Thursday, June 20, 2013

जख़्मी साहिल

[अपनापन कई बार शब्दों की पहुँच से परे हो जाता है, तो चुप्पी में बदल जाता है । अपने दर्द की खुद को जब  आदत- सी हो जाती  है तो लगता है इसको यहीं छुपा लो ,बिखर गया तो ज्यादा टीस देगा । इसी विषय पर आज सहज सहित्य में डॉ हरदीप सन्धु के हाइकु का गुलदस्ता ,आप सबकी भेंट]
1
हाथों से मिटी 
खुशियों की लकीरें 
बिखरा दर्द । 
2
मेरी तन्हाई 
मेरे साथ चलती 
ढूँढ़े साहिल । 
3
छोड़ वजूद 
रेत पर लकीरें 
लौटी लहरें । 
4
शान्त सागर 
बेचैन- सी लहरें 
जख़्मी साहिल । 

-0-

16 comments:

  1. छोड़ वजूद
    रेत पर लकीरें
    लौटी लहरें ।
    ....सभी हाइकु भाव और अर्थपूर्ण हैं।

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    1. waah sandhu ji bemishal haiku sabhi ek se badhkar ek

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  2. वाह , बेमिसाल प्रेरणादायक सारे हाइकु .


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  3. amita kaundal20 June, 2013 20:29

    हरदीप यह दर्द की चुप्पी ह्रदय को मजबूत करती है. बहुत अच्छे हाइकु हैं।
    सादर,
    अमिता कौंडल

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  4. शान्त सागर
    बेचैन- सी लहरें
    जख़्मी साहिल ।
    ------------
    हरदीप सन्धु जी के सभी हाइकु बेहतरीन हैं। हार्दिक बधाई !

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  5. छोड़ वजूद
    रेत पर लकीरें
    लौटी लहरें ....

    antarman ki bekali ko vyakt karte huye sabhi haiku bahut sundar hain... jo aya hai use jana to hoga hi .... ab chahe jane se jitna bhi dukh kyon na ho.

    aajkal wordpress ki id se comment post nahin hote, isi liye anonymous post karne padte hain. pata nahin kya prbolem agar koi sujhav ho is samasya se nibatne ke liye, to avashya batayen.

    Dhanyawad
    Manju Mishra
    www.manukavya.wordpress.com

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  6. waahhh umdaa haiku ... chuppi dard sannata ... ko avivyakt karti man ko chhu gayi .. saadar naman :)

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  7. सभी उत्तम हाइकु!
    छोड़ वजूद
    रेत पर लकीरें
    लौटी लहरें ।
    यह अति उत्तम....हरदीप जी हार्दिक बधाई!

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  8. Adarniya Hardeep Sandhu ji- Aap ke sabhi haiku mere liye goonge ka gud ban gaye hain jis ki mook bhasha main
    bhavanaon ki lahren hain. Badhai

    pushpa mehra

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  9. हाथों से मिटी
    खुशियों की लकीरें
    बिखरा दर्द ।
    अत्यंत भाव प्रबल ....सभी हाईकू .....
    शुभकामनायें हरदीप जी ....

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  10. सुन्दर व संक्षिप्त संप्रेषण

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  11. ये सुन्दर हाइकू का गुलदस्ता बहुत मन भाया...बहुत बधाई...|

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  12. बनते-मिटते रेत के निशाँ , उन निशानों पर चलते तनहा कदम ... लहरों सा बेचैन मन ... साहिल के जख्म तो लहरे सहला रही है पर मन ???? मन की गाथा को गुलदस्ते में समेटकर हमें देने के लिए डॉ हरदीप सन्धु को धन्यवाद |

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  13. शब्दों में साकार व्याकुलता ....बहुत प्रभावी !!
    ज्योत्स्ना शर्मा

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  14. बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

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  15. Kamboj jee,
    Aapne yeh blog bana kar hindi sahitya mein ek naya adhyaya jod diya hai.
    Dhanyawad.

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