Thursday, March 24, 2016

627

1-आहट फागुन की-कृष्णा वर्मा

पुरवा नेह बरसाए
आहट फागुन की
रितु चपला जो लाए।

सूनी गलियाँ चहकीं
फाग महक ओढ़े
जो ठुमक-ठुमक ठुमकी।

बासंती छवि न्यारी
सुखद करे तन-मन
ज्यों शिशु किलकारी।

कण-कण माटी हरषा
फाग के गीतों की
चहुँदिश सतरंग वर्षा।

हरियल रंग ओढ़ चूनर
लतिका लचक रही
जूड़े में खोंस कुसुम।

घूँघट सरकाए गया
अरुण कपोलों पे
रंग चटक लगाए गया।

नव कुमकुम नवल अबीर
प्रेम छिड़क रंगे
साँवरा सखियन चीर।

गोरी भई मतवारी
नेह का रंग नयन
भर मारी पिचकारी।

छीनी गागर मोरी
बरबस छलिया ने
मल दी गालन रोरी।

मरोर बहियाँ मोरी
घना भिगोय गया
किसना कर बरजोरी।

-0-
2-जीवन है चक्रव्यूह-कृष्णा वर्मा 
1
जीवन है चक्रव्यूह
तो कैसा त्रास 
तुझमें निहित है 
अभिमन्यु आप।
2
भेदेगा इसको बस 
तेरा ही ताब  
मरने से डरता कब 
जीने का ख़्वाब। 
3
कुछ ना कर पाएँगे 
जग वाले तेरा 
जिस दिन मिटा देगा 
डर वाला घेरा। 
4
तू ही ख़ुद खुशियाँ 
तू ही बनवास 
तेरे ही हाथों 
रच कैसा इतिहास। 
5
उठ थाम ले आज 
शक्ति पतवार
 छिद्रित नैया भी 
लग जाएगी पार। 
6
शामों सहर 
खुशियों का सफ़र
कोमल से तन में 
प्राण मुठ्ठी भर
7
खुशनुमा बनत 
बांका रंग-रूप
दिल जाए सदके देख 
ओजस्वी स्वरूप
8
बागों का शृंगार
भौरों का प्यार  
गंध का सौदागर 
लुटाए  खुमार 
9
किताबों में सोए 
जगाए हिय प्यार 
बीता दोहरा के 
करे अंतस गुलज़ार 
10
पुष्पों का समरूप 
अनोखी मिसाल 
महके पूर्णत:
चरण हों या भाल 
11
शूलों घिरा फिर 
ना पीड़ा जताए 
फ़ितरत गुलाब की 
मुसकानें लुटाए। 

 -0-

Wednesday, March 23, 2016

626


1-नारी उठ जग ज़रा   
कमला घटाऔरा

नारी उठ जाग ज़रा  
वक्त नही अब सोने का
निज अधिकार खोने का

संर्ष खड़ा ललकारे तुझको।
बहुत जी लिया मर मर कर
चुप चाप आँसू पी- पी कर
वक्त की अवाज सुन जो
खड़ा पुकारे तुझको।
क्या होगा महिला दिवस मनाने से
चीखने चिल्लाने से
आधी सृष्टि पर अधिकार है तेरा
कौन भला छीनेगा तुझसे।
तू क्यों पीछे खड़ी सदा ?  
सुना होगा यह कथन तुमने-
बिन माँगे मोती मिले माँगे मिले न भीख।
भूल न इस कथन को
कर दृढ़ निश्चय अपना
चलने से न रोक पाये
आ जाये गिरि खंड सामने
नर राक्षस खाने हड़पने
मारे तड़पाये करदे छलनी
हर ले यदि तन मन तेरा
करदे तार तार तू भी उसको
दिखला दे रण चंडी है तू
नहीं बिचारी युगों पुरानी
चारदिवारी की बंद चिड़िया
शिक्षा ने हैं पंख दिए
भर उडान तू ऊँची -नभ पुकारे है
सुदृढ़ बन सशक्त बन
आँख कान खुले रख
चुस्त _दुरुस्त रह हर वक्त तू ।
अपनी शक्ति जगा
अब तुझे शान से जीना है
जीने से न रोक सके तुझे
कोई अत्याचारी या मनचला।
जला सकें न तेज़ाब या तेल से
भाँप इरादा उसका
टकरा जा पहले करे गर बार कोई
तू आज की सशक्त नारी है
वक्त नही सोने का 
नारी उठ अब जग जरा।     

-0-    
 2-साहित्य सृजन -सुनीता शर्मा ,गाजियाबाद

                                                                                                                                                
एक ग्रंथ छुपा सभी के अन्तस् में ,
माँ शारदे की कृपा बरसने से ,
खुलता सृजन कपाट ..
जिससे निकलते असंख्य ....
कल्पना के पंछी जो ...
शब्दों की शक्ल में ..
अंकित होते कागजों में ....
पर ये मात्र पन्ने नहीं ......
होता सृजनकर्ता का कोमल हृदय ,
जो है सवेदनाओ का अनूठा संसार ,
पर शायद वह नहीं जानता कि ..
साहित्य सृजन नहीं सरल ,
जो आज हैं उनसे होता संघर्ष निरंतर ,
अपने अस्तित्व की तलाश में ,
सहने पड़ते हैं असंख्य ...
वक़्त के थपेड़े ..
साहित्यकारों के व्यंग्यबाण...
बनते है जो अवरोध ,
एक चट्टान की भाँति ,
उस नदी पर जो ...
मनमौजी है ,सरल है ,
नहीं जानती कि.. 
साहित्य क़ी डगर है कठिन ,
सागर तक पहुँचने में 
उसे पार करने हैं ,
छोटे से बड़े सभी ,
अडिग प्रहरियों को ,
जो समझते हैं ...
साहित्य को अपनी धरोहर ,
भ्रम में जीते जो अक्सर कि..
उनसे अच्छा व सच्चा कोई नहीं है ,
नहीं समझते जो सृष्टि का नियम ...
जो कल थे वे आज नहीं हैं ,
जो आज हैं , उन्हे भी पीछे हटना होगा ...
वैसे ही जैसे ....
बागों में पड़े पीले पत्ते 
' वृक्षों के नवीन हरे पत्ते ,
 दे देते हैं उत्तम सीख
***

Tuesday, March 8, 2016

625


संघर्ष तेरा बलशाली !
'महिला दिवस' पर नारी की जिजीविषा को प्रकट करती दो रचनाओं के साथ बहुत शुभ कामनाएँ !

1-पहाड़ की नारी !

-  डॉ कविता भट्ट

लोहे का सिर और बज्र कमर संघर्ष तेरा बलशाली 
रुकती न कभी थकती न कभी तू हे पहाड़ की नारी 

तू पहाड़ पर चलती है हौसले लिए पहाड़ी
रूकती न कभी थकती न कभी तू हे पहाड़ की नारी

चंडी-सी चमकती चलती है जीवन संग्राम है जारी
रूकती न कभी थकती न कभी तू हे पहाड़ की नारी

एक एक हुनर तेरे समझो सौ-सौ पुरुषों पर भारी
रूकती न कभी थकती न कभी तू हे पहाड़ की नारी

बुद्धि विवेक शारीरिक क्षमता तू असीम बलशाली
रूकती न कभी थकती न कभी तू हे पहाड़ की नारी

सैनिक की माता-पत्नी-बहिन तुझ पर हूँ मैं बलिहारी
रूकती न कभी थकती न कभी तू हे पहाड़ की नारी

समर्पित करती कविता तुमको शब्दों की ये फुलवारी
रूकती न कभी थकती न कभी तू हे पहाड़ की नारी
-0-दर्शनशास्त्र विभाग,हे न ब गढ़वाल विश्वविद्यालय
श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखं
-0-

    2- निश्चय  
        -   पुष्पा मेहरा   

नारी मैं न कहो मुझसे ना, री !
उतरी  हूँ सागर में तो
पैठूँगी तलहटी में
खोजूँगी मुक्ता प्रवाल
खंगालूँगी सारा सागर
डूबूँगी नहीं  
पर्वत बन निकलूँगी        
अंधकार की कारा तोड़
किरण रथ चढूँगी
जड़ता ,अवरुद्धता
कट्टरता- धर्मान्धता की
नींवें  हिला           
बिगुल स्वाधिकार का        
मैं स्वयं ही बजाऊँगी
सुरक्षा कवच आत्मरक्षा का
दान नहीं माँगूँगी,
मैं स्वयं बन जाऊँगी            
दीवार आत्मबल की            
सुदृढ़ बनाऊँगी
नीलाम्बर में छाऊँगी
पंछी बन उडूँगी
सूर्यप्रकाश सा फैलूँगी
अबला नहीं थी कभी  
सबला थी  
राख़ में दबी चिंगारी थी
पर अब मैं मशाल हूँ         
राह बन बढूँगी
कोनों कोनों को छुऊँगी
सभी को राह दिखाऊँगी |
                                                     -0-
             
               Pushpa .mehra@gmail .com