Tuesday, March 18, 2014

ज़िन्दगी पहेली


सीमा स्मृति
    1
जिन लम्हों को समझ ज़िन्दगी,
जिया मैंने
आज एक अजब पहेली बन
ज़िन्दगी में हैं छाए ।
2
बरसों साथ जीने से क्या होता है
कुछ तहें साथ जीने से नहीं
वक्त की तपन में ही
खुला करती हैं।
3
गजब पहेली है ज़िन्दगी
जितनी सुलझी लगती है
उतनी ही नई बुनाई
बुन लिया करती है।
4
आज भी कुछ बीते लम्हे
प्रस्फुटित होते है नयी कोंपल बन
मन उल्लास में हिलोरे लेना चाहता है
ठीक उसी क्षण
वो वर्तमान नामक दराती से
काट डालते हैं बेदर्दी से कोंपलें।

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9 comments:

  1. ज़िन्दगी पर जितना कहा जाए, समझा जाए, समझाया जाए हमेशा लगता कि आगे भी बहुत कुछ है. इन सभी क्षणिकाओं में ज़िन्दगी का कुछ और रूप...

    आज भी कुछ बीते लम्हे
    प्रस्फुटित होते है नयी कोंपल बन
    मन उल्लास में हिलोरे लेना चाहता है
    ठीक उसी क्षण
    ‘वो’ वर्तमान नामक दराती से
    काट डालते हैं बेदर्दी से कोंपलें।

    सभी बहुत उम्दा, बहुत शुभकामनाएँ!

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  2. ज़िंदगी को बहुत संजीदगी से अभिव्यक्त किया आपने ...वाकई ...
    कुछ तहें साथ जीने से नहीं
    वक्त की तपन में ही
    खुला करती हैं।.......बहुत बधाई !1

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  3. जिंदगी का विश्लेषण करती छोटी कविताएं...बहुत सुंदर सीमा जी,
    बरसों साथ जीने से क्या होता है
    कुछ तहें साथ जीने से नहीं
    वक्त की तपन में ही
    खुला करती हैं।.....बहुत पसंद आई।

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  4. जीवन की हर रीति अनोखी

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  5. ज़िंदगी सचमुच एक पहेली ही है...कभी सखी-सहेली सी...कभी वैरी...पर फिर भी बहुत प्यारी...|
    बधाई...|

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  6. सचमुच! अजब पहेली ही है ये ज़िन्दगी ! सुलझती दिखाई देती है पर उलझती ही जाती है !
    सभी रचनाएँ बहुत ही सुन्दर, सहज एवं दिल को छूने वाली हैं !
    आपको बहुत बधाई सीमा स्मृति जी !

    ~सादर
    अनिता ललित

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  7. zindagi ko aapne bahut hi sunderta se abhivyakt kiya hai seema ji...dil ko choo lene wali kshnikaye...bahut bahut badhai

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  8. Is kavita ko padh aapke jivan ki maulik anubhuti pata chalti hai jo ek sahityakar ya kavi hi kar sakta hai.... :)

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