Thursday, August 18, 2016

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गिरीश पंकज
रक्षा का यह बंध है, उज्ज्वल इसकी रीत।
भाई-बहन के नेह का, गूँजे नित संगीत ।

सूत्र नहीं यह रेशमी, भावों का अनुबन्ध।
भाई-बहिन का नेह है, ज्यों मधुरिम मकरंद।

हर बहना रक्षित रहे, राखी का सन्देश ।
हर नारी को नित मिले, भयमुक्त परिवेश।।

निर्मल धागा प्रेम का, है कितना मजबूत।
हर पल लगता बहन को , भैया है इक दूत।

रिश्ते मैले हो रहे, फिर भी है विश्वास।
भाई-बहिन के नेह का, उज्ज्वल है अहसास।
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4 comments:

  1. सुन्दर भाव भरे बहुत सुन्दर दोहे आदरणीय !
    हार्दिक बधाई !
    रक्षा बंधन के पावन पर्व पर सभी को बहुत-बहुत शुभ कामनाएँ !!

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  2. आदरणीय गिरीश पंकज जी बहुत भावपूर्ण दोहे !ये बहुत ही प्यारा लगा..

    सूत्र नहीं यह रेशमी, भावों का अनुबन्ध।
    भाई-बहिन का नेह है,ज्यों मधुरिम मकरंद।

    हार्दिक बधाई ....बहुत-बहुत शुभ कामनाएँ !!

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  3. आदरणीय पंकज जी बहुत उम्दा सृजन के लिए हार्दिक बधाई

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