Sunday, August 25, 2013

कश्मीर -

 मंजु मिश्रा

बंद कर दो
खिड़की दरवाजे
इन हवाओं में दम घुटता है ....

 

गए वो दिन
जब महका करती थीं
यहाँ फूलों की वादियाँ
अब तो बस हर र से
आती है एक ही गंध
बारूद की .......

 

गए वो दिन
जब होती थीं रंगों की बहारें
यहाँ के चप्पे-चप्पे पे
अब तो खून टपकता है
यहाँ कलियों से ......

 

गए वो दिन
जब
गूँजते थे जर्रे-जर्रे से
मुहब्ब
त के तराने
अब तो बस आती हैं
मारो-मारो की आवाजें
यहाँ की गलियों से

 

गए वो दिन जब कश्मीर
हुआ करता था स्वर्ग धरती का
होते थे हरसूं प्यार के मंजर
अब तो कश्मीर को
कश्मीर कहने में भी
डर लगता है ......

 

बंद कर दो
खिड़की दरवाजे
इन हवाओं में दम घुटता है ....


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10 comments:

  1. सच के साथ सार्थक लेखन

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  2. बिल्कुल सही कहा...दम घुटने जैसा ही माहौल है...

    गए वो दिन
    जब होती थीं रंगों की बहारें
    यहाँ के चप्पे-चप्पे पे
    अब तो खून टपकता है
    यहाँ कलियों से ......

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  3. बहुत सही कहा आज यही माहौल है..

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  4. "बंद कर दो/खिड़की दरवाजे/इन हवाओं में दम घुटता है "....कश्मीर के मौजूदा हालात से उपजी पीड़ा सहजता से उभरी और कविता बन गयी ! लेकिन आपका सृजन स्थिति को बेहतर बनाने में मददगार हो, इस कामना के साथ मंजु मिश्रा जी आपको इस पीड़ा के सही शब्द चित्रण के लिए हार्दिक बधाई !


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  5. क्या से क्या हो गया कश्मीर

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  6. बहुत सामयिक, सशक्त प्रस्तुति ..

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  7. सभी आदरणीय पाठकों को सार्थक टिप्पणियों हेतु धन्यवाद !

    बचपन में पढ़ा था स्कूल की किताब में कश्मीर के लिए की यदि धरती पर स्वर्ग है तो यहीं है यहीं है यहीं है …. आज जब भी इस धरती के स्वर्ग की दुर्दशा के बारे में सुनती हूँ/पढ़ती हूँ तो मन को बहुत कष्ट होता है …


    सादर
    मंजु

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  8. samakasara dard bhavon mein vyakt karati kavita haibadhai.
    pushpa mehra.

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  9. सच का साक्षत्कार , सशक्त रचना .

    बधाई .

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  10. सच को बयान करती और बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती एक मर्मस्पर्शी कविता...हार्दिक बधाई...|
    प्रियंका गुप्ता

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