Sunday, April 27, 2014

सच्चे लोग चले जाते हैं,


रेणु  कुमारी

सच्चे लोग चले जाते हैं,
कदमों के निशाँ नहीं मिलते।
उनकी धड़कन में बसे हुए,
यादों के जहाँ नहीं मिलते।
     कितना सुन्दर सपना था वो,
     अक्सर जो देखा करते थे।
     कितना सक्षम भव्य भारत था,
     वे हरदम सोचा करते थे।
सुख व  शांति के अनमोल बीज,
जहाँ-तहाँ वे उगा कर गए।
प्रेम मार्ग सदा अपनाना,
ये सीख हमें बता कर गए।
     घृणाद्वेष सब कुछ दूर हो,
     ऐसा जतन किया करते थे।
     क्षमादान ह़ी महादान है,
     वे यह सीख दिया करते थे।
अनेक सुनहरी पुस्तकों में,
उनके नाम दोहराए जाएँगें।
जिनकी महान गाथा सुनकर,
हम अपना शीश झुकाएँगे।
     स्वर्णिम काल गुजर गया है,
     पर आगे नया जमाना है।
     दफ़न पड़े सपनों को,
     हमें अब जी कर दिखाना है।
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Tuesday, April 1, 2014

रात के अंधरे में एक सन्नाटा है..

अभिषेक कुमार

इस रात के अँधेरे में,
एक सन्नाटा है
हवा एक सरगोशी -सी कर रही है
पूछ रही है
ये हवा आज,
इस गहरे सन्नाटे में
तू आज चुप क्यों है..
कोई गीत क्यों  नहीं सुनाता
कोई नज़्म क्यों  नहीं पेश करता

कौन  सी पुरानी बातों को मुट्ठी में बंद करूँ,
कौन सा गीत सुनाऊँ?
मैं भी तो इसी कशमकश में हूँ..
हर नज़्म आज रूठी है
हर गीत आज भूल गया हूँ
यादों  के तो कई लम्हे कैद हैं आँखों में,
मगर आज वो यादें
क्यों गीत बनने से इन्कार कर रही हैं?
ये मद्धम शीतल हवा आज
तुम्हारे लम्स सी गर्माहट लिए हुए है
कायनात के हर कोने से जैसे
तुम्हारी आवाज़ सुनाई देने लगी है..
इस सफेदपोश रात में
धीरे धीरे मैं खोता ही जा रहा हूँ कहीं..
चलने लग गया हूँ माज़ी की उन पगडंडियों पर
और अचानक चलते चलते
एक तूफ़ान उठा,
और
उन माजी की हसीन गलियों से ला पटक.
फेंक दिया मुझे फिर इस तनहा रात में..
जहाँ बस बेपनाह अँधेरा है
सन्नाटा है
और मैं हूँ !
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