Tuesday, July 18, 2017

749


1-दूर जाते हुए
                       डा कविता भट्ट

दूर जाते हुए मन सीपी-सा उसकी यादों के समंदर में खोया था
जिसके सीने को मैंने कई बार अपने आँसुओं से भिगोया था

खोज रही थी आने वाले हर चेहरे में उसका निश्छल चेहरा
भोली आँखें- जिनकी नमी वो ज़माने से छिपाता ही रहा

बस इसलिए कि कहीं मेरी आँखें फिर से बरसने न लगें
दोनों का दर्द एक-सा है, कहीं दुनिया समझने न लगे
 
झूठे-बनावटी सम्बन्धों के महलों की नींव न हिल जा
तथाकथित सभ्यता-नैतिकता कहीं धूल में न मिल जा

रिश्तों के महल बस बाहर से ही सुन्दर होते हैं दिखने में
उम्र गुरी बेशकीमती सम्बन्धों-रिवाजों के सामान रखने में
    
इन सामान की झाड़-पोंछ में रखी नहीं कभी तनिक भी कमी ।
खो देते हैं अपनी बात ,कहने का हुनर, आँखों की नमी

बन जाते हैं मात्र मशीन सम्बन्धों के लिए नोट छापने वाली
एक ही छत तले रहते रोबोट; आकृति- मानव -सी दिखने वाली

नम आँखों वाला वो  शख़्स क्या फिर से मन की खाई भरेगा
मेरे कंधे पर अपनी हथेली से हमदर्दी के हस्ताक्षर करेगा

मुझे गले लगाकर; क्या सच्ची बात कहने का हुनर दोहराएगा 
जो सभ्यता में नहीं; क्या वह उस सम्बन्ध की धूल हटाएगा

जो मिलकर नम होती हैं ,बरस सकेंगी वो आँखें क्या दूर जाते हुए ?
या समेटे रखेंगी ज्वार-भाटा सभ्यता-नैतिकता का घुटते-घुटाते हुए ?

-0-(हे०न०ब० गढ़वाल विश्वविद्यालय,श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड)
-0-
2-तुम और मैं
                   मंजूषा मन

किसी सोते -से फूट पड़े
और बहने लगे
विचारों में, लहरों में,
तुम्हारी झर -झर की आवाज़
बस यही सुनाई देती है
तुमने ऊँची- ऊँची चट्टानें काट
अपने लिए राह बना ली...
तुम अपने पानी से धोने लगे
पैरो की खुरदुराहट,
बिवाइयों पर ठंडा लेप बनकर
देने लगे राहत,
तुम्हारी शीतलता बुझाने लगी जलन
तवे से तपते आँगन की...
तुम अपने दोनों हाथों में पानी भर
सुध -बुध खो चुके
थके-हारे चेहरे पर छिड़कते हो
एक सिहरन के बाद
हौले से खुलतीं है आँखें
तुम मुस्करा देते हो
वो भी मुस्कुरा देती है....

वो तपती धरती है
तुम बादल फाड़कर बहे जल
या मैं हूँ धरती
और तुम बस तुम हो.....
-0-
3-यह जीवन   
पुष्पा मेहरा                       

यह  जीवन है मनहर उपवन, मधुर गंध का झोंका है।
भाँति-भाँति के फूल यहाँ हैँ, मलय पवन मनभावन है।।

एक ही वीणा है, पर इसके सुर सभी निराले हैं।
ढल जाते जब ये रागों में, गीत मधुर बन जाते हैं ।।

मिल कर रहते, मिल कर बजते, मिलकर चोटें सहते हैं ।
चोटों से कभी न ये घबराते, तान सुमधुर लेते  हैं ।।

इस जीवन का संगीत मनोहर, हमसे रूठ न जाए।
जीवन की बजती वीणा के तार  बिखर ना जाएँ ।।

वीणा के तारों पर नित, हम तान मिलाप की लेते रहें ।
सत भावों की स्वर लहरी में,डूब-डूब मन हर्षाएँ ।।

इन्द्रधनुष -सी जीवन-छवि है, बूँदों का मात्र छलावा है ।
धूप मोह है, सत्य है छाया, ये जग मात्र भुलावा है  ||

रंगों का ये कैनवस न्यारा, सुख-दुख ने चित्र उकेरा है ।।
ऊँची-नीची राहें हैँ,पर सबका एक ठिकाना है ।।

पानी के बुलबुले-सा जीवन , जाने कब मिट जाना है |
टकराती इन लहरों में ही, सबको पार उतरना है ||

मिल कर रह लें,मिल कर जी लें,मिल कर ही चोटें सह लें |
चोटों से कभी न घबराएँ, हौंसलों  को पस्त न होने दें ||
-0-
पुष्पा मेहरा,बी-201,सूरजमल विहार,दिल्ली-110082

फ़ोन: 011-22166598

Saturday, July 8, 2017

748

सत्या शर्मा ' कीर्ति '
1 -  हम - तुम  

सुनो ना  ....
मेरे मन के
गीली मिट्टी
से बने
चूल्हे पर
पकता
हमारा- तुम्हारा
अधपका-सा प्यार
हर बार मुझे
एक नए
स्वाद से
भर देता है
पता है तुम्हें......
2
कभी - कभी
अपनी हसरतों को
टाँग देती हूँ
मन की खूँटी पे

और सींचती हूँ
उसे अपने
खूबसूरत सपनों से

अकसर देखती हूँ
उसमें अंकुरित होते
अपने अरमानों को

पुष्पित प्रेम की कलियों को
खोंस लेती हूँ
अपने अन्तर्मन के
गुलदस्ते में,

ताकि जब कभी आओ तुम
तुम्हें सौंप सकूँ
हमारे - तुम्हारे
अनकहे पलों के
बासंती रंग
3
हाँ
फिर आऊँगी
तुम्हारी यादों में

अपने दिल
के कमरे को
रखना तुम
खाली

सुनो!  बाहर
शोर होगा
जमाने का
और
दुखों की ते
धूप में
पीले हो जाएँगे
हमारे रिश्ते के
कोमल पत्ते
पर फिर भी
आऊँगी तब
मेरी धड़कनों की
आहटों पर

तुम खोल देना
अपने मन में
चढ़ी वेदना की
साँकल को .....
-0-



Thursday, June 29, 2017

747


1-उस पार की आवाज़

ऋचा मिश्रा  ( ह्यूस्टन टेक्सस अमेरिका )


सोचती हूँ क्या इस आसमान के आगे कोई जहान होगा
जैसे सिसकती हूँ मैं ,हर रोज़ यहाँ
क्या मेरा लिए भी कोई सिसकता वहाँ होगा ?
देखती होगी आज भी
वह हमारे भाव अपनी गहरी आँखों से
चाहती होगी स्पर्श
अपनी उस नन्ही- सी बूँद का जो
उसके आँसुओं का हिस्सा भी बन न सकी
व्याकुल होगी सुनने को
एक शब्द माँ जो वो सुन न सकी
जन्म तो दिया ,पर माँ कभी बन न सकी
तड़पता उसका भी हृदय वहाँ होगा

नहीं जानती की ज़्यादा बुरा क्या हुआ
उसका चला जाना या मेरा उसके बिना जीते जाना
एक महक का विलुप्त  होना
या हवा का उसके बिना बहते जाना
नहीं जानती
कि
कौन जानता था ,
जीवन के बाद ,जीवन में इतना दर्द होगा
हर साँस एक अपराध और हर हंसी पे एक क़र्ज़ होगा
के ढलक जाएँगे गालों पर
आँखों में ठहरा आँसू अब कहाँ होगा ?

है दर्द यहाँ भी, है दर्द वहाँ भी
इस जहान से अलग, नहीं वो वो जहान होगा
मेरे लिए जरूर कोई सिसकता वहाँ होगा।
 -0-
2-किसी रोज...
मंजूषा मन

किसी रोज अलसुबह
जब खोलोगे तुम
अपने घर का दरवाजा,
अपनी साँसो में भर लेने
प्रकृति की ताजी हवा...
देखने भोर की साँवली- सी रौशनी...
जब चाह रहे होगे
दिन भर मुस्कुरा का
जीने की ऊर्जा...

तब...
तुम्हारे दरवाजे पर कोई
तुम्हारी एक झलक मात्र से
अपने मन मे
भर रहा होगा जीने की ऊर्जा,
तुम्हे छूकर आती हवा से
भर रहा होगा अपनी
उखड़ी -सी साँसों में तागी,
तुम्हारे चेहरे की दिव्य चमक से
रौशन कर रहा होगा
मन का हर कोना....

किसी दिन अचानक ही
तुम मुझे अपने दरवाजे पर पाओगे,
या शायद
मन के दरवाजे पर...
 -0-
3- डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर
1
छुआ जब फूल को
हँसने लगे 
काँटें 
नश्तर चुभोकर!!
2
हौले से 
उदास मन 
सैर करते वक्त
हो आया
माँ के पास!!
3
सहेज ली
कतरनें पुरानी
रिश्तों का बन गया
हिंडोला!!
4
मौन की
आहट  में
छिपे अहसास गहरे
कह रहे-
नयनाभिराम!!
5
मन के द्वार पर 
दे रही
दस्तक
तुम्हारी कनखियाँ!!
 6
ये झुर्रियाँ हैं
या मेरा
कटाक्ष
जो बींध रहा
मेरे कलेजे को!!
7
झिलमिलाते तारे
बढ़ा रहे 
दोगुना
चाँद का सौंदर्य 
मगर आज चाँद 
खामोश- सा है !!

-0-

Friday, June 16, 2017

746


1-माटी का घट
-कमला निखुर्पा
1
माटी का संसार है ,खेल सके तो खेल।
बाजी रब के हाथ है,कर ले सबसे मेल ।
2
यह घट काचा ही रहा,तपा न दुख की आँच।
परहित में  जो घट तपे,नित पाए सुख साँच।
-0-
2-बूँद और बादल 
-डॉ ज्योत्स्ना शर्मा
1
हुआ बिछोड़ा बूँद से ,बादल बड़ा उदास ,
बिन तेरे मैं क्या सखी , अब क्या मेरे पास
2
जग नश्वर ,मिटना बदा ,कभी न मिटता प्यार ।

बरसूँ बनकर मैं ख़ुशी तुम लो दुआ अपार !