Tuesday, November 15, 2016

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1-बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज...
डॉ जेन्नी शबनम 

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है,   
दो पल चैन से सो लूँ मैं भी   
क्या उसका मन नहीं करता है?   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है!   

देस -परदेस भटकता रहता   
घड़ी भर को नहीं ठहरता है,   
युगों से है वो ज्योत बाँटता   
मगर कभी नहीं वह घटता है!   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है!   

कभी गुर्राता कभी मुस्काता   
खेल धूप-छाँव का चलता है,   
आँखें बड़ी-सी ये मटकाता   
जब बादलों में वह छुपता है!   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है!   

कभी ठंडा कभी गरम होता   
हर मौसम-सा रूप धरता है,   
शोला-किरण दोनों बरसाता   
मगर ख़ुद कभी नहीं जलता है!   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है!   

जाने कितने ख्वाब सँजोता   
वो हर दिन घर से निकलता है,   
युगों-युगों से खुद को जलाता   
वो सबके लिए ये सहता है!   

बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज   
क्यों चारों पहर ये जलता है !   
-0-
2- बचपन- मंजूषा मन  
बाबू जी से
नज़रें बचाकर,
चुपके से अम्मा
रख देती थी
हथेली पर
पाँच पैसे का सिक्का,
उस सिक्के को ले
इठलाते हुए
दौड़ते फिरते थे
सारे गाँव में हम....
आज अफसर कहलाकर भी
अम्मा का दिया
वो सिक्का
बहुत याद आता है
बचपन के दिन भी
क्या अमीरी के दिन थे।
-0-

14 comments:

  1. बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज...
    डॉ जेन्नी शबनम
    कल्पनात्मक , नई सोच उत्कृष्ट कविता
    बचपन- मंजूषा मन
    असर छोड़ती पंक्ती
    आप दोनों को बधाई

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  2. लेखिका द्वय को हार्दिक शुभकामनाएँ एवं बधाई, सुन्दर रचनाएँ

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  3. दोनों रचनाएं बहुत मन मोहक! जेन्नी जी, मंजूषा जी आप दोनों को बहुत बधाई।

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  4. डॉ.जेनी जी यथार्थ पर आधारित सृजन
    मंजूषा जी मार्मिक सृजन

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  5. डॉ जेन्नी जी बुझ क्यों नहीं जाता सूरज और मंजूषा जी की बचपन की अनेक यादों को मन में समाये कविता ने मन मोह लिया हार्दिक बधाई |

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  6. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ..... very nice ... Thanks for sharing this!! :) :)

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  7. जेन्नी जी बहुत सुंदर रचना ...बुझ क्यों नहीं जाता है सूरज
    क्यों चारों पहर ये जलता है ...अति सुंदर

    मंजूषा जी बहुत सुंदर बालमन की रचना ये रचना दोबारा पढने का सोभाग्य प्राप्त हुआ ..बचपन के दिन भी
    क्या अमीरी के दिन थे...सच में वो अमीरी आपकी रचना से याद आ गई

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  8. जेन्नी जी क्या सोच है सूरज के प्रति आप की ? सूरज पर तरस करते कोमल भाव अच्छे लगे ।
    उसके कार्यों का बाखूब वर्णन किया आप ने ।बधाई ।
    मंजूषा मन जी बचपन सच में अमीरी के दिनों वाला होता है ।ना कोई फिकर न दिन भर करने को काम । खेलो खायो मस्त रहों । बहुत अच्छा लिखा । बधाई ।

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  9. वाह! बहुत सुंदर रचनाएँ दोनों !
    सूरज के बारे में हम कहाँ कभी सोचते हैं -बहुत सुंदर वर्णन जेन्नी जी!
    बचपन के उस सिक्के के आगे सारी दौलत फीकी है -बिल्कुल सही कहा मंजूषा जी !
    आप दोनों को हार्दिक बधाई !!!

    ~सादर
    अनिता ललित

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  10. वाह, क्या बात है

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  11. बचपन की दुनिया को साकार करती बहुत प्यारी कविता .. बधाई

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  12. कभी गुर्राता कभी मुस्काता
    खेल धूप-छाँव का चलता है,
    आँखें बड़ी-सी ये मटकाता
    जब बादलों में वह छुपता


    कितना प्यारा चित्रण
    जेन्नी जी बधाई

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  13. मेरी रचना को यहाँ स्थान एवं सम्मान मिला काम्बोज भाई का हृदय से धन्यवाद. मेरी रचना को आप सभी का स्नेह और प्रशंसा मिली, तहे दिल से आभारी हूँ.
    मंजूषा जी की रचना बचपन की याद दिला गई. 5 पैसे में भी अमीरी का एहसास होता था बचपन में. बहुत सुन्दर रचना बधाई मंजूषा जी को.

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