Saturday, October 1, 2016

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आस्था झा

खौलती है जब रूह
आस्था झा
अपनी परछाई पाने को
कितना छटपटाती होगी
तमाम बारीकियाँ समेटे
खुश्क कर जाती है
जो नम थी कभी
वो ओस की बूँदें
हरी घास पर
नंगे पैर
चले तो होगे ना?
इसी नमी को
बरकरार रखने
मेरी रूह गुनगुनाती है अब
प्यार का कोई सुहाना
गीत गाती है अब
वन्दना परगिहा
कि अब जब मिट्टी में
रखोगे अपने पाँव
तो याद करना मेरा स्पर्श
मिट्टी में घुला हुआ
वो एक और
नम स्पर्श
और तुम भी
गुनगुना देना
मीठा -सा
कोई गीत
-0-Email-asthajhamaya@gmail.com

11 comments:

  1. स्वागत
    प्रकृति के सानिध्य का सुंदर एहसास।

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  2. वाह क्या अनुभूति, बधाई!

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  3. आस्था जी अहसासों की सुन्दर कविता के लिए बहुत-बहुत बधाई ।

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  4. बहुत सुन्दर एहसास आस्था जी बधाई!

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  5. आस्था जी बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना

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  6. बहुत खूबसूरत नज़्म आस्था जी बधाई।

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  7. आस्था जी सुन्दर कविता प्रकृति के नम एहसास की गुनगुनाती हुई ।स्वागत और बधाई ।सुन्दर रचनाओं के पधारती रहें ।

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  8. सुन्दर रचनाओं के साथ पधारती रहें ।

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  9. बहुत ख़ूब! गुनगुनाती हुई सी रचना !
    हार्दिक बधाई आस्था जी !

    ~सादर
    अनिता ललित

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  10. बहुत सुंदर, भावपूर्ण रचना आस्था जी !!!

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  11. बहुत बढ़िया रचना ..हार्दिक बधाई !

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