Tuesday, August 21, 2012

जब कीं बातें ( कविता)


 रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
दुश्मनी तो निभा  न सका कोई दुश्मन
जितने थे दोस्त , उनसे  बेहतर निकले ।
मैं शहर में हूँ, तो डर लगता है बहुत
बियाबाँ  में रहूँ जब, तो कुछ डर निकले ।
गुज़ारूँ रात कहीं, मैं सोचकर निकला
तलाशा था जिन्हें ,वे तो बेघर निकले  ।
बरसों से रहे संग , कुछ भी  ना  सीखा
जब कीं बातें, बातों के ख़ंज़र निकले ।
तन्हा ही चले थे , हम जब दो ही क़दम
अकेले तुम ही थे ,जो हमसफ़र निकले  ।
(21 जुलाई, 12]

Monday, August 20, 2012

ईद का चाँद



ईद के पावन -पर्व पर सभी को ईद की कोटिश: बधाई!!
डॉ. सरस्वती माथुर
1
ईद का चाँद
नभ- टहनी पर
नूर ले आया
तारों-जड़ी चाँदनी
दुल्हन बन गई ।
2
नवल पंख लगा
ईद का चाँद आया
दीदार कर
परस्पर  बोलते
ईद  हो मुबारक
3
सजा था चाँद
चाँदनी मेहँदी में
थी दुल्हन -सी
नभ- तारे माँगते
चाँद से ईद इदी  ।
4
ईद का चाँद
दिख गया नभ में
सभी के मन
एक दूजे से मिले
ईद- बधाई देते !
5
मन मिलाओ
ईद पे मिल सभी,
सन्देश देना-
हम भारतवासी 
पंछी एक डाल के !
-0-


Thursday, August 16, 2012

गोधूलि बेला में



सुशीला शिवराण

वात्सल्य का वितान
ममता का आँचल
क्यों
 है सिमटा-सिमटा।
अंतस्
 क्यों घुटा-घुटा !


अनुभव के मोती
बाँटने को आतुर
सँवारने को हर काम
आज भी उद्यत हाथ
क्यों पीछे खिंच जाते हैं
उत्साह की चमक गई जो रेख
क्यों चेहरे की सिलवटों में
लुप्‍त होती जाती है
यह अवांछना
ले आती है आँखों में नीर
और चेहरा भिगो जाती है।

जीवन की
गोधूलि बेला में
अशक्‍त -से हाथ
शिथिल से पैर
कहते हैं तुमसे
इतने भी नहीं बेकार
गर दे सको तो दो
थोड़ा सा समय
थोड़ा सा स्नेह
फिर देखना
कैसी ऊर्जा भर देता है
तुम्हारा यह नेह!

जी उठेगा सुषुप्‍त मन
गतिमान हो उठेंगे पैर
हाथ भी पा जाएँगे शक्‍ति
यही हमारे जीवन की सद्‍गति
कहो ना मेरे कुलदीपक
क्या दे सकते हो
कुछ स्नेह के छींटे
कि उपेक्षा से उबरें हम
क्या दे सकते हो
दो पल का साथ
ताकि उद्विग्न
कुंठित मन
करे कूच
इस जहाँ से
तृप्‍त मन से।
-0-

Sunday, August 12, 2012

मैं कितने जीवन जिया !


 : जीवन को आईना दिखाता काव्य-संग्रह
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
    मानव-जीवन विभिन्न भावानुभूतियों का इन्द्रधनुष है ।जब तक लहर है ,तब तक प्रवाह है ; जब तक प्रवाह है तब तक जीवन है । पथरीली -सर्पिली , फूलों -भरी , शूलों से उलझी घाटियों  से गुज़रती पगडाण्डी की तरह । हमारी दृष्टि ही उसे सुखद या दु:खद बना देती है।‘मैं कितने जीवन जिया !’ काव्यकृति जीवन-अनुभवों का दस्तावेज़ है । कहीं जीवन के यथार्थ की तल्ख़ियाँ हैं तो कहीं प्यार की तरंगे हैं,कहीं सामाजिक सरोकारों की चिन्ता है तो कहीं थके -हारे मुसाफ़िर का हौसला बढ़ाते स्वर हैं। कहीं प्रकृति का मनोरम शृंगार  आह्लाद जगाता है तो कहीं प्यार का संवेदन अभूतपूर्व जीवन-सुरभि से भर देता है  । संसार के व्यावहारिक स्वरूप को भी कवि ने पाठकों के सामने उद्घाटित कर दिया है । इस सबके बावज़ूद एक दृष्टिकोण सर्वोपरि है ,और वह है जीवन के प्रति आस्थावादी सकारात्मक दृष्टिकोण;जो हारे-थके पथिक की शक्ति बन जाता है ।
‘पनहारिन’  शीर्षक त्रिवेणी में  पनिहारिन और पनघट के माध्यम से अनेक अर्थ -छटाएँ बिखरती नज़र आती हैं। पनघट भी पनहारिन का इन्तज़ार करता है , यह सन्देश पूरी कविता को और अधिक जीवन्त बना देता है-
-गगरी ले मीलों चले / कभी न पनहारिन थके / पनघट उसका पथ तके  -26
यही सौन्दर्यबोध अन्यत्र भी बहुत मुखर हुआ है ; लेकिन बहुत सादगी के साथ और पूरी अन्तरंगता से -
-अधर कली के चूमकर / कहा भ्रमर ने झूमकर- / ‘रस के घट तेरे अधर’  -62
इन तीन पंक्तियों के लघु कलेवर में इतना कुछ कह दिया है कि पाठक अपने मानस -पटल पर भाव -चित्र की छटा महसूस करने लगता है ।
        कवि का जीवन- दर्शन अनेकानेक प्रकार से प्रकट होता है । साहस के स्वरूप को इन पंक्तियों में सुदृढ़ आधार दिया गया है ।
-कहीं न तव साहस चुके / साहस तेरा देखकर / संघर्षों का सर झुके - 29
जिसमें साहस होगा वह बाधाओं के आगे समर्पण नहीं करेगा  , अपनी दुर्बलताओं का रोना नहीं रोएगा। जीवन की आग उसे हारकर बैठने नहीं देगी वरन् सदा आगे बढ़ने की प्रेरणा देती रहेगी-
--पंख कटे तो क्या हुआ / मन में है ऐसी अगन / छू ही लूँगा मैं गगन - 99
सुख -सुविधाओं में तो कोई भी जी लेगा; लेकिन विषम परिस्थितियों में जीना सबसे बड़ी चुनौती है-
-फूलों में रहना सरल / काँटों में रहना कठिन / रहकर देखो चार दिन   -33
जो व्यक्ति कंटकाकीर्ण मार्ग से कंटक  हटाने में सिद्धहस्त है , जिसका फूल बाँटने में विश्वास है ; वह अपना मार्ग प्रशस्त कर ही  लेगा-
        -शूल छाँटते हम चलें / आएँ हैं तो भूमि पर / फूल बाँटते हम चलें  -36
कर्मशील व्यक्ति के लिए प्रगति के द्वार कभी बन्द नहीं होते । स्वामी जी केवल कवि ही नहीं हैं, वरन् समाजचेता भी हैं , अत: इनका दृढ़ विश्वास है -
-एक द्वार जब बन्द हो / खुल जाते हैं बीसियों / राह तकें है तीसियों  -53
ये पंक्तियाँ  किसी भी  निराश -हताश को शक्ति-स्फूर्त कर देंगी । यह मन: स्थिति तभी हो सकती है , जब व्यक्ति जीवन की कटुताओं को हँसकर सह ले -
        -हँसकर पीता हूँ गरल / होता जाता हूँ तरल / जीना लगता है सरल -81
स्वामी जी का दीर्घ और सात्त्विक जीवन अनुभव सचमुच चमत्कृत करता है। दीपक तभी तक जलता है जब तक बाती और तेल हैं । यही नहीं , सार्थक जीवन जीने के लिए ज़मीन से जुड़ना बहुत ज़रूरी है-
  -उड़ने को नभ तक उड़ा / जन्मा वसुधा पर मनुज / किन्तु न वसुधा से जुड़ा -51
कामनाओं का घटाटोप आदमी को चैन से नहीं बैठने देता । एक कामना पूरी हुई नहीं कि दूसरी जाग्रत हो उठती है । कवि के अनुसार शान्त और अक्लान्त जीवन जीने के लिए  कामनाओं के जाल से मुक्त होना अनिवार्य है-
        -सूखे पत्ते की तरह / जब झर जाए कामना / सफल तभी हो साधना -74
लेकिन मानव की तृषाएँ अनन्त हैं  ; जो न बुझती हैं ,न मरती हैं-
        -मर जाए मानव भले /इच्छा मरती ही नहीं / यह हर पल फूले -फले - 97
भँवर में घिरा उत्साही व्यक्ति उतना परेशान नहीं; जितना किनारे पर बैठा असन्तुष्ट जीवन- दर्शन अपनाने वाला व्यक्ति है । दोनों के दृष्टिकोण में अन्तर है । जो किनारे पर बैठा है , उसका असन्तोष ही उसके दु:ख का कारण है -
        -हमको घेरे है भँवर / पास तुम्हारे तीर है / फिर भी तुमको पीर है -94
आज के स्वार्थपूर्ण जीवन में व्यक्ति तब ज़्यादा दु:खी होता है , जब वह अपनों के बीच में बेगानापन महसूस करता है । घर का अपनत्व-भरा आदर्श ध्वस्त हो चुका है -
        -अपने ही घर में अगर / आप अतिथि  बनकर रहें / कैसे घर को घर कहें ?-95
 उसके पास बचती है केवल घुटन , जो उसे न जीने देती है , न मरने देती है । कवि ने इस व्यथित करने वाले अनुभव को बहुत ही सूक्ष्मता से अभिव्यक्त किया है -
-मनुज जिए तो क्या जिए / जीवन में इतनी घुटन /  मानस में इतनी चुभन ! -95
परहित और परमार्थ ही वे संजीवनी हैं ; जो साधारण मनुष्य को महामानव बनाती हैं ।बादल के रूप में यही गुण सच्चे मानव का भी होता है-
       -बादल ऐसा पीर है / बरसाकर मधु नीर जो / भू की हरता पीर है -36
इसका और उदात्त रूप इन पंक्तियों में अमृत बनकर बरस पड़ता है ; जो संन्यासी कवि मन के पावन चिन्तन का ही प्रक्षेपण हो सकता  है-
-      भाव यही मन में जगे  - /  धरती पर प्रत्येक का  / दर्द मुझे अपना लगे -37
यही नहीं कविमन की पावनता  और भी अधिक भावोद्रेक के साथ प्रकट होती है -
-मुझे हुआ  यह भान है / हर दु:ख रखूँ सहेजकर / हर दु:ख रत्न  समान है -54
प्यार , जीवन का सार है । कवि ने प्यार का मापदण्ड बताया है-
       -दु:ख में आए याद वह / जिसको हमसे प्यार है / यही समय का सार है -41
प्यार का दूर हो जाना सपनों का बिखर जाना नहीं तो क्या है ! इस सांसारिक सत्य को बहुत मार्मिक शब्दों  में  तन्मयता से पिरोया है-
       आप हुए क्या दूर हैं  / दो ही दिन  में हो गए / सपने चकनाचूर है  -55
और यदि मन में प्रेम है तो हर कदम पर खुशियाँ बिखरी मिलेंगी -
       प्रेम अनूठा राग है / प्रेम -राग मन को छुए  / तो पग-पग पर फाग है -80
        इन सब अनुरागी भावनाओं के चित्रण में कवि अपने सामाजिक सरोकारों से न विमुख हुआ और न दायित्व की अनदेखी ही  की  है । कवि को चिन्ता है -भारत के भावी बचपन की , उस बचपन की जो शिक्षा के उजाले से कोसों दूर है । इन पंक्तियों में यह चिन्ता बहुत तीव्रता से अभिव्यक्त हुई है -
-अब बचपन के हाथ में / बीड़ी -गुटका -पान है / मेरा देश महान है -47
-बाल दिवस के नम पर /विज्ञापन ढेरों मगर /बाल सभी हैं काम पर -68
कवि को कृषक भी चिन्ता है  । जीवन के कटु यथार्थ कवि के दृष्टि-पथ में हैं-
        -कृषक हँसे तो क्या हँसे / खेत नहीं है जब हरा / नभ को ताके है धरा -38
मानवीय दुर्बलता की ओर संकेत करते हुए कवि ने कटु  यथार्थ को भी प्रस्तुत किया है-
       -दर्पण को रख सामने / आँख स्वयं से तू मिला /हृदय लगेगा काँपने  -68
‘मैं कितने जीवन जिया’ में एक ओर जीवन के सभी रंग समाहित हैं , दूसरी ओर कवि का छन्द पर अधिकार उनकी कवित्व -शक्ति का अहसास कराता है । आपने  चण्डिका छन्द के तीन चरण में  ही अपने नए ढंग से जो प्रस्तुति की है ,वह श्लाघ्य है । परम्परागत छन्दों में किंचित् परिवर्तन करके बहुत से यशकामी कवि अपना नाम जोड़ लेने की होड़ में लगे हैं । डॉ श्यामानन्द सरस्वती जी ने स्वयं को उस भीड़ से अलग रखा है । भाषा और अलंकारों पर आपकी पकड़ नज़बूत ही नही वरन् सहज भी है । ‘पीर’ शब्द का प्रयोग देखिएगा -
       -बादल ऐसा पीर है / बरसा कर मधु- नीर जो /  भू की हरता पीर है -36
इस छन्द की पहली और तीसरी पंक्ति  में आद्यन्त स्वरानुरूपता का उदाहरण कवि के कौशल का साक्षी है-
        -शूल छाँटते हम चलें / आएँ हैं तो भूमि पर / फूल बाँटते हम चलें  -36
केवल छन्द की जोड़-तोड़ करके काव्य -रचना नहीं हो सकती है । प्रवाहमयी भाषा ही छन्द के गौरव को बढ़ाती है । स्वामी जी भाव-भाषा और छन्द की त्रिवेणी हैं ; जिसका अनुपम उदाहरण-‘ मैं कितने जीवन जिया’ में दृष्टिगोचर होता है ।
स्वामी जी का  यह त्रिवेणी संग्रह रसज्ञ पाठकों के लिए  तपती लू में शीतल छाया की तरह है । आशा करते हैं  कि यह नव चण्डिका  छन्द पर आधारित  एक हज़ार त्रिवेणियों  वाली आपकी  यह कृति पूर्व कृतियों की तरह सराही  जाएगी ।

मैं कितने जीवन जिया ! -डॉ. स्वामी श्यामानन्द सरस्वती ‘ रौशन’ ; प्रकाशक : अमृत प्रकाशन ,1 / 5170, लेन नं 8 , बलबीर नगर  शाहदरा , दिल्ली-110032 ; प्रथम संस्करण:2012 , मूल्य : 175 रुपये ( सज़िल्द) , पृष्ठ:  112


Wednesday, August 8, 2012

दिशा -दिशा हो धवल


डॉ ज्योत्स्ना शर्मा
1
हमको तो अब भा गया ,प्रभु तुम्हारा नाम  ।
कुण्डलियाँ लिख -लिख करूँ ,नित्य नाम का गान   ॥
नित्य नाम का गान ,सुनो तुम बात हमारी  ।
राखो सँभल, सँवार ,वस्तु न जाएँ बिसारी   ॥
कान्हा भूलो मुकुट,न भूले मुरली तुमको  
जिसकी मीठी तान ,लुभाए निश -दिन  हमको   ॥
2
जीवन में उत्साह से ,सदा रहें भरपूर  ।
निर्मलता मन में रहे ,रहें कलुष से दूर   ॥
रहें कलुष से दूर ,दिलों में कमल खिलें हों  ।
हों खुशियों के हार ,तार से तार मिलें हों   ॥
दिशा -दिशा हो धवल ,धूप आशा की मन में  ।
रहें सदा परिपूर्ण ,उमंगित इस जीवन में   ॥
3
नारी ही जब बोलकर ,अपना मोल लगाय  ।
क्यों न इस बाजार में, बिना मोल बिक जाय   ॥
बिना मोल बिक जाय ,घटे मर्यादा ऐसे  ।
हो पूनम का चाँद, गहन में विपदा जैसे   ॥
पाए अपना मान ,गगन में चमक है भारी  ।
तज मर्यादा चैन, कभी  ना पाए नारी  । ।
4
इक रोटी से हाथ की ,मुँदरी पूछे बात ।
तू क्यों फूली -सी फिरे ,जले सुकोमल गात ॥
जले सुकोमल गात ,अंत निश्चित है तेरा ।
पर छुटकी के थाल, लगाए हँस कर फेरा ॥
दे मुख को मुस्कान ,उम्र तेरी यह छोटी ।
जीवन का सन्देश ,सुनाती है इक रोटी   ॥
5
राजनीति का नीति से ,यूँ रिश्ता अनमोल ।
इक वाणी प्रपंच दिखे ,दूजी बोले तोल ।
दूजी बोले तोल ,करे नित परहित सब का ।
सम दृष्टि समभाव ,रखे है मन में रब का॥
भले करें सब गान ,नीति पावन प्रतीति का
छोडे़ त्याग-विचार ,गुणीजन राजनीति का ।।
6
भूले से भगवान ने ,मन में किया विचार  
खुद रह कर फिर साथ में ,देखें यह संसार  ।।
देखें यह संसार ,यहाँ कैसी है माया  
किया भला क्या भेंट ,भक्त ने क्या -क्या पाया ।।
चले उठाने मुकुट ,मुरलिया जब झूले से  
कुछ ना आया हाथ ,खड़े  हैं अब भूले- से ॥
7
राधा की पायल बनूँ, या बाँसुरिया ,श्याम ,
दोंनों के मन में रहूँ, इच्छा यह  अभिराम ।
इच्छा यह्  अभिराम ,बजूँगी वृन्दावन में ,
दो बाँसुरिया देख , दुखी हों राधा मन में ।
हो उनको संताप , मिलेगा सुख बस आधा ,
कान्हा के मन वास , चरण में रख लें राधा ।
-0-

Thursday, August 2, 2012

रक्षाबंधन ( हाइकु)

डॉ सरस्वती माथुर
1
रक्षाबंधन
नदी सी बहने हैं
तो भाई  जल
2
रक्षाबंधन
काव्य- गीत बहने
भाई गज़
3
रक्षा बंधन
बारिश सी बहने
भाई - बादल
4
रक्षाबंधन
रौनक हैं बहने
भाई संबल
 5
रक्षा बंधन
आँखें हैं बहने तो
भाई काजल
-0-