Saturday, August 31, 2013

अभिनव इमरोज़ को प्रथम पुरस्कार

उत्कृष्ट प्रकाशन के लिए अभिनव इमरोज़ मासिक को फ़ैडरेशन  ऑफ़ इण्डियन पब्लिशर्स द्वारा प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया है 
सभी लेखकों और पाठकों की ओर से कर्मठ सम्पादक श्री देवेन्द्र कुमार  बहल जी को हार्दिक बधाई !


















बहल जी ने लघुकथा , हाइकु, ताँका माहिया आदि को बहुत प्रोत्साहित किया है।इसके लिए साहित्य -जगत् आपका अतीव आभारी है ।

-सहज साहित्य और पथ के साथी !

क्षणिकाएँ


डॉ ज्योत्स्ना शर्मा 
1
नेता -
राजनीति के रंग मंच का 
मँजा हुआ अभिनेता !
2
चुनाव -
एक ऐसा नाटक 
जिसे अभिनेता नहीं 
नेता खेलते हैं 
मनोरंजन हमारा होता है 
खर्च भी हमीं झेलते हैं !
3
कुर्सी -
चुनाव रूपी नाटक की नायिका 
जिसके लिए नाटक से बाहर भी 
संघर्ष होता है ,
आम दर्शक 
पाँच वर्ष रोता है !
4
वोट- 
हम कुछ यूँ 
समझ पाए 
दें तो भी पछताएँ 
न दें तो भी पछताएँ !
5
कविता हमारी ,
सुलगते बारूद की 
पहली चिंगारी !
-0-
(17-08-81 )
6
मेरा मन 
आज तक 
अनगिनत बंधनों में जिया है,
मैंने उन्हें तोड़ दिया है 
लेकिन वे कहते हैं -
मैनें ठीक नहीं किया है 
क्या आप भी ऐसा ही समझते हैं ?
यकीन मानिए 
इन बंधनों में मेरे विचारों के पाँव 
बार बार उलझते हैं |
(20-03-1985 )

-0-

Sunday, August 25, 2013

कश्मीर -

 मंजु मिश्रा

बंद कर दो
खिड़की दरवाजे
इन हवाओं में दम घुटता है ....

 

गए वो दिन
जब महका करती थीं
यहाँ फूलों की वादियाँ
अब तो बस हर र से
आती है एक ही गंध
बारूद की .......

 

गए वो दिन
जब होती थीं रंगों की बहारें
यहाँ के चप्पे-चप्पे पे
अब तो खून टपकता है
यहाँ कलियों से ......

 

गए वो दिन
जब
गूँजते थे जर्रे-जर्रे से
मुहब्ब
त के तराने
अब तो बस आती हैं
मारो-मारो की आवाजें
यहाँ की गलियों से

 

गए वो दिन जब कश्मीर
हुआ करता था स्वर्ग धरती का
होते थे हरसूं प्यार के मंजर
अब तो कश्मीर को
कश्मीर कहने में भी
डर लगता है ......

 

बंद कर दो
खिड़की दरवाजे
इन हवाओं में दम घुटता है ....


-0-

Wednesday, August 21, 2013

शुभकामनाएँ !

शुभकामनाएँ हमारी ऊर्जा हैं ,शक्ति हैं! आज के दिन निश्चय करें कि सब एक -दूसरे के लिए  सहायक बने , सहयोगी बनें!!
1-अनिता ललित
मेरे प्यारे भैया!
मैं हुई निहाल....
पाकर आप -सा
भाई महान !
आपका स्नेह,
आपका आशीष
है अनमोल
मेरे लिए!
ये बंधन न्यारा
सबसे प्यारा
जो बाँधे दिलों को
प्रेम-डोर से
समाया जिसमें,
आस-विश्वास का,
निःस्वार्थ प्यार का
लौकिक भाव!
सदा रहे..
आपका साया...
मेरे जीवन पर!
आपका जीवन हो...
सुख-शांति ,सौभाग्य
अच्छे स्वास्थ्य,
से परिपूर्ण,
रचनाधर्मिता बढ़े भरपूर!
इस छोटी बहन की..
ढेरों दुआएँ..
रहेंगी सदा
आपके संग!
ये पावन प्रेम की
मधुर धारा...
सदा ही बहे..
सदा ही महके ..
ये नेह का बंधन...
हम दोनों के बीच..!
-0-
2-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
मेरी बहना
तुम हो सातों जन्मों का
सबसे बड़ा गहना ।
मुझे जो मिला सम्मान
सब धन हो गए
धूलि समान
प्यार की अनुभूति से
रोम –रोम हर्षाया
सुरभि का दरिया
ज्यों घर-आँगन में
उतर आया।
जब तक हो साँस
कुछ करूँ ऐसा कि
हर बहन का
दृढ़ हो विश्वास।
पावनता बहे
मन के द्वार
न हो कभी दु:ख का
तनिक भी आभास।
जीवन में कुछ ऐसा
मैं कर जाऊँ
उजाला लाऊँ
 सुरभि फैलाऊँ
धूप कीआँच
 तुम तक न आए
पथ में सुमन
खिल-खिल जाएँ!

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Tuesday, August 20, 2013

पावन एक मन

सभी बहनों को रक्षाबन्धन की कोटिश: बधाइयाँ !
सबका जीवन सुखमय हो !!
रामेश्वर काम्बोज- हिमांशु’
1
भले दो तन
पावन एक मन
भाई -बहन
2
आँच न आए
जीवन में ज़रा-सी
भाई की दुआ ।

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20 अगस्त-2013

Monday, August 19, 2013

सावनी हाइकु


नीला नभ .. दूर क्षितिज पर  आँचल लहराती चली आ रही  मेघा रानी ,  पेड़ों के पीछे छुपा है नटखट पवन... अरे ये तो मेघा रानी को दौड़ा रहा है ...ये क्या दौड़ते - दौड़ते मेघारानी  तो नकचढ़ी बिजली से टकरा गई... उफ़ गगरी फूट गई और झर- झर  गिरने लगे सावनी हाइकु   
 कमला निखुर्पा 
1
हवा   दौड़ाए 
भागी भागी फिरे है 
मेघा पगली।
2
गिरी धम से 
टकराई बिजली 
फूटी गागर।
3
चूनर हरी 
भीगी वसुंधरा की 
सिहर उठी
4
मुख निहारे
निर्मल  नीली  झील 
बनी दर्पण।
5
पावस रानी 
टिप टिप बजाए 
जल तरंग । 
6
झूमे रे तरु 
पपीहरा गाए है 
नाचे है मोर।
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१९ अगस्त २०१३ 

Thursday, August 15, 2013

गड़ती कीलें

कमला निखुर्पा
1
आजादी - पर्व 
है भारतवासी को  
देश पे गर्व । 
2
उड़ता मन 
विस्तृत नभ में 
तिरंगे- संग । 
 3
गाए अवाम 
एक सुर में आज 
वन्देमातरम् । 
 4
लगाए गश्त 
चौकस हैं  निगाहें 
सीमा - प्रहरी । 
 5
लगाता घात 
मित्र बनके , शत्रु 
चौकस रहो । 
 6
गड़ती  कीलें 
देख तेरा ताबूत  
माँ के दिल में । 
 7
मिट  के भी तू 
अमर है  शहीद
गूँजे ये गीत । 

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पूछे बिटिया-

सुशीला शिवराण
1
देश स्वाधीन
शौर्य हुआ है पंगु
आदेश बिन ।
2
सशस्त्र फौजी
खुद की रक्षा हेतु
स्वीकृति माँगे ।
3
पूछे बिटिया-
कब देगी आज़ादी
मुझे सुरक्षा ।
4
मुल्क आज़ाद
पाबंदी की जंजीरें
औरतें कैद ।

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Thursday, August 8, 2013

जटिल प्रश्न

डॉ कविता भट्ट
डॉ0 कविता भट्
दर्शनशास्त्र विभाग,हेमवती नन्दन बहुगुणा
 गढ़वाल विश्वविद्यालयश्रीनगर गढ़वाल' उत्तराखण्ड 

1-जटिल प्रश्न पर्वतवासी का

शिवभूमि बनी शवभूमि अहे!
मानवदम्भ के प्रासाद बहे।
दसोंदिशाएँ स्तब्ध, मूक खड़ी,
विलापमय काली क्रूर प्रलय घड़ी।
क्रन्दन की निशाउषा साक्षी बनी,
शम्भु तृतीय नेत्र की जलअग्नि।
पुष्पमालाओं के ढोंगी अभिनन्दन,
असीम अभिलाषाओं के झूठे चन्दन।
न मुग्ध कर सके शिवशक्ति को,
तरंगिणी बहाती आडंबरभक्ति को।
नि:शब्द हिमालय निहार रहा,
पावन मंत्र अधरों के छूट गये।
प्रस्तर और प्रस्तर खंड बहे,
सूने शिव के शृंगार रहे।
जहाँ आनन्द था, सहस्त्र थे स्वप्न,
विषाद, बहा ले गया, शेष स्तम्भन।
कुछ शव भूमि पर निर्वस्त्र पड़े,
अन्य कुक्कुर मुख भोजन बने,
भोज हेतु काक विवाद करते,
गिद्ध कुछ शवों पर मँडराते।
अस्तव्यस्त और खंडहर,
केदारभूमि में अवशेष जर्जर।
कोई कह रहा, था यह प्राकृत,
और कोई धिक्कारे मानवकृत।
आज प्रकृति ने व्यापारी मानव को,
दण्ड दिया दोहन का प्रकुपित हो,
उसकी ही अनुशासनहीनता का।
कौन उत्तरदायी इस दीनता का?
नाटकीयता द्रुतगति के उड़न खटोलों से,
विनाश देखा नेताओं ने अन्तरिक्ष डोलों से,
दोचार श्वेतधारियों के रटे हुए भाषण,
दिखावे के चन्द मगरमच्छ के रुदन।
इससे क्या? मंथनगहन चिंतन के विषय,
चाहिए विचारों के स्पंदन, दृढ़निश्चय।
क्योंकि जटिल प्रश्न पर्वतवासी का बड़ा है,
जो देवभूमिश्मशान पर विचलित खड़ा है।
-0-

2-विवश व्यवस्था
समय की गति में बहती रही है,
दलालों के हाथों की लँगड़ी व्यवस्था
निशिदिन कहानी कहती रही है
बैशाखियों से कदमताल करती व्यवस्था।
सुना है -अब तो गूँगी हुई है,
मूक पीड़ाओं पर मुस्कुराया करती व्यवस्था।
बहुत चीखता रहा आ दिन भीड़ की ध्वनि में,
फिर भी, सुनती नहीं निर्लज्ज बहरी व्यवस्था।
विषमताओं पर अट्टाहास, कभी ठहाके लगाती,
समाचारपत्रों में कराहा करती झूठी व्यवस्था।
यह नर्तकी बेच आई अब तो घूँघट भी अपना,
प्रजातन्त्रराजाओं के ताल पर ठुमकती व्यवस्था।
चन्द कौड़ियों के लिए कभी इस हाथ,
कभी उस हाथ पत्तों- सी खेली जाती व्यवस्था।
बहुत रोता रहा था, वह रातों को चिंघाड़कर,
झोपड़े जला, दिवाली मनाया करती व्यवस्था।
रात सारी डिग्रियाँ जला डाली उसने घबराए हुए,
देख आया था, नोटों से हाथ मिलाती व्यवस्था।
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ई-मेल-mrs.kavitabhatt@gmail.com

Tuesday, August 6, 2013

यादों के द्वार

गीत
डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
रस भरे गीतों की छाई बहार ,
धीरे से खोल गई यादों के द्वार

चूल्हे पे  छोटी-छोटी रोटी पकाना
अम्मा का हौले से देख मुस्कुराना
दादी का प्यार लगे देंगी जग वार
धीरे से खोल गई यादों के द्वार

जीजी से सीख लिया चोटी बनाना
भैया सिखाते थे साइकिल चलाना
दोनों की उतरन में पहना था प्यार
धीरे से खोल गई यादों के द्वार

अँगना में नीम हँसे देहरी पे आम
उमंग भरी ,झूलूँ ,दुपहरी से शाम
कौन घड़ी काट गई सपनों के तार
धीरे से खोल गई यादों के द्वार

भूल गई हँसना भूल गई गीत
रीत गई कैसे जीवन से प्रीत
लो मैंने ताक़ धरीं हसरत हजार
धीरे से खोल गई यादों के द्वार

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Friday, August 2, 2013

हाँ,इन्कार है मुझे !


सुशीला श्योराण

मैंने -
तुम्हारी दुनिया में
आ खोलीं आँखें
कितनी जोड़ी
हुईं निराश आँखें ।

कैसे कह देती है
कुहुकती कोयल को
बोझ ये दुनिया
रुनझुन उठते कदमों से
कैसे उगती हैं चिंताएँ
हर इंच बढ़ते कद के साथ
क्यों झुक जाते हैं पिता के कंधे
देहरी से बाहर निकलते ही
क्यों डर उठा लेते हैं सर
हर उन्मुक्त हँसी के साथ
पहरेदार हो जाती हैं निगाहें
बढ़ते हौसलों के साथ
बढ़ जाती है अपनों की फ़िक्र
हर उपलब्धि पर
पिता की पेशानी पर
बढ़ जाती हैं चिंता की रेखाएँ
उपयुक्त वर की तलाश की ।

और एक दिन -
कर देते हैं दान
अपनी खुशियाँ
अपना गुमान
रख देते हैं गिरवी
अपनी आन
विदाई के साथ ही
मन में कर लेती हैं घर
कितनी ही आशंकाएँ
हो जाते हैं याचक
समर्थ, गर्वित पिता
देके जिगर का टुकड़ा
हो जाते कितने  गरीब !

मेरा मन
हो उठा है विद्रोही
नहीं स्वीकार इसे
दानी पिता की दीनता
नहीं स्वीकार
संस्कृति के नाम पर
सदियों की कुरीतियाँ
जो एक बेटी को
नहीं मानती इंसान
कर देती हैं दान
ज़मीन के टुकड़े की तरह
कर देती हैं मुकर्रर
एक इंसान का मालिक
दूसरे इंसान को
इस स्वामित्व से
जायदाद होने से
हाँ,
इन्कार है मुझे !
 मैं कोई मकान
न ज़मीन का टुकड़ा
न कोई वस्तु
न नोटों की गड्डी
कि हो जाऊँ दान
या बेच दी जाऊँ

मैं एक जागरूक 
जीती जागती इंसान
परंपरा के नाम पर
जायदाद

गुलाम होने से
हाँ,
इन्कार है मुझे ।
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