Monday, October 31, 2016

684



गीत
सुनीता काम्बोज
चौदह वर्षों बाद राम जी,लौट अवध में आए थे
अवधवासियों ने खुश होकर ,घी के दीप जलाए थे ।

कार्तिक की अमवस्या का दिन,पावन बड़ी दिवाली है
कहते इस दिन घर आते ये ,धन वैभव खुशहाली है ।
इस दिन हरि ने नरसिंह बनकर ,सारे पाप मिटाए थे
अवधवासियों ने खुश होकर ,घी के दीप जलाए थे ।

साँझ ढले सब दीप जलाकर ,लक्ष्मी पूजन करते हैं
जगमग दीपक तम से लड़कर,अंधकार को हरते हैं ।
त्योहारों की इस खुशबू ने घर आँगन महकाए थे
अवधवासियों ने खुश होकर ,घी के दीप जलाए थे ।
गली - गली सब द्वार सजाते ,अदभुत बड़े नजारें हैं
ऐसा लगता आज धरा पर ,उतरे सभी सितारें हैं ।
छट गए अब वो  धीरे धीरे,जो घन काले छाए थे
अवधवासियों ने खुश होकर ,घी के दीप जलाए थे ।

Sunday, October 30, 2016

683




1-चलो,प्रीत के दीप जलाएँ -   डॉ.योगेन्द्र नाथ शर्माअरुण
हम उजियालों के प्रहरी हैं,
अंधियारों से कैसा नाता?
चलो,प्रकाश के दीप जलाएँ!
     आशाओं के स्वप्न संजो कर,
          हम तो बढ़ते हैं नित आगे!
     चरणों की गति देख हमारी,
          बाधा हम से डर कर भागे!!
साहस का वरदान लिए हम,
अभिशापों से कैसा नाता?
नित आशा के दीप जलाएँ!
      देह  हमारा  प्रेय बनी कब?
          आत्म-तत्व  के रहे पुजारी!
      व्यष्टि छोड़,समष्टि को चाहा,
         परमार्थ बना साधना हमारी!!
युग - निर्माण हमारी मंजिल,
विध्वंसों से कैसा नाता?
नए सृजन के दीप जलाएँ!
       विश्व  बने   परिवार   हमारा,
           यही  हमारा  लक्ष्य  रहा  है!
       युग की खातिर जिए सदा हम,
          औरों की खातिर दुःख सहा है!!
यह वसुधा परिवार हमारा,
फिर किससे नफरत का नाता?
चलो, प्रीत के दीप जलाएँ!
-0-    पूर्व प्राचार्य,    74 /3,न्यू नेहरु नगर,
         रूडकी-247667

-0-
2-दिवाली के दिये- मंजूषा मन

ला
नहलाए गए
पूजा में रखे गए
घी-तेल से पूरे गए
जलाए गए....

घर-आँगन,
मुँडेर,
छत के कंगूरों तक
सजाए गए
बुझे तो फिर जलाए गए
हवा से बचाए गए.....

और
दूसरे ही दिन
धूप सही
कंगूरों से गिरे
लुढ़के इधर उधर
पड़े रहे ढेर बन,

टूटे,
तोड़े गए
इकट्ठा करके
कोने में छोड़े गए...
-0-
3-दीप जला कर !- डॉ सरस्वती माथुर

चौखट  पर जो
दीप धरा है
उसमें नेह का
उजियार भरा है

दीप जला कर
तारो को जोड़ा है
अँधियारा तो
जीवन का रोड़ा है
बांध कर संबल
बाती में विश्वास भरा है

झर झर झरती है
ज्योति की लड़ियाँ
सूनी चौखट पर
भावो की सुधिया
तमस भी हमसे
देखो- आज डरा  l
-0-
4-बाती तुम जलती हो !- डॉ सरस्वती माथुर

तिमिर मिटा  कर
घर आँगन में
सूरज सी तुम
स्नेहसिक्त नेह दीप में भर्
बाती तुम जलती हो

पर्व ज्योतिर्मय
राग द्वेष हटा
प्रेम प्रीत सिखाता है
राग द्वेष हटा
अन्तर्मन आलोकित कर
बाती तुम जलती हो

मावस की शाम को
आस्था की चौखट पर
मन के अँधियारों में भी
विश्वास का नव उजियार भर
बाती तुम जलती हो l
-0-
5- रामेश्वर काम्बोजहिमांशु

कौन  बड़ा  कौन  है छोटा,
जान  कौन  पाया।
छोटे -से दीपक  ने देखो,
हर तमस हराया।
इसलिए  मेरा  कहना  है-
 हार  नहीं  मानो।
जीवन  के अँधियारों को
कुचलेंगे  ठानो ।
-0-

Friday, October 28, 2016

682



प्रमाणिका छन्द
ज्योत्स्ना प्रदीप

हिमाद्रि जो व्यथा सहे ।
किसे वही कथा  कहे ।।
हरी भरी नहीं धरा ।
विहंग का हिया भरा ।।

न छाँव  है  न ठौर है ।
न पेड़  है    बौर है ।।
न हास है न नीर है ।
बयार भी अधीर है ।।

ली ही  उसाँस है ।
भला कहाँ विकास है।।
नदी  लुटी पिटी घटी ।
कहाँ -कहाँ नहीं बँटी ।।

तरंग गंग अंग की ।
रही नहीं भुजंग सी ।।
मिटी नदी वसुंधरा ।
इन्हें कभी नहीं तरा ।।

दया नहीं तजें कभी
न ज्ञान  ही  न मर्म ही
सुधा भरें  उसे तरें 
हरी भरी धरा करें ।।
-0-
दिवाली के दोहे- 
रेनू सिंह
 
खुशियों के इस पर्व पर,याद रखो यह बात।
मन मंदिर रोशन करो,जगमग होगी रात।।

पैसों से मत तोलना,त्यौहारों का मोल।
हँसी ख़ुशी सौगात दो,मीठे से दो बोल।।

धूम धड़ाका मच रहा,क्यूँ करते हो शोर।
रंगत सबकी धुल रही,देखो चारों ओर।।

धूल धुँए में दम घुटे, बहरे होते कान।
धरती मत छलनी करो,छोडो झूठी शान।।

उस घर का चूल्हा जले,रोटी जिनकी चाक।
बिजली से दीपक जले,उनपर डालो खाक।।
-0-

Thursday, October 27, 2016

681



1-प्रमाणिका छन्द
1-डॉ ज्योत्स्ना शर्मा

जगो कि भोर पास है
रहो नहीं निराश भी ।
उमंग संग ले , चलो
मिले तभी प्रकाश भी ।।

कभी थमी नहीं ,बही ,
कि सिन्धु बाँह तो गहे
चली पहाड़ ,पत्थरों ;
सुनो व्यथा नदी कहे !

न पंथ शूलहीन ही,
सुदूर लक्ष्य ज्ञात है
प्रभूत पीर पा चली ;
तपे दिनेश ,रात है !

तपी ,कि क्षीण हो गई,
चली ,कहीं रुकी नहीं
करे निनाद , आँधियाँ -
डरा रहीं ,झुकी नहीं !

सप्रेम कूल सींचती,
तृषा कहीं न शेष हो
खिले कली ,तरे तरी ;
विराग हो न द्वेष हो !

कभी ,कपोल कल्पना-
हरीतिमा दुलारती ।
शनै:-शनै: पली ,बढ़ी
प्रसन्नता पुकारती ।।

समेट धूप हाथ में
चलूँ बिसार ताप को
मिटी ,मिली समुद्र में
मिलूँ, कि लौट आपको ।।

उमंग से भरे मिले
दिनेश देख ,लो जला
विदेह ,देह धारती
बना घटा, बढ़ा चला ।।

दुआ ,कि जिंदगी रहे
सदैव ही महीप- सी
कभी घना अँधेर हो
जलूँ सदा सुदीप सी ।

बढ़े चलो रुको नहीं
यही सुदीप बाल के
उजास बाँटती रही
गए न नेह डाल के ।।

-0-
विजात छंद
डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर।

नज़र का प्यार पढ़ लेना।
सुनो दिलदार पढ़ लेना।।

लुटाती प्रेम हैं पवनें;
किया शृंगार पढ़ लेना।।

सुगंधित फूल उपवन में;
खिले हैं यार पढ़ लेना।।

कसक दिखती जगत में अब;
भरी अख़बार पढ़ लेना।।

सुहानी रात का आँचल;
छिपा दीदार पढ़ लेना।।

घिरी काली घटाओं में;
हवा का वार पढ़ लेना।।

छिपाकर हम करेंगे क्या;
कभी किरदार पढ़ लेना।।

पुकारे  पूर्णिमातम को ;
गगन ललकार पढ़ लेना।।
-0-