Wednesday, February 5, 2014

चलो मीत

रामेश्वर काम्बोज  हिमांशु
बहुत रहे हो इस जंगल में
अब तो यारो चलना होगा ।
जिसको समझा शुभ्र चाँदनी
वह सूरज है, जलना होगा ।
सोच-समझकर सदा बनाई
हमने अपनों की परिभाषा
फिर भी खाई चोट उम्रभर
अब हर शब्द बदलना होगा।
सूरज ढलता और निकलता
इसी फेर में ढली उमरिया 
चलो मीत अब बाट पुकारे
हमको दूर निकलना होगा ।
-0-
(25 दिसम्बर-2013)

17 comments:

  1. सोच-समझकर सदा बनाई
    हमने अपनों की परिभाषा
    फिर भी खाई चोट उम्रभर
    अब हर शब्द बदलना होगा। …. ek ek shabd maano jeevan ke anbhav ki aanch me tapa hua sona …. bahut sundar evam sarthak rachna

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    1. bahut sundar geet bhaisahab , ek ek shabd man ko chhuta hua , hardik badhai

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  2. फिर भी खाई चोट उम्रभर
    अब हर शब्द बदलना होगा।
    bhaiya ye hi duniya hai ham samajh nahi pate .pr fir bhi rahna to inhi ke beech hai
    bahut sunder likha hai
    rachana

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  3. Bahut khub kaha apne, kaataon bhari rah ko phulon men badlna mushkil hota hai kyon na tyag den aisi raahe bahut acchha kaha aapne hardik badhai...

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  4. जिसको समझा शुभ्र चाँदनी
    वह सूरज है, जलना होगा ।
    जिंदगी का ताना -बाना कुछ ऐसा ही है। हर शब्द निर्मल मन की गवाही भरता है। जिंदगी के सफर में उलझनों में सही दिशा दिखाती है ये कविता। सुंदर रचना के लिए बधाई !

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  5. बहुत सशक्त रचना ....!!
    चलना ही है रुकना नहीं है नाम ज़िंदगी ....
    मेहनत को यूं देती नहीं आराम ज़िंदगी ...!!
    बहुत सुंदर भाव .

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  6. बहुत ह्रदयस्पर्शी रचना....हार्दिक बधाई !

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  7. सोच-समझकर सदा बनाई
    हमने अपनों की परिभाषा
    फिर भी खाई चोट उम्रभर
    अब हर शब्द बदलना होगा।.....waah Bhai sahab ..bahut khoob

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  8. भावों में भीगा एक एक शब्द मर्मस्पर्शी है .....

    फिर भी खाई चोट उम्रभर
    अब हर शब्द बदलना होगा।...और ..आपकी लेखनी सामर्थ्यवान है ...सादर नमन !

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  9. jiwan ke atal satya ko pramanit karti umda rachna ..sadar naman

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  10. सोच-समझकर सदा बनाई
    हमने अपनों की परिभाषा
    फिर भी खाई चोट उम्रभर
    अब हर शब्द बदलना होगा।
    कितनी सच्चाई है इन शब्दों में...हर एक शब्द मन में गहरे उतर गया...| बधाई और आभार...|

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  11. "बहुत रहे हो इस जंगल में

    अब तो यारो चलना होगा ।".............बहुत सुंदर रचना !

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  12. सच है, अपनी अपनी ज्योति ढूँढ लें।

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  13. बहुत खूब,सुंदर रचना !

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  14. दिल को छूने वाले भाव, दिल में उतरने वाली अभिव्यक्ति ...
    भैया जी, बहुत सुन्दर लिखा है आपने !

    ~गैर हाथों में भले मरहम न हो,
    अपनों के हाथों दिल कभी टूटे न...~

    ~सादर
    अनिता ललित

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  15. सोच-समझकर सदा बनाई
    हमने अपनों की परिभाषा
    फिर भी खाई चोट उम्रभर
    अब हर शब्द बदलना होगा।

    जीवन की कड़वी सच्चाई समेटे एक मीठी रचना ......ये कृति लोगों की प्रेरणा का स्रोत!!!! बहुत खूब भाईसाहब .......

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  16. बहुत ह्रदयस्पर्शी रचना..

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