ बहाकर लेगई ।माँ बनना चाहती हूँ मन को भिगो गई ।बहुत बहुत बधाई ।

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    4. हार्दिक धन्यवाद मेरी कविताओं को पसन्द करने के लिए।
      सादर

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  8. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (30-04-2017) को
    "आस अभी ज़िंदा है" (चर्चा अंक-2625)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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    1. This comment has been removed by the author.

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    2. मेरी कविताओं को पसन्द करने के लिए सादर धन्यवाद आदरणीय । आप सभी के मार्गदर्शन में मेरी लेखनी को सही दिशा मिलती रहेगी । पुनः सादर आभार

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    3. तहे दिल से आभरी हूँ आदरणीय कि आपको मेरी कविताएं पसन्द आई । आप सभी के मार्गदर्शन में मुझे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा । आपके उत्साहवर्धक टिप्पणी हेतु सादर धन्यवाद।

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    4. This comment has been removed by the author.

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  9. मर्मस्पर्शी ...बहुत भावपूर्ण तीनों ही कविताएँ !
    हार्दिक बधाई !!

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    1. बहुत बहुत हृदय से आभरी हूँ कविताओं को पसन्द करने हेतु।
      सादर आभार सहित

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  10. मर्मस्पर्शी रचनाएँ सत्या जी ..सराहनीय लेखन के लिए बहुत-बहुत बधाई ।

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    1. हार्दिक धन्यवाद आपका मेरी कविताओं को पसन्द करने के लिए। आपके मार्गदर्शन की सदा आकांक्षी

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  11. बहुत सुन्दर कविताएँ

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    1. बहुत बहुत आभार और सादर धन्यवाद

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  12. मेरी कविताओं को स्थान देने के लिए हार्दिक धन्यवाद

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  13. मेरी कविताओं को स्थान देने के लिए हार्दिक धन्यवाद

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  14. This comment has been removed by the author.

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  15. बहुत भावपूर्ण हृदय को छू गईं तीनों रचनाएँ। सत्या जी बहुत बधाई।

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    1. हार्दिक धन्यवाद । आभरी हूँ आपने मेरी कविताओं को पसन्द किया। सादर

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  16. बहुत ही भावपूर्ण रचनायें।

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    1. सादर धन्यवाद आपका ।

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    2. सादर धन्यवाद आपका ।

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  17. बहुत गहरी संवेदना से परिपूर्ण तीनों ही कविताएँ बहुत सुन्दर|
    अभिव्यक्ति मन को छू गई|
    पुरुष मन को महसूस करके सृजन ...
    बंजर में मातृत्व सुख की चाहत...
    या फिर एक अदृष्य वेदना कुछ न कर पाने की...बेहतरीन लेखन|
    हार्दिक बधाई स्वीकारें सत्या जी|

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    1. दिल से आभरी हूँ मधु जी आपने मेरी रचनाओं को पसन्द किया। बस यूँ ही स्नेह बनाये रखें ।
      सादर आभार

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  18. हिमांशु जी नमस्ते ,
    सत्या शर्मा "कीर्ति" जी की कविताएं जीवन की एक सत्यपूर्ण ,भावात्मक पिटारी है | उनके एक -एक शब्द में हृदय विदारक, अश्रु भरी कहानी है | नारी के हृदय की ऎसी कराह केवल अनुभव की जा सकती है | पढ़ने के बाद मन करता है कि इस कवयित्री से साक्षताकार हो | इन्हें इस युग महादेवी खून तो अतिश्योक्ति नहीं होगी | हृदय से कीर्ति जी को हिंदी चेतना की और से साधुवाद और बहुत सारी बधाई | श्याम त्रिपाठी -प्रमुख सम्पादक हिंदी चेतना

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  19. निःशब्द हूँ सर । क्या लिखूं ...सफल हो गयी मेरी लेखनी ।
    महान महादेवी वर्मा जी और मुझमे तो अभी आसमान जमीन का अंतर है किंतु आपके आशीर्वाद युक्त शब्द मेरे अंदर नई ऊर्जा पैदा की है सदा यूँ ही मार्गदर्शन करते रहे ।
    इसके लिये मैं ' हिमांशु ' सर का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मेरी कविताओं को स्थान दिया और मुझे एक राह दिखाई ।

    सादर धन्यवाद सहित

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  20. निःशब्द हूँ सर । क्या लिखूं ...सफल हो गयी मेरी लेखनी ।
    महान महादेवी वर्मा जी और मुझमे तो अभी आसमान जमीन का अंतर है किंतु आपके आशीर्वाद युक्त शब्द मेरे अंदर नई ऊर्जा पैदा की है सदा यूँ ही मार्गदर्शन करते रहे ।
    इसके लिये मैं ' हिमांशु ' सर का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मेरी कविताओं को स्थान दिया और मुझे एक राह दिखाई ।

    सादर धन्यवाद सहित

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  21. निःशब्द हूँ सर । क्या लिखूं ...सफल हो गयी मेरी लेखनी ।
    महान महादेवी वर्मा जी और मुझमे तो अभी आसमान जमीन का अंतर है किंतु आपके आशीर्वाद युक्त शब्द मेरे अंदर नई ऊर्जा पैदा की है सदा यूँ ही मार्गदर्शन करते रहे ।
    इसके लिये मैं ' हिमांशु ' सर का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मेरी कविताओं को स्थान दिया और मुझे एक राह दिखाई ।

    सादर धन्यवाद सहित

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  22. निःशब्द हूँ सर । क्या लिखूं ...सफल हो गयी मेरी लेखनी ।
    महान महादेवी वर्मा जी और मुझमे तो अभी आसमान जमीन का अंतर है किंतु आपके आशीर्वाद युक्त शब्द मेरे अंदर नई ऊर्जा पैदा की है सदा यूँ ही मार्गदर्शन करते रहे ।
    इसके लिये मैं ' हिमांशु ' सर का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मेरी कविताओं को स्थान दिया और मुझे एक राह दिखाई ।

    सादर धन्यवाद सहित

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  23. मर्मस्पर्शी ...बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति.....मन को छू गई|

    सत्या जी को कमाल के सुन्दर सृजन के लिए हार्दिक बधाई !!!

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    1. दिल से आभरी हूँ । आपने मेरी कविताओं को पसन्द किया।
      सादर धन्यवाद

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    2. दिल से आभरी हूँ । आपने मेरी कविताओं को पसन्द किया।
      सादर धन्यवाद

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  24. अत्यंत मर्मस्पर्शी रचनाएँ! निःशब्द कर गईं! कुछ बातों को महसूस किया जा सकता है ... वे अंदर तक भिगो जाती हैं!
    इस भावपूर्ण सृजन के लिए आपको हार्दिक बधाई सत्या जी!!!

    ~सादर
    अनिता ललित

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