Wednesday, March 2, 2016

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 पुष्पा मेहरा 
1
हँस हँस कलिका डोलती, भौंरे पियें पराग ।
अल्हड़ बाला ये हवा , गाये बिरहा फाग ।।              
2
हवा फागुनी चल रही, मनवा हुआ अधीर
तन पे  लिपटी धूल को, लेता मान अबीर ।।
3  
रंग- भरी पिचकारियाँ, भरतीं मन में रंग ।
बृज की होली खेलते,श्याम गोपियों संग ।।
4
राग- कपट की होलिका ,बैठी पाँव पसार ।
 जा दिन ये दोनों जलें,जग पावे निस्तार।।
5        
श्याम रंग में मैं रमी, नाना रंगों- बीच ।
जल सिंचित पंकज रहे, सदा कीच के बीच ।।  
6
चोली दामन -से रहें , रंग रश्मि के साथ ।
आया फागुन रँग रहे , धरा -वधू के हाथ  ।।
7
तितली- मन उड़ता फिरा , दूर गाँव के छोर ।
महुआ के घट रीतकर , उड़ा सरों की ओर ।।
-0-
pushpa .mehra@gmail .com  

4 comments:

  1. bahut sundar !

    राग- कपट की होलिका ,बैठी पाँव पसार ।
    जा दिन ये दोनों जलें,जग पावे निस्तार।।
    चोली दामन -से रहें , रंग रश्मि के साथ ।
    आया फागुन रँग रहे , धरा -वधू के हाथ ।।
    aadarniya pushpa ji ki lekhni ko hridy se naman !

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  2. Bahut sundar dohe didi ..haardik badhaaii !

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  3. मेरे द्वारा रचित होली विषयक दोहों को अपने ब्लॉग में स्थान देने हेतु भाई जी आपका आभार , साथ ही वरिष्ट और विशिष्ट रचनाकारों के सराहनापूर्ण शब्द रंगों में भीग कर मैं धन्य हो गयी |आप सभी को होली की अनेकानेक शुभकामनायें|

    पुष्पा मेहरा

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