Sunday, June 14, 2015

चाँद



अनिता मंडा

एक बार यूँ
होकर बेक़रार
छूना चाहा था
चाँद को लहरों ने,
आगे बढ़ती
आकाश की तरफ़
भूली मर्यादा
आगे और ऊपर
बढ़ती गईं
लील गई जीवन
समेट गई
अनमोल निधियाँ
किनारे छोड़
फैल गई रेत में
थकी, ठहरी
होकर असफल
हो गई क्लांत
शांत, निर्भ्रांत, स्थिर
चाँद का अक़्स
आने लगा नज़र
अपने ही भीतर।
-0-

13 comments:

  1. सुन्दर रचना, एवं भावाभिव्यक्ति, बधाई, शुभकामना
    कविता भट्ट

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (15-06-2015) को "बनाओ अपनी पगडंडी और चुनो मंज़िल" {चर्चा अंक-2007} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  3. सुन्दर ,मोहक प्रस्तुति ...हार्दिक बधाई अनिता जी !

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  4. खूबसूरत रचना अनीता जी....बधाई!

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  5. बहुत सुन्दर रचना !
    अनिता जी अभिनन्दन!

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  6. सुंदर रचना... अनीता मण्डा जी !
    हार्दिक बधाई!

    ~सादर
    अनिता ललित

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  7. आप सभी का दिल से आभार।

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  8. अनिता मण्डा की 'चाँद' कविता में भाव-सौन्दर्य के साथ भाषा का चयन भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। बधाई !
    डॉ सतीशराज पुष्करणा , पटना

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  9. अनीता मंड जी सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई |

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  10. Bhavpurn rachna bahut bahut badhai...

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  11. sunder v bhaavpurn!....hardik badhai anita ji .

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  12. बहुत ही सुन्दर रचना
    कुलदेवी

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  13. मनमोहक पंक्तियाँ...हार्दिक बधाई...|

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