Thursday, June 19, 2014

अनुभूतियाँ



1-रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
1

आँसू के दरवाज़े , पीड़ा- भीगा आँगन ।

ऐसे मौसम में तो ,भीगेगा व्याकुल मन ।
2

खुशी कहाँ से लेकर आएँ

यूँ उदास जब अपने होते।

गीली आँखें  जब-जब देखीं

घायल सारे सपने होते ।
3

पंछी की तो बात और  है

नील गगन में उड़ता जाता

कोसों दूर बसे जो अपने

उनको  दिल का हाल सुनाता

हम दुनिया के पाश बँधे हैं

लाख विचारें छूट न पाएँ ।

आज़ादी तो एक बहाना

हिम्मत की पर टूट न पाएँ ।

हमदर्दी के बोल सुहाने

आज किसी को नहीं सुहाते

 छ्ल-बल करने वालों को तुम

प्यार करो ,पत्थर बरसाते ।
-0-
2-डॉ ज्योत्स्ना शर्मा
देता ही रहा

सागर तो जी भर

धूप ने जो तपाया

तो बादल बनाया

खूब बरसा धरा पर

और सींच आया-

 नन्हें पौधे ,कली ,फूल ,

महका दिया जग सारा ,

हरा भरा परिधान

खूबसूरत नज़ारा !...

मन के मथे दे गया

 रत्नों के ढेर

मोतियों -भरी सीपियाँ

लहरों की वीथियाँ

ज़रा न अघाया

जो डूबा, वो पाया !!!!

दिया अमृत

सबको तूने सारा

क्यों कहें खारा ?

-0-

4 comments:


  1. खुशी कहाँ से लेकर आएँ

    यूँ उदास जब अपने होते।

    गीली आँखें जब-जब देखीं

    घायल सारे सपने होते ।

    Bahut gahan abhivyakti...apnepan se bhari..

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  2. N0 3 bahut hi hardaysparshi hai...

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  3. बहुत मर्म स्पर्शी !!!

    सादर नमन वंदन और आभार !!

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  4. hamdardi ke bol suhane .....patthar barsate
    tatha mootiyo bhari seepiya.....khara bhaavpurn v marmsparshi.....himanshuji tatha jyotsnaji ko sadar naman ke saath hardik badhai.

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