Thursday, March 29, 2012

एक सार्थक चित्र


एक सार्थक चित्र
-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

छोटे-छोटे हाथ
कर सकते हैं बहुत कमाल
एक नक्शा बनाकर
पूरी दुनिया को
उसमें उतार सकते हैं
एक हल्की -सी छुअन
दो प्रेम -पगे शब्द
किसी  के सोए मन में
समन्दर पार करने की
ऊर्जा भर सकते  हैं ।
एक आश्वासन
अपनत्व का महल खड़ा कर देता है
ठीक उसी तरह
जैसे तुम्हारा सजाया
एक सार्थक चित्र
शब्दों को जुबान दे देता है -
कि वे घुलमिलकर बतियाएँ
छोटे बच्चों की तरह खिलखिलाएँ
सारी दुनिया भूलकर
गले लग जाएँ
-0-

Friday, March 23, 2012

खुशी पल की -कुछ न माँगूँ(हाइकु)


1-खुशी पल की:रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
खुशी पल की
भटकी हुई बूँदे
ज्यों बादल की ।
2
आहट आई 
आँगन में यादों की
 दुबके पाँव ।
3
खुशियाँ न दो
 ग़म पीछे छुपे हैं
 यहाँ आने को ।
-0-

2-कुछ न माँगूँ :डॉ. हरदीप कौर सन्धु
1
 कुछ न माँगूँ
बस पल दो पल
ख़ुशी के सिवा
2.
कभी ढूँढ़ती
यादों के आँगन में
ख़ुशी अपनी
3
बिन बुलाए,
ये गम पता नहीं
क्यों चले आए !
-0-

Monday, March 19, 2012

मुबारक हो






मुमताज टी-एच खान
मुबारक हो
दिन हज़ारों बार
दुआ हमारी
आता रहे ये दिन
ऐसे ही सालों-साल-0-

Thursday, March 15, 2012

घर लौटने तक- 3 मुक्तक


घर लौटने तक
-डॉ अनीता  कपूर
( 15 मार्च को पंजाब विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग और केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय  के संयुक्त  तत्त्वाधान में आयोजित हिन्दीतर  भाषी नवलेखक शिविर चण्डीगढ़ में  मुख्य वक्ता के रूप में पढ़ी गई ।)
तुमसे अलग होकर
घर लौटने तक
मन के अलाव पर
आज फिर एक नयी कविता पकी है
अकेलेपन की आँच से ।
 समझ नहीं पाती
तुमसे तुम्हारे लिए मिलूँ
या एक और
नयी कविता के लिए
 -0-
2-तीन मुक्तक
ज्योत्स्ना शर्मा
1
याद 'उनकी' हमें 'उन-सी प्यारी लगे ,
हर अदा इस ज़माने से न्यारी लगे ।
वो आयें ,ना आयें ये उनकी रज़ा;
बेरुखी भी हमें उनकी प्यारी लगे ।।
2
नयनों में स्वप्न जैसा सजाया तुम्हें,
मन्नतें लाख माँगी तो पाया तुम्हें
अब तुम्हें भूल जाऊँ ये मुमकिन नही;
इस दिल में धड़कनों- सा बसाया तुम्हें ।।
3
मोतियों को सीप में पलने नहीं देते ,
आँसुओं को भी यहाँ लने नहीं देते ।
किस कदर बेदर्द हैं ये आज के रिश्ते ;
देते हैं दर्द ,'आह ' निकलने नहीं देते । ।

Thursday, March 8, 2012

मेरे सूरज (चोका )


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

मेरे सूरज
बादल तो आएँगे
घुमड़कर
अम्बर में छाएँगे
रोकें उजाला
तुम्हें सहना होगा
लहर बन
चट्टानों से टकरा
बहना होगा
पीछे नहीं मुड़ना
दूर है जाना
अँधेरे भँवर से
न घबराना
सागर तक जाना
आँसू पोंछके
डुबकी  है लगाना
मोती बटोर लाना  ।
-0-

Friday, March 2, 2012

तुमको पाया( चोका )


तुमको पाया( चोका ) 
-रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
खाक़ थी छानी
वीरानों की हमने
कभी भटके
मोड़ पर अटके
कोई न भाया,
भरी भीड़ में तब
तुमको पाया ।
तुम कहाँ छुपे थे ?
यूँ बरसों से ,
खुशबू बनकर,
दूध-चाँदनी,
कभी भोर का तारा,
नभ-गंगा से
कभी रूप दिखाया ।
किया इशारा
तुम ही थे अपने
अन्तर्मन से
सुख-दु:ख के साथी
प्राणों की ऊष्मा
बनकर के आए
भर गले लगाया ।
-0-