Sunday, June 28, 2015

चटकती है चट्टानें



1-रचना श्रीवास्तव
1
पर्वत का
वृक्षों से है प्रेम अटल
होतें है जुदा तो
सूखते हैं पेड़
टूटता है दिल पर्वत का
शायद इसीलिए
चटकती है चट्टानें
होता है भूस्खलन
-0-
2-सुनीता अग्रवाल
1-इच्छाएँ

इच्छाओ की कलम से
लिखी किताब जिंदगी की
भरती नही
-0-
2-भूख

भूख
बन जा इबादत
या की हवस
तृप्त न होती
-0-
3-कतरन
उनसे पूछिये
कतरनों का मोल
जिनके हिस्से आती हैं
उतरन केवल
-0-
4-मोमबत्तियाँ


हर हादसे के बाद

जल उठती है मोमबत्तियाँ

पर पिघला नही पाती

इंसानियत और न्याय की धमनियों में जमे

रक्त के थक्के को

हताश,बुझी मोमबत्तियाँ

करने लगती है इन्तजार

फिर किसी कली के मसले जाने का
-0-

Thursday, June 25, 2015

परवरिश



अनिता मण्डा

तुम बढ़ते रहे यों ही

जंगल के पेड़ों की तरह

हमें सँवारा गया

बगीचे की क्यारियों -सा

जहाँ हम उगे, पले, बढ़े

छोड़नी पड़ी जगह, जड़ें

बिना आह ,शिक़वे के

जो भी मिला बागबाँ

हमने वो अपना लिया

तुम बढ़े बिना कटे

तभी तो बेतरतीब से

नहीं सहा विस्थापन

थोड़े संवेदनहीन से

उभर आता है जंगलीपन

सभ्यता के मुखौटों के बीच

छुपाते हम अपना तन मन

आँखों की चौखटों के बीच

-0-
(चित्र  गूगल से साभार)

Wednesday, June 24, 2015

पहाड़ों का दर्द



1-पहाड़ों का दर्द
                सुनीता शर्मा
       
              
महत्वाकांक्षी मानव के अहंकार देख

     बदहाल पहाड़ अब रोता ही नहीं
बारिश भी उसका अंतर्मन भिगो नहीं पाती ,
औ उसके फेफड़ों में जमने लगी दर्द की झील ,
जो कालांतर में कहर बरपाएगी जरूर ,
चूँकि तुम्हारा जीवित होना ही उसकी मृत्यु है ,
                तो इन दरकते पहाड़ों की मृत संवेदनाओं ने ,
                वेदनाओं में जीना सीख लिया है शायद ,
                ममता के आँगन पहाड़ पर हे मानव !
                खनन में मगन तूने अपने अस्तित्व को
                अंतहीन खतरे में डाल ही दिया है,
                पूर्वजों के पूजे-सँवारे पहाड़ों की सम्पदा बेचकर
                तेरा जीवन मद की भेंट चढ़ ही जाएगा ,
                और कालांतर में बाढ़ का उग्र वेग
                बहा ले जाएगा तेरे वीभत्स अरमानो को ,
                तेरे अहंकार की बढ़ती मीनारों को ,
                तब हे मानव ! तेरा अस्तित्व !
                अँजुली भर मीठे पानी को तरसेगा ,
                क्योंकि अभी नदी तेरे लिए नाला भर है ,
                जिसमें तू बहाता अपने तन-मन के अवसादों को ,
                उन जहरीली नदियों में जीवन का आधार ढूँढ लेना तुम ,
                वृक्ष रहित बंजर पर्वत पर कैक्टस के उपवन उगा लेना तुम !
                                               -0-
                
2 - केदारनाथ आपदा
       सुनीता शर्मा 

समय कहाँ कब
किसी के लिए ठहरता है ,
थम जाती हैं
यहाँ केवल साँसें ,
प्राकृतिक हों
या कृत्रिम ,
रूह की देह को
त्यागने की परंपरा ,
फिर ब्रह्मलीन हो जा जाना ,
हाँ शायद वेदनाओं की ,
पाषाणी धरती न हो ,
केदार घाटी की  भाँति जो ,
पत्थरों का शहर बन गया ,
प्यासी रूहें भटक रही है ,
अपनों की तलाश में ,
जीवन की आस में ,
जैसे हर पत्थर के नीचे
लिख दी गई हो
दम तोड़ती तड़पती
अनगिनत मार्मिक दास्तान ,
जिनका इतिहास भूगोल ,
जानने के लिए फिर
असंख्य बेरोजगारों को
रोजगार मिल ही जागा ,
क्योंकि आपदा का असर ,
लोगों के जेहन में
साल छह माह ही रहता है ,
फिर समय चक्र में सबको सब ,
भुलाने की विवशता ही तो है ,
पुराने दर्द पर मरहम बोझ लगने लगता है ,
हर पल नवीन हादसों का इंतज़ार करती ,
मानवता वक़्त के साथ ढलती जाती हैं ,
वेदनाओं के नए सफर के लिए ।
-0-