Wednesday, July 10, 2013

नदियाँ बस खामोश


मंजुल भटनागर

समुन्दर उछाल मारता ,
कहता बरबाद दरीचों का अफ़साना
नदियाँ बस खामोश हैं ।

शहर लापता थे
घरौन्दे जमींदोज़
वो कौन लापता था ,पता चला आया जब होश
समुन्दर उछाल मारता,
नदियाँ बस खामोश हैं ।

बोधिसत्व भी जल उठा ,
लहू बन कैनवस रंग चुका
यह कौन दर्द बाँट रहा , प्रकाश- पुंज ढाँप रहा
फिर भी बुद्ध खामोश है ।

फुहारें हैं, सावन पुरजोर है
रास्तों में उगी टहनियों की कहानी कुछ और है
फूल तो खिलें हैं कई ,जो बिछड गए
उनकी निशानियाँ कुछ और हैं

आँखें इंतज़ार करतीं ,जुबाँ कुछ बोलती है
नश्तर चुभते जब सुर्खियाँ कुछ और बोलतीं
जो गुजरे उस जमीं से पुरुषार्थी
कुर्बानियाँ उनकी कुछ और बोलतीं
समुन्दर उछाल मारता ,
नदियाँ बस खामोश हैं।
-0-


11 comments:

  1. समय का दर्द कहती प्रभावी रचना ...बहुत बधाई मंजुल जी

    सादर
    ज्योत्स्ना शर्मा

    ReplyDelete
  2. मन शान्त हो तो विश्व अच्छा दिखता है, विश्व सच्चा दिखता है।

    ReplyDelete
  3. phool to khile hain kai..... manjul ji apki rachna badalte samay ki kahani kah rahi hai .
    pushpa mehra.

    ReplyDelete
  4. बहुत धन्यवाद रामेश्वर जी ,मेरी कविता को स्थान देनें के लियें ,शुभ कामनाएँ

    ReplyDelete
  5. सामयिक दर्दीला गीत



    बधाई

    ReplyDelete
  6. प्रवीण पाण्डेयजी Pushpa Mehraजी Manju Guptaजी ज्योति-कलश जी आप सभी गुणी जन का आभार ,धन्यवाद कविता पर टिपण्णी के लिए ,शुभ कामनाएं .

    ReplyDelete
  7. सामयिक प्रभावी रचना! मंजुल जी, बधाई !

    ReplyDelete
  8. समय के प्रवाह में बहुत कुछ बह जाता है ...

    ReplyDelete
  9. बहता हुआ दर्द..

    ReplyDelete
  10. बहुत मार्मिक...कितना दर्द है...सीधे दिल में उतरती है ये कविता...|
    बधाई...|

    प्रियंका गुप्ता

    ReplyDelete
  11. आज की त्रासदी का दर्द बया करती यह रचना दिल को छू गयी... सादर

    ReplyDelete