Saturday, May 25, 2013

तुम्हारी याद

डायरी क्रमांक-2 (शनिवार 27 फ़रवरी 1982 से 6 जून 1983 सोमवार) यह डायरी मिली । तो नज़र गई 16 अप्रैल  1982 को लिखे 7 हाइकु  पर ,जो बाज़ार पत्रिका मासिक ( एम डी एच ग्रुप)दिल्ली   के अगस्त 1982 अंक में छपे। )
-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
तुम्हारी याद
बाढ़ में बहकर
हुए आबाद ।
2
झुके नयन-
झील में झिलमिल
नील गगन ।
3
मेरा विश्वास-
छला जाकर भी जो
बैठा है पास ।
4
दीप जलाए
रातें राह देखतीं
तुम न आए ।
5
फूटी रुलाई,
जैसे पुरानी बात
याद हो आई ।
6
भरा सन्नाटा
विषधर ने कैसे
आज भी काटा ।
7
भाग्य विधाता
अपना घर इन्हें
भरना आता ।
-0-

18 comments:

  1. प्रणाम सरजी !
    बहुत ही सुन्दर.. !

    अरुण

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  2. बहुत सुन्दर भावपूर्ण हाइकु हैं भाई जी .....
    दीप जलाए
    रातें राह देखतीं
    तुम न आए ।......और ....
    भरा सन्नाटा
    विषधर ने कैसे
    आज भी काटा ।..मन को छू गए !

    सादर
    ज्योत्स्ना शर्मा

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  3. सभी हाइकु उत्कृष्ट हैं मगर ये तो तारीफ़ के भी ऊपर हैं -

    1
    तुम्हारी याद
    बाढ़ में बहकर
    हुए आबाद ।
    2
    झुके नयन-
    झील में झिलमिल
    नील गगन ।
    3
    मेरा विश्वास-
    छला जाकर भी जो
    बैठा है पास ।

    बधाई स्वीकारें श्रेष्‍ठ सृजन के लिए।

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  4. झुके नयन-
    झील में झिलमिल
    नील गगन ।
    3
    मेरा विश्वास-
    छला जाकर भी जो
    बैठा है पास ।

    बहुत अच्छे हाइकु...सादर बधाई !!

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  5. सारे हाइकु बहुत मर्मस्पर्शी है पर यादों की बाढ़ में बह जाना फिर आबाद होना बिलकुल नवीन उद्भावना है ...
    तुम्हारी याद
    बाढ़ में बहकर
    हुए आबाद ।
    सादर |

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  6. साहित्यिक परिपक्वता में तपे सुंदर हाइकु .

    बधाई .

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  7. बहुत खूबसूरत भाव पूण .

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  8. वाह! बहुत ही सुंदर!
    याद की बाढ़ में आबाद होना व छले जाने पर भी विश्वास का अडिग रहना.. दोनों तो दिल को छू गये..!
    सभी हाइकु उत्कृष्ट श्रेणी के भैया जी!
    बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें!
    ~सादर!!!

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  9. तुम्हारी याद
    बाढ़ में बहकर
    हुए आबाद ।

    मेरा विश्वास-
    छला जाकर भी जो
    बैठा है पास ।
    बहुत ही सुन्दर...बहुत-२ बधाई।

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  10. संक्षिप्त और प्रभावी..

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  11. बहुत ही सुन्दर, मर्मस्पर्शी हाइकु...बधाई और आभार...|
    प्रियंका

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  12. यूँ तो सभी हाइकु उत्कृष्ट हैं, पर ये कुछ ज्यादा पसंद आए...
    तुम्हारी याद
    बाढ़ में बहकर
    हुए आबाद ।

    फूटी रुलाई,
    जैसे पुरानी बात
    याद हो आई ।

    कितनी सरलता से मन के भाव कह गए ये हाइकु. कई दशक पूर्व लिखी गई आपकी रचना पढ़कर बहुत हर्ष हुआ, सादर धन्यवाद.

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    1. वाह!सभी बहुत ही सुंदर!
      मेरा विश्वास-
      छला जाकर भी जो
      बैठा है पास ।.......वाह!
      Dr Saraswati Mathur

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  13. बहुत ही सुन्दर और सार्थक हाइकू,आभार.

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  14. सारे हाइकु बहुत उत्कृष्ट हैं ।इतने वर्षों बाद भी ये हाइकु आज की ताज़गी बिखेर रहे हैं । सहजता से मनोभाव दिल में उतरते चले गए । इनकी तो बात ही निराली है ......
    झुके नयन-
    झील में झिलमिल
    नील गगन ।

    दीप जलाए
    रातें राह देखतीं
    तुम न आए ।

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  15. lajawab haikuz ..naman sir ji
    तुम्हारी याद
    बाढ़ में बहकर
    हुए आबाद ।

    मेरा विश्वास-
    छला जाकर भी जो
    बैठा है पास ।
    4
    दीप जलाए
    रातें राह देखतीं
    तुम न आए ।

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  16. अत्यंत भावप्रबल ...!!

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  17. मेरा विश्वास-
    छला जाकर भी जो
    बैठा है पास ....

    sach vishwas sabse bada sathi hai .... sada saath rahta hai ...

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