Sunday, April 28, 2013

उड़ान


रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

बच्चा नहीं चाहता-
छाया: सुशान्त काम्बोज
दीवारों की क़ैद
उसे चाहिए -
खुली खिड़की ,
खुला दरवाज़ा
खुला आसमान
ऊँची उड़ान ;
चिड़ियों के साथ उड़ना
तितलियों के पीछे दौड़ना
कोयल का गीत सुनकर
हुमकना , ठुमकना ।
नहीं चाहिए -
पर्दों वाली खिड़की ,
चाहिए -
नीले सागर- सा फैला
खुला आसमान ।
नहीं चाहिए -
पन्थ
न कोई ग्रन्थ,
उसे चाहिए-
एक पाक शफ़्फ़ाक पन्ना,
जिस पर वह लिख सके
आज़ाद दुनिया की
आज़ाद बातें,
मुस्कानों की सौग़ातें
-0-

Friday, April 26, 2013

उड़कर नहीं देखा


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
बीती हुई बातों से बिछुड़कर नहीं देखा ,
क्यूँ पास में थे पंख फिर उड़कर नहीं देखा ।
वो प्यास से तड़पा बहुत ,शहरी गुरूर में ,
था गाँव में पनघट, मगर मुड़कर नहीं देखा ।
कुछ भी कठिन नहीं था,रही इक भूल हमारी ,
बस एक ने भी एक से जुड़कर नहीं देखा ।
बेपर्दगी , गुरबत का दर्द झेलना पड़ा ,
जब पाँव ने चादर में सिकुड़कर नहीं देखा ।
ये नफरतों की आग बुझे भी तो किस तरहा ,
आँखों के समंदर ने निचुड़कर नहीं देखा ।
12-04-2013

Sunday, April 21, 2013

सिन्दूरी आसमान


डॉ हरदीप सन्धु 
डॉ ज्योत्स्ना
1.
सुहानी भोर 
सागर की लहरें 
मचाएँ शोर 
2.
भोर की बेला 
चीं -चीं गाए चिड़िया 
मन अकेला 
3.
भोर किरण 
सिन्दूरी आसमान 
मंद पवन 
4.
हँसा सवेरा 
खिड़की से झाँकती 
स्वर्ण रश्मियाँ । 
5.
धीमी पवन 
पँखुरी भरे आहें 
खुशबू मन 
-0-

Tuesday, April 9, 2013

कहाँ विश्राम लिखा !( नव संवत्सर पर विशेष)


डॉ•ज्योत्स्ना  शर्मा

सुन सखी ! कहाँ विश्राम लिखा !
मैंने तो आठों याम लिखा ।
पथ पर कंटक,  चलना होगा,
अँधियारों में जलना होगा ।
मन- मरुभूमि सरसाने को 
हिमखंडों- सा, गलना होगा ।
शुभ, नव संवत्सर हो सदैव ,
संकल्प यही सत्काम लिखा।।

केवल जीने की चाह नहीं ,
भरनी मुझको अब आह नहीं ।
फूल और कलियाँ मुस्काएँ
गूँजे न कोई कराह कहीं ।
नव आगत तेरे स्वागत में 
पल का प्यारा पैगाम लिखा ।।

समय मिलेगा फिर बाँचेगा
मेरी भी कापी जाँचेगा।
रहे हैं कितने प्रश्न अधूरे ;
कितने उत्तर सही हैं पूरे ।
जीवन के खाली पन्नों पर -
साँसों का बस संग्राम लिखा ।।

मैंने तो आठों याम लिखा ,
सुन सख! कहाँ विश्राम लिखा !
-0-

Thursday, April 4, 2013

साँसों के हस्ताक्षर


डॉ अनीता कपूर
 हर एक पल पर अंकित कर दें
साँसों के हस्ताक्षर
परिवर्तन कहीं हमारे चिह्नों   पर
स्याही न फेर दे
साथ ही
जिंदगी के दस्तावेजों पर
अमिट लिपि में अंकित कर दे
अपने अंधेरे लम्हों के स्याह हस्ताक्षर
कल को कहीं हमारी आगामी पीढ़ी
भुला न दे हमारी चिन्मयता
चेतना लिपियाँ
प्रतिलिपियाँ….
भौतिक आकार मूर्तियां मिट जाने पर भी
जीवित रहे हमारे हस्ताक्षर
खोजने के लिए
जीवित रहें हमारे हस्ताक्षर
कहीं हमारा इतिहास
हम तक ही सीमित न रह जाये
इसीलिये आओ
प्रकृति के कण-कण में
सम्पूर्ण सृष्टि में
चैतन्य राग भर दें
अपनी छवि अंकित कर दें
दुनिया की भीड़ में खुद को
शामिल न करें।
भविष्य की याद हमें स्वार्थी बना कर
आज ही पाना चाहती है
अपना अधिकार
न हम गलत है, न हमारे सिद्धांत
फिर भी
स्वार्थी कहला कर नहीं लेना चाहते
अपना अधिकार
आओ
अंकित कर दें
हर पल पर
अपनी साँसों के हस्ताक्षर  ।
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Wednesday, April 3, 2013

अक्सर



अनिता ललित
1
रिश्तों के गहरे मंथन में
उलझी जब भी मैं धारों में ...
घुट-घुट गईं साँसें मेरी,
छलकीं.... अश्कों की कुछ बूँदें..
और नीलकंठ बन गई मैं ...
अपनों की दुनिया में .... अक्सर .....
2
जीवन के गहरे अँधेरों को..
ना मिटा सके जब... चँदा-तारे भी...
बनकर मशाल खुद जली मैं...
और राहें अपनी ढूँढ़ीं मैनें... अक्सर.....
3.
कई बार...अपने आँगन में...
जब दीया जलाया है मैनें,
संग उसके....खुद को भी जलाया है मैनें...
और खुद ही... अपनी राख बटोरी मैनें....अक्सर...
4.
तमन्नाओं के सहरा में भटकते हुए...
ऐसा भी हुआ कई बार....
थक कर जब भी बैठे हम.....,
खुद आप ही...  गंगा-जमुना बने हम.....अक्सर...
-0-
इनकी अन्य कविताएँ इसलिंक पर भी पढ़ी जा सकती हैं।