Monday, December 31, 2012

नया गीत


नया गीत  
डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा

नए साल में अब ,
नया गीत गाना ,
अरे बागवाँ इस
चमन को सजाना ।


नव वल्लरी ,रुत 
नई हों छटाएँ ,
तरु -वृन्द झूमें 
सरस हों घटाएँ 
कलियाँ हँसें 
फूल गाएँ तराना ।।

मुदित हो धरा 
निर्मल गगन हो 
सुखद स्वप्न सारे 
सँजोए मगन हों 
खुशियों के शतदल
मन-सरसि खिलाना ।।

प्रखर रश्मियाँ हों 
सुनहरी दिशाएँ 
सुवासित पवन 
प्रीत के गीत गाएँ 
समय तू सदा अब 
यहाँ मुस्कुराना ।।

अरे बागवाँ इस
चमन को सजाना ।।
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Sunday, December 30, 2012

अनुत्तरित प्रश्न



1-नई इबारत को श्रद्धांजलि 
मंजु गुप्ता

युग,   त्रेता,   द्वापर , लियुग में
छलती आईं नारियाँ  सदा से 
ल्या , सीता , द्रौपदी, दामिनी 
देती रहीं अग्नि परीक्षा भामिनी 
अधर्म पर धर्म की जीत बता गई .

सदा रही पाबंदियों में  नारी 
भेदभाव की सहती बीमारी
सीमाओं में बँधी बेचारी 
भयभीत  बचपन और जवानी 
अन्याय के प्रति गुहार लगा गई .

दामिनी की तस्वीर को न देखा 
चैनलों - समाचारों से सुना 
भूखे भेड़ियों ने उसे  नोचा 
सारा भारत है एक हुआ 
आंदोलनों का बिगुल बजा गई .

हो रही अब मानसिकता दूषित 
बच्ची- नारी से होता दुराचा
इंसानियत हो रही शर्मसार 
आजाद घूम रहें गुनहगार 
व्यवस्थाओं पर उँगली उठा गई .

माँ मैं  अब भी जीना चाहती
सोच थी उसकी आशावादी 
हौसले - साहस की  थी वह उड़ान 
ताकत , ऊर्जा , शक्ति की तूफ़ान 
क्रांति की मशालें जला गई .

खिड़कियाँ दिमागों की खोल गई 
राजपथ को अग्निपथ बना गई 
तेरह दिनों तक   जीवन - मृत्यु  से खेली 
शहादत को गले से लगा गई .

सत्ता के वृक्ष को हिलाकर चली गई 
लालबत्तियों को सबक सिखा रही 
दुराचारियों को भयभीत करा गई 
देशवासियों की रूह  जगा गई 

दोषियों को जब मिलेगी सूली 
तभी दामिनी को श्रद्धांजलि 
यही हर दिल की बुलंद आवाज 
यही उसकी पीड़ा का अंजाम 
नवयुग की शुरुआत करा गई . 
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2-शाश्वत प्रश्न
कविता मालवीय

 वह सूरज के नीचे खड़े होकर
अक्सर अँधेरे से डर जाता है
समझ नहीं पाता है
कि अँधेरा ही प्रकाश की फसल उगाता है,
कसके गिरो तभी उठने का मज़ा आता है,
बंद खिड़की का अवसाद ही
खुली खिड़कियों की क्रांति खटखटाता है,
आँसुओं से भरे अतीत के खेत में ही
हरे भरे वर्तमान का धान उग पाता है ,
हाशिये में लिखा नोट ही
खास मसले का पता बताता है,
किनारों पर रहने का मोह- त्याग ही
नई धरा की खोज का बीड़ा उठाता है,
बल्लीमारान की बेनूर गली क़ासिम से ही
ग़ालिब की शायरी का दरिया उफान पर आता है ,
फिर इंसान सूरज के नीचे खड़े हो कर
अँधेरे से क्यों डर जाता है?
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3-शून्‍य एहसास
सीमा स्‍मृति
    क्‍या फर्क पड़ता है
    आघात-प्रतिघात से
    जब दर्द का एहसास
    शून्‍य पड़ जाता है।
यथार्थ तड़पता है
    महज शब्‍दों के जाल में
    किसी रक्‍तहीन दिल के टुकड़े की तरह
    जो इक बूँद रक्‍त को तरसता है।
    मूल्‍यों, नैतिकता , आदर्श,
 मानवीयता की आड़ में
    अमानवीयता अनैतिकता का ताण्डव
    नृत्‍य हुआ करता है, कहते है------
कहते हैं
    ये शहर है इंसानो का
फिर क्‍यों------
    खुद अपना अक्‍स यहाँ
    इंसानियत को तरसता है ।
    अत्‍यन्‍त विस्‍तृत है जीवन
फिर क्‍यों--------
    हर शख़्स,चन्‍द लम्‍हे
    हर मुखौटा उतार,जीने से डरता है
    क्‍या फ़र्क पड़ता है
    आघात- प्रतिघात से
    जब दर्द का एहसास
    शून्‍य पड़ जाता है।
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Saturday, December 29, 2012

मन की कथा

कमला निखुर्पा



मन की कथा 
युग-युग -संचित
 मन की व्यथा
कितना ही छुपाऊँ 
बाँचती जाऊँ 
अंतर्घट कम्पन 
रोक ना पाऊँ 

यह कैसा  उत्कर्ष ?
फैला अमर्ष ।
हर बेटी सहमी
माँ डरी -डरी ।
आँखें आँसुओं -भरी
डूबती तरी
क्यों बेबस है नारी ?
शक्ति- स्वरूपा 
फिर भी क्यों बेचारी?
अपनों से क्यों हारी ?     
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नारी - कहाँ नहीं हारी?


रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

नारी
कहाँ  नहीं हारी
अस्मत की बाजी
दाँव पर लगाते रहे
सभी सिंहासन
सभी पण्डित ,सभी ज्ञानी
सतयुग हो या कि कलियुग
कायरों की टोली
देती रही
अपनी मर्दानगी का सुबूत
इज़्ज़त तार-तार करके
देवालयों में मठों में
नचाया गया
धर्म के नाम पर
कुत्सित वासना का
शिकार बनाया गया 

विधवा हुई तो
उसे जानवर से बदतर
'सौ-सौ जनम' मरने का गुर सिखाया गया,
रूपसी जब रही
तब योगी -भोगी ॠषिराज -देवराज
सभी द्वार खटखटाते रहे
छल से बल से
अपना शिकार बनाते रहे  ।
जब ढला रूप
मद्धिम हुई धूप
उसे दुरदुराया, लतियाया
दो टूक के लिए
बेटों ने , पति ने , सबने  सदा ठुकराया !
व्यवस्था बदल देंगे
सत्ता बदल देंगे !
लेकिन एक यक्ष प्रश्न मुँह बाए खड़ा है-
क्या संस्कार बदल पाएँगे ?
किसी दुराचारी के
स्वभाव की अकड़ तोड़ पाएँगे
क्या धन -बल , भुज-बल के मद से टकराएँगे ?
कभी नहीं !!!
रिश्ते भी जब भेड़िए बन जाएँ
 तब किधर जाएँगे ?
क्या किसी दुराचारी , पिता, मामा ,चाचा आदि को
घरों में घुसकर खोज पाएँगे ?
सलाखों के पीछे पहुँचाएँगे ? या
इज़्ज़त के नाम पर सात तहों में  छुपाकर
आराम से सो जाएँगे !
और नई कुत्सित दुर्घटना का इन्तज़ार करके
समय बिताएँगे !
किसी कुसंस्कारी का संस्कार
किसी बदनीयत आदमी का स्वभाव
बदल पाएँगे ?
जब ऐसा करने निकलोगे
क्या सत्ता में बैठे जनसेवकों
मठों में छुपे महन्तों,
अनाप -शनाप बोलने वाले भाग्य विधाताओं,
शिक्षा केन्द्रों में आसीन भेड़ियों को
उनके क्रूर कर्मों की सज़ा दिलवा पाओगे ?
शायद कभी नहीं , क्योंकि
सत्ता के कानून औरों के लिए हैं,
मठों में घिनौनी सूरत छिपाए
वासना के कीड़ों पर उँगली  उठाना
हमारी किताबों के खिलाफ़ है ।

अगर कुछ भी बदलना है तो
ज़हर की ज़ड़ें पहचानों
उसे काटोगे तो
 वह फिर हरियाएगी
समूल उखाड़ो !
बहन को बेटी को , माँ को
उसका सम्मान दो
हर मर्द की एक माँ ज़रूर होती है
जब कोई भेड़ियों की गिरफ़्त में होता है
उस समय माँ ही लहू के आँसू रोती है ।
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Thursday, December 27, 2012

न तुमने कुछ कहा-सात क्षणिकाएँ


अनिता  ललित
 1.
न तुमने कुछ कहा, न ही मैनें... 
मगर दोनों की खामोशी का रूप कितना जुदा था...
तुमने कभी कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं समझी .....
और मेरी आवाज़ गूँजती रही ...
मेरी झुकी पलकों के भीतर...
काश! सुन ली होती तुमने...
तो अपने बीच इस तरह चीखती ना होती....
ये खामोशी...........

2. 
अनजाने में ही सही....
तुमने ही खड़े किए बाँध... अना के....
वरना..... मेरी फ़ितरत तो पानी -सी थी....

3. 
तुमसे जुदा हुई....
तो कुछ मर गया था मुझमें...
जो मर गया था....
उसमें ज़िंदा तुम आज भी हो.....

4. 
ए खुदा मेरे ! मैं करूँ तो क्या ?
ग़मज़दा हूँ मैं... ना-शुक़्र नहीं...
एक हाथ में काँच सी नेमतें तेरी...
दूजे में पत्थर दुनिया के.....
दुनिया को उसका अक़्स दिखा...
या मुझको ही कर दे पत्थर.... 
5.
 काश ज़िंदगी ऐसी किताब होती......
कि जिल्द बदलने से सूरत-ए-हाल बदल जाते...
मायूस भरभराते पन्नों को कुछ सहारा मिलता....
धुँधले होते अश्आर भी चमक से जाते....
ज़िंदगी को... कुछ और जीने की वजह मिल जाती...
6. 
हाथ उठाकर दुआओं में...
अक्सर  तेरी खुशी माँगी थी मैनें...
नहीं जानती थी....
मेरे हाथों की लक़ीरों से ही निकल जाएगा तू... 
7.
 आँखों में चमक,
दिल में अजब सा सुक़ून हो जैसे...
माज़ी के मुस्कुराते लम्हों ने...
फिर से पुकारा हो जैसे......
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Monday, December 24, 2012

सुशीला श्योराण की दो कविताएँ



1-  खड्‍ग ले जीना होगा
सदियों से रिसी है
अंतस् में ये पीड़ा
स्‍त्री संपत्ति
पुरुष पति
हारा जुए में
हरा सभा में चीर
कभी अग्निपरीक्षा
कभी वनवास
कभी कर दिया सती
कभी घोटी भ्रूण में साँस

क्यों स्वीकारा
संपत्‍ति, जिन्स होना
उपभोग तो वांछित था
कह दे
लानत है
इस घृणित सोच पर
इनकार है
मुझे संपत्‍ति होना
तलाश अपना आसमाँ
खोज अपना अस्तित्‍व
अब पद्मिनी नहीं
लक्ष्मी बनना होगा
जौहर में आत्मदाह नहीं
खड्‍ग ले जीना होगा
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2- विधाता से एक प्रश्‍न ?

हे सृजनहार
पूछती हूँ मैं
एक सवाल
क्यों लिख दी तूने
जन्म के साथ
मेरी हार ?

सौंदर्य के नाम पर
अता की दुर्बलता
सौंदर्य का पुजारी
कैसी बर्बरता !
इंसां के नाम पर
बनाए दरिंदे
पुरूष बधिक
हम परिंदे
नोचे-खसोटें
तन, रूह भी लूटें
आ देख
कैसे, कितना हम टूटे !
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Friday, December 21, 2012

हम याद न आएँगे


रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
1
क्या रूप निराले हैं
वेश धरे उजले
मन इनके काले हैं ।
2
उपदेश सुनाते हैं
खुद दुष्कर्म करें
जग को बहकाते हैं ।
3
जनता बेहाल हुई
गुण्डों की टोली
अब मालामाल हुई ।
4
पर निश-दिन कतरे हैं
सच्चे लोग यहाँ
लगते अब खतरे हैं ।
5
अब तक दु:ख झेला है
छोड़ नहीं जाना
मन निपट अकेला है ।
6
यूँ मीत अनेक रहे
मन को जो समझे
बस तुम ही एक रहे ।
7
हम याद न आएँगे
जिस दिन खोजोगे
फिर मिल ना पाएँगे ।
8
तुम हमसे दूर हुए
जितने सपने थे
सब चकनाचूर हुए ।
9
उनको सन्ताप हुआ
अनजाने हमसे
लगता था पाप हुआ ।

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