Sunday, April 27, 2014

सच्चे लोग चले जाते हैं,


रेणु  कुमारी

सच्चे लोग चले जाते हैं,
कदमों के निशाँ नहीं मिलते।
उनकी धड़कन में बसे हुए,
यादों के जहाँ नहीं मिलते।
     कितना सुन्दर सपना था वो,
     अक्सर जो देखा करते थे।
     कितना सक्षम भव्य भारत था,
     वे हरदम सोचा करते थे।
सुख व  शांति के अनमोल बीज,
जहाँ-तहाँ वे उगा कर गए।
प्रेम मार्ग सदा अपनाना,
ये सीख हमें बता कर गए।
     घृणाद्वेष सब कुछ दूर हो,
     ऐसा जतन किया करते थे।
     क्षमादान ह़ी महादान है,
     वे यह सीख दिया करते थे।
अनेक सुनहरी पुस्तकों में,
उनके नाम दोहराए जाएँगें।
जिनकी महान गाथा सुनकर,
हम अपना शीश झुकाएँगे।
     स्वर्णिम काल गुजर गया है,
     पर आगे नया जमाना है।
     दफ़न पड़े सपनों को,
     हमें अब जी कर दिखाना है।
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12 comments:

  1. महापुरुषों ने आदर्श भारत की कल्पना की थी...
    देश के भावी कर्णधारों को उनका सपना सच कर दिखाना है...
    सुन्दर भाव की रचना के लिए रेणु जी को हार्दिक बधाई !!

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  2. सुंदर रचना
    बधाई

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  4. सुन्दर भावों से भरी बहुत सुन्दर कविता ..बधाई ..बहुत शुभ कामनाएँ !!

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (28-04-2014) को "मुस्कुराती मदिर मन में मेंहदी" (चर्चा मंच-1596) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. उम्दा, बेहतरीन !!

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  7. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना के लिए रेणु जी को बधाई.

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  8. स्वर्णिम काल गुजर गया है,
    पर आगे नया जमाना है।
    दफ़न पड़े सपनों को,
    हमें अब जी कर दिखाना है।
    sunder likha hai
    rachana

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  9. एक आशावादिता झलकती है इन पंक्तियों में...| कुछ कुछ `बीति ताहि बिसार दे , आगे की सुध ले...' जैसी प्रेरक भावना हैं इनमे...| एक सुन्दर, भावपूर्ण रचना...जो स्वर्णिम अतीत से एक उज्जवल भविष्य तक की यात्रा पर ले जाती है...|
    बधाई...|

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  10. आप सबका बहुत धन्यवाद।

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