Wednesday, January 30, 2013

उठ जाग रे मुसाफिर !


अन्नपूर्णा बाजपेयी

उठ जाग रे मुसाफिर !
दुनिया में कुछ  सार नहीं ,
दो दिन का ये खेल तमाशा ।
क्या राजा - रंक क्या रानी ,
पंडित  ,महंत औ ज्ञानी ।
जग  सारा अकथ कहानी ,
कुछ भी यहाँ करार नहीं ,
दुनिया में है सार नहीं ।
उठ जाग रे मुसाफिर !!
सूरज चंदा औ सितारे ,
सागर, सलिल, लहर किनारे ।
एक दिन ये  नहीं रहेंगे ,
बिलकुल भी आधार नही ।
दुनिया में है सार नहीं ,
उठ जाग रे मुसाफिर !!
बन जा दुनिया से कुछ न्यारा ,
तेरा होगा तभी गुजारा ।
मानुष की  ये काया पाई ,
काहे फिरता लगी लगाई ।
फिर मिलती यह  हार नहीं ,
दुनिया में  है सार नहीं ।
उठ जाग रे मुसाफिर !!

4 comments:

  1. जूझना, थकना, पुनः जूझना..इसी प्रकार बढ़ते रहना।

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  2. यही सत्य है......
    ~सादर!!!

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  3. it's real meaning of life.............sirji

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