Thursday, March 9, 2017

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सत्या शर्मा  कीर्ति
1-  माफ करना माँ 

सत्या शर्मा 'कीर्ति'

पता है माँ
मेरी विदाई के वक्त
जो दी थी तुमने
अपनी उम्र भर की सीख
लपेटकर मेरे आँचल में ।

चौखट
लाँघते वक्त
मैंने टाँग दिया उसे
वहीं तेरी देहरी पर

गवाह है
नीम का वो चबूतरा
तेरी बेवसी और
ख़ामोशी का

इसलिए मैं
चुराकर ले आई
तेरे टूटे और बिखरे
ख़्वाब

जिसमें मैं प्रत्यारोपित
कर सकूँ
उम्मीदों और हसरतों
की टहनियाँ 

ताकि जब
मेरी बेटी विदा हो
मैं बाँध सकूँ
उसके आँचल में
आत्मसम्मान का
हल्दी -कुमकुम ।।।

2- मैं हूँ आज की स्त्री

समस्त जगत का तेजपुंज
समेट अपने वजूद में
तोड़ने चक्रव्यूह तम का
मैं शक्ति बन आ रही हूँ ।

          तेज समेटे रूद्र का
          स्वरूप मुझमें ब्रह्म का
          कालिमा युक्त संसार में
          बन दामिनी मैं छा रही हूँ ।।

नहीं निर्भया नही सीता मैं
हूँ गायत्री और गीता मैं
काली का स्वरूप लिये
दुष्ट संहार करने आ रही हूँ

         शक्ति हूँ और शिव भी मैं
         सृष्टि हूँ और जीव भी मैं
         अर्धनारीश्ववर का रूप लेकर
         विश्व कल्याण करने आ रही हूँ ।।

3-मैं हूँ आज की स्त्री 

 मैं ही शिव और शक्ति भी मैं
हूँ तेरे भावों की भक्ति भी मैं।

मृत्यु भी मैं..... जीवन भी मैं
नव कोंपल की सृजन भी मैं ।

है अनन्त .....की प्यास मुझमे
स्वास्तित्व पर विश्वास मुझमें।

तन मेरा कोमल भले लगता है
मन में शक्ति - स्रोत बहता है।

हूँ सिर्फ देह नहीं..न ही बेचारी हूँ
मैं सक्षम - सशक्त एक नारी हूँ।।  
-0-

17 comments:

  1. सत्या जी तीनों रचनाएँ अच्छा कहन लिए हुए हैं। नारी की बेचारगी वाली छवि को छोड़ उसे अपना वज़ूद बनाने को प्रेरित करती।

    चौखट
    लाँघते वक्त
    मैंने टाँग दिया उसे
    वहीं तेरी देहरी पर


    इसकी तो बात ही अलग है।

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    1. हार्दिक धन्यवाद अनीता जी। मेरी कविताओं को पसन्द करने हेतु।

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  2. स्त्री के शक्ति स्वरूप को प्रदर्शित करती तीनो ही रचनाएँ अच्छी हैं। पहली कविता *माफ़ करना माँ* तीन पीढ़ियों के मानसिक और आत्मिक विकास को इतनी सरलता से कह जाती है उसके लिए साधुवाद, सचमें हम जिस पीढ़ी से हैं माँ की विवशताएं नही हैं हम में हमारे पास अपनी बेटियों को देने के लिए आत्मसम्मान और आत्मविश्वास है।
    दूसरी और तीसरी कविता *मैं हूँ आज की स्त्री*
    आज की नारी किसी हद तक ऐसी ही है और जितनी नही है उतनी को भी ऐसा ही बन जाना चाहिए। बहुत प्रेरक कविताएं है।
    ह्रदय से शुभकामनाएं और बधाई सत्या शर्मा कीर्ति जी ।

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    1. तहे दिल से आभरी हूँ सीमा जी

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  3. सत्या जी तीनों रचनाएँ सार्थक ह्रदयस्पर्शी ... हार्दिक बधाई आपको

    मैं ही शिव और शक्ति भी मैं

    हूँ तेरे भावों की भक्ति भी मैं।

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    1. बहुत बहुत सादर आभार सुनीता जी

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    2. बहुत बहुत सादर आभार सुनीता जी

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  4. सत्य जी की रचनाओं में एक नवल भाव देखा जो अज की नारी को और स्वावलम्बी बनाता है | यही है आज की स्त्री | बहुत बहुत बधाई सत्य जी को |

    शशि पाधा

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    1. तहे दिल से आभरी हूँ शशि जी

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    2. दिल से आभरी हूँ शशि जी

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  5. प्रथम रचना में आने वाली नारी के आत्मसम्मान की रक्षा करने का सबल प्रयास ,जो निश्चय ही सफल होगा । अपनी पहली पीढ़ी को जिस तरह कष्ट सहते ,कुप्रथायों में पिसते देखा ,उन प्रथायों के भले बुरे को समझ हमने अब आवाज उठानी सीख ली है । आगे आने वाली हमारी पीढ़ी पूरी तरह सजग और समर्थ हो कर अपने सब अरमान पूरे करके पुरूष के कंधे से कंधा मिला कर चलने में ही नहीं उससे आगेबढ़ने में भी समर्थ हो जायेगी । सत्या जी सभी रचनायें नारी शक्ति की सामर्थ्य का बखान करती हैं । सभी नारियों में यह भाव सदा जागरित रहें यही कामना है ।महिला दिवस की सारी स्त्री जाति को बधाई ।सशक्त रचना के लिये आप को भी ढ़ेर सारी शुभ कामनायें ।

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  6. Satya Ji ,

    Excellent all three poems. You have presented the true and honest picture of present day woman . Who deserves every respect and honour in our society. I have great respect for your poetic talent. It is full of emotions and have the power of movement. Good luck ! Satya Ji. Shiam Tripathi Hindi Chetna

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  7. आज की नारी की सोच,का बखान करती कविता बहुत सुंदर है वास्तव में वह पुरानी दकियानूसी मान्यताओं-रूढ़ियों से परे अपने बलशाली अस्तित्व का झंडा गाड़ना चाहती है वह अब बेबसी के घूँट पी कर नहीं रहना चाहती, अपना आत्मसम्मान बनाए रखते हुए अपनी शक्ति को एक खुला मंच देना चाहती है |सुंदर भावप्रवण कविता हेतु बधाई |पुष्पा मेहरा



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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीया पुष्पा जी

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  8. बहुत शानदार रचनाएँ सत्या जी आप को हार्दिक बधाई।

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  9. सुन्दर रचनाएँ

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  10. माफ करना माँ.. दिल को छू गई
    अन्य सभी कविताये भी सुन्दर है पर ..

    गवाह है
    नीम का वो चबूतरा
    तेरी बेवसी और
    ख़ामोशी का

    इसलिए मैं
    चुराकर ले आई
    तेरे टूटे और बिखरे
    ख़्वाब

    जिसमें मैं प्रत्यारोपित
    कर सकूँ
    उम्मीदों और हसरतों
    की टहनियाँ ।

    ताकि जब
    मेरी बेटी विदा हो
    मैं बाँध सकूँ
    उसके आँचल में
    आत्मसम्मान का
    हल्दी -कुमकुम ।।। इन पंक्तियों ने भावुक कर दिया |

    बहुत बधाई कीर्तिजी

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