Sunday, July 28, 2013

मंजुल भटनागर की दो कविताएँ

मंजुल भटनागर  की दो कविताएँ
1-पेड़ की दुनिया
मंजुल भटनागर

वो जो देते हैं
साया चिड़ियों को
घर बनाने का
वो उस घर का किराया नहीं लेते
यह पेड़ ही हैं -----
जो बसा लेते हैं पूरी दुनिया
अपने साये तले
पर भूल के भी अहसान
जतलाया नहीं करते
हम जलातें हैं चिरागों को
अपने घर के लिए
यह रौशनी कभी
चाँद सितारें नहीं लेते
वो जो चलतें हैं
रास्ते खुद बन जाते हैं
पर किसी राह को
वो अपना नहीं कहते .
2- ख़त
आसमाँ से पिघल कर बादल
गर मेरे घर पे न
आए होते
मैंने भी कुछ सपनें
हसीं सजाएँ न होते
एक बारिश ने
जिन्हें डूबा दिया
काश किसी ने वो घर
बनाए न होते ,
डूबता शहर
न डूबता मकान होता
न जाने कितने मासूम
इसने दबाए न होते
हमने भी किसी दरख़्त पर
आसरा लिया होता
जलजले के ख़त
यदि हमें आए होते । 

-0-

Wednesday, July 24, 2013

शब्दांकन पर प्रकाशित एक लघुकथा "दिस इस अमेरिका"

तुम्हें उठना ही होगा


डॉ एस. पी. सती

1.विनाश का तांडव स्तोत्र

घाटियों को पात्र बना कर
बाँधो का अम्बार लगा है
जर्रा-जर्रा नदी तटों का
मलवे से जो पटा पड़ा है
तुम कहते हो गुस्सा क्यों है?
धन-भक्तों की हवस बना है
पहाड़ पूरी दुकान-सा सजा है
बदरी से केदार गंगोत्री
बिके पड़े हैं दुकां-दुकान में
क्रोध भरा है हिमनग में जब
तुम कहते हो गुस्सा क्यों है
लाशों का अम्बार लगा है
रामबाड़ा अटा पड़ा है
कौवे-गिद्धों की दावत है
नुची लाश की अँतडियों से
घास के गुच्छे निकल रहे है
गिद्धों की सेवा लेकर तुम
लाशें कम कर दिखा रहे हो
तुम कहते हो गुस्सा क्यों है?
अविनाशी शिव चहुँ ओर से
विनाश का उद्घोष करे हैं
हतप्रभ करने वाला है यह
मगर तुम नहीं समझ रहे हो
हिमप्रदेश का धैर्य दरक कर
विनाशलीला मचा रहा है
सभी जानते अपराधी को
किसको मूरख बना रहे हो
तुम कहते हो गुस्सा क्यों है?
अमन बह गया चमन बह गया
डर तुमको बस कुर्सी का है
तुमको मौतों में भी अवसर
पर ढूँढ़े मिल नहीं रहा है
तुम बेशरम-बेहया तुम्हारे
मानवता के दुश्मन सारे
वों दिन अब बस दूर नहीं है
जब फटेंगे कुर्ते सारे
होगी जनता जब सड़कों पर
तुम कहते हो गुस्सा क्यों है..
-0-
2. तुम्हें उठना ही होगा 

उठो तुम्हें उठना ही होगा 
चले गए सैलानी जबसे
मरघट -सी खामोशी है,
जार-जार रोती है घाटी
गाँव-गाँव में मातम है.
एक गाँव में पौध मिट गई
बना दूसरा विधवा बस्ती
एक पूरा उजड गया तो
घाटी का ही बुझे है चूल्हा
ज़िंदा नहीं हैं खड़े  हैं जितने
उनसे कहीं अधिक मरे हैं
मुर्दे लानत दें चीखकर
जिन्दा मगर खामोश खड़े हैं
ऐसा मंजर जहाँ-तहाँ है
कौन किसी का कहाँ -कहाँ है
मौत का तांडव ऐसा देखा
जर्रा-जर्रा काँप उठा है....

पर अब तुम सन्नाटा तोड़ो
हतप्रभ रहने से क्या होगा
उठो पुनः निर्माण करो अब
साँसे भरने लगो उठो फिर
खोया सबकुछ फिर आएगा
जिन्दा तुम हो यकीं करो तो
कमर बाँध कर अँगड़ाई लो
यही नीति है यही धर्म है
तुम ना थके हो तुम ना थकोगे
क्रन्दन को तू बदल चीख में
तू ही खुद है भाग्य विधाता
तू ही सर्जक कर्मवीर तू
जिन पर तू है आस लगाए
वे कव्वे है गिद्ध भेड़िए
वे तुझको बस नोच सके हैं
तू उनसे उम्मीद ना कर
तू खुद नव निर्माण करेगा
नवसर्जन का प्राण बनेगा
उठो धरा फिर सजना है
उठ शंकर तू धारी भी तू
उठो-उठो अब बहुत हो चुका
मरघट को ज़िंदा करना है ।
-0-
ज्योलॉजी विभाग
हेमवती नन्दन बहुगुणा विश्वविद्यालय
श्रीनगर ( गढ़वाल), उत्तराखण्ड-246174
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Wednesday, July 17, 2013

आँखें क्यों गीली हैं

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
अब घोर अँधेरा है
क्यों रोता साथी
नज़दीक सवेरा है  ।
2
राहें पथरीली हैं
आगे जब बढ़ना
आँखें क्यों गीली हैं ।
3
अन्धड़ भी आएँगे
जो चाहे चलना
वे रोक न पाएँगे ।
4
ताण्डव  जब होता है
बचता कौन भला
बादल जब रोता है ।
5
कुछ ऐसे जतन करो
घाव पहाड़ों के
मिलकर सब लोग भरो ।
6
पेड़ों की हरियाली
लूटे  ना कोई
टूटे  ना इक डाली ।
7
कुछ जान न पाओगे
दु:ख जब पूछोगे
चोटें ही खाओगे ।
8
कितने भी जतन करें
वाणी नीम पगी
कड़वे ही वचन झरे ।
9
सीमा है कहने की
तार-तार टूटी
हिम्मत भी सहने की ।
10
बातों की चोट बड़ी
काँटा तो निकले
निकले कब कील गड़ी ।

-0-

Friday, July 12, 2013

मेरा पहाड़ी गाँव !

प्रिय साथियो ! सुभाष लखेड़ा जी के हाइकु आप कई महीने से पढ़ रहे हैं ।'मेरा पहाड़ी गाँव' कविता पढ़कर सम्भव है हम भी अपने गाँव के बारे में सोचने लगें ।लगता है अब हमारे गाँव हमारे लिए केवल सपना बनने की राह में हैं। -रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

     
सुभाष लखेड़ा 
मानता हूँ मैं  प्रगति की बात
मेरे इस देश में यह जरूर हुई है ;
लेकिन मेरा गाँव  
इस प्रगति की वजह से वीरान होता गया
वहाँ  रहने वाला आदमी बूढ़ा हो गया  
वहाँ  का बच्चा वहाँ  नहीं
किसी नगर - महानगर में समय से पहले जवान हो गया।
मैं मानता हूँ की देश - दुनिया में खेती में बदलाव आया है 
किन्तु मेरे गाँव  में जगह - जगह " जख्या *" उग आया है  
बंजर होती गयीं माथि और मुड़ी सार** 
जिनमें कभी लहलहाती थी फसलें  
मेरे ज़माने के बच्चे गाया करते थे गीत 
और नज़र आतीं थी भेड़ - बकरियों के रेवड़

मैं यह भी जानता हूँ कि देश - दुनिया में औद्योगिक क्रांति हुई है 
लेकिन मेरे गाँव  में तो अब नहीं रहे वे टम्टे, लुहार, कोली और सुनार 
जो बनाते थे बर्तनखेती के लिए लौह औजार 
ओढ़ने के लिए ऊनी कम्बल और दुलहनों के लिए जेवरात 
वे न जाने कहाँ  चले गए,
तरसता है मेरा मन उन्हें देखने के लिए।
मुझे यह  पता है वहाँ  अब अपनी सरकार है 
मेरे गाँव में अब पुलिस चौकी है
जिसमें एक सिपाही सोया रहता है 
एक स्कूल है जिसमें अध्यापक कभी -कभार आता है 
दस किलोमीटर दूर एक अस्पताल है ; जहाँ  डाक्टर नहीं मिलता है
कुछ बूढ़े मर्द,कुछ महिलाएँ और कुछ बच्चे हैं 
जो सरकारी सस्ता आटा - चावल खाते हैं
दिन काटते हैं, काम करने के बजाय जूँ मारते हैं। 

दरअसल,  मेरा गाँव  बूढ़ा हो गया है 
उसकी मौत की खबर आएगी 
यह तो मैं जानता हूँ ;
लेकिन कब ?
इतना नहीं जानता
दरअसल, मैं भी बूढ़ा हो चला हूँ 
मैं कैसे बता सकता हूँ - पहले कौन मरेगा ?
मैं या मेरा गाँव  ? खैर, खबर मेरी मिले या मेरे गाँव  की 
इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा 
इस देश को न मेरी जरूरत है न मेरे गाँव  की !
-0-
जख्या* = एक जंगली पौधा जिसका घर के आसपास 
                                उगना अशुभ माना जाता है। 

माथि और मुड़ी सार** = गाँव से ऊपर और नीचे के खेत। 

Wednesday, July 10, 2013

नदियाँ बस खामोश


मंजुल भटनागर

समुन्दर उछाल मारता ,
कहता बरबाद दरीचों का अफ़साना
नदियाँ बस खामोश हैं ।

शहर लापता थे
घरौन्दे जमींदोज़
वो कौन लापता था ,पता चला आया जब होश
समुन्दर उछाल मारता,
नदियाँ बस खामोश हैं ।

बोधिसत्व भी जल उठा ,
लहू बन कैनवस रंग चुका
यह कौन दर्द बाँट रहा , प्रकाश- पुंज ढाँप रहा
फिर भी बुद्ध खामोश है ।

फुहारें हैं, सावन पुरजोर है
रास्तों में उगी टहनियों की कहानी कुछ और है
फूल तो खिलें हैं कई ,जो बिछड गए
उनकी निशानियाँ कुछ और हैं

आँखें इंतज़ार करतीं ,जुबाँ कुछ बोलती है
नश्तर चुभते जब सुर्खियाँ कुछ और बोलतीं
जो गुजरे उस जमीं से पुरुषार्थी
कुर्बानियाँ उनकी कुछ और बोलतीं
समुन्दर उछाल मारता ,
नदियाँ बस खामोश हैं।
-0-


Saturday, July 6, 2013

जाने क्या हुआ !


   पुष्पा मेहरा 

  यह क्या हुआ !
  स्तब्ध दिशाएँ हो गईं
  सो गए हैं शब्द
  मौन वाणी हो  गयी ।

  धुंध है, खामोशी है,
  बेचैनी है फ़िज़ाओं में
  आँखें अँधेरा चीर कर
  रोशनी खोजती हैं ।

  अश्रु ढल- ढल 
  नदी बन गए हैं
  पहाड़ी नदी से  
  दर्द अपना कह रहे हैं।

  आकाश भीगा-
  ठहरा हुआ है
  द्रवित किरणें  सूर्य की
  अर्पण- भाव- रंजित हैं।

  चाँद खामोश,
  चाँदनी -
  अश्रु- जल ले
  उतरी हुई है ।

  झिलमिलाहट सितारों की-
  सहमी हुई है,
  हवाओं की सनसनाहट में-
  अकुलाहट  भरी है ।

  ख़ामोशियाँ -
  दर्द की चादर में लिपटीं,
  निर्वस्त्र- पर्वत- शिखर-
  अंग- अंग शिथिल हैं

  शोर है, आवाज़ है,
  सन्नाटा घिरा है
  उसकी लम्बी ज़िन्दगी
  घर-घर जा बसी है।

  बादलों को-
  आज जाने क्या हुआ !
  विक्षिप्त से उत्पाती बने
  जो डोलते हैं।
 "देव-बन्धु! यह क्या कर गए

 विक्षिप्त-उत्पाती क्यों हो गए।’’