Wednesday, November 7, 2012

सिर्फ़ बचा अपमान


दोहे
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
1
कुटिया रोई रात भर , ले भूख और प्यास ।
महल बेहया हो गए , करते हैं  परिहास । ।
2
दीमक फ़सलें चट करें ,घूम -घूम घर द्वार ।
गाँव- नगर लूटे सभी, लूटे सब बाज़ार  । ।
3
इज़्ज़त लुटी गरीब की , लूट लिया हर कौर ।
डाकू  तो बदनाम थे , लूटे कोई और  । ।
4
पोथी से डरकर  छुपा , जेबों में कानून ।
जिसकी जेबें हों भरी , उसको चढ़े जुनून  । ।
5
कर्ज़ चढ़ा हल तक बिका, बिके खेत खलिहान ।
दो रोटी की भूख थी, सिर्फ़ बचा अपमान । ।
-0-

26 comments:

  1. मार्मिक पंक्तियाँ....कटु सत्य

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  2. बहुत ही बढ़िया दोहे लगे आपके। पहला कुटिया वाला तो दिल को छू गया। बधाई !

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  3. कौन दिशा मन आस हो, सच में डूबा हाल,
    हर दिन निर्णय खींचते, हैं समाज की खाल।

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  4. मार्मिक वर्णन ! लेकिन...कड़वा सच ! :(
    ~सादर !

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  5. कुटिया रोई रात भर , ले भूख और प्यास ।
    महल बेहया हो गए , करते हैं परिहास । ।

    क्या बात है .....!!
    बहुत ही बढ़िया ......

    डाकू तो बदनाम थे , लूटे कोई और

    बिलकुल सही अब डाकुओं की जरुरत ही क्या घर-घर डाकू बैठे हैं .....

    बेहद सटीक और मार्मिक चित्रण ....!!

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  6. कुटिया रोई रात भर , ले भूख और प्यास ।
    महल बेहया हो गए , करते हैं परिहास । ।

    मर्मस्पर्शी...सच्चाई कहते सभी दोहे बहुत अच्छे...सादर बधाई!

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  7. सभी दोहे कटु यथार्थ का वर्णन करते हैं .पहला दोहा मनको छू गया .

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  8. आज के हालात का सच बताते दोहे .... देश के सर्वेसर्वा ही डाकू बने हुये हैं .... दीमक बन देश को ही चाटते जा रहे हैं .... सार्थक दोहे

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  9. कटु सत्य..सार्थक और समसामयिक हैं...

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  10. शशि पाधा09 November, 2012 19:21

    यथार्थ कितना कडवा हो सकता है, इन्हें पढ़ कर तो पूरी सामाजिक,प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर शंका हुई | धन्यवाद आपका |

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  11. बहुत मार्मिक...हार्दिक आभार और बधाई...।
    प्रियंका

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  12. डाकू तो बदनाम थे , लूटे कोई और
    yahi to ho raha hai kare koi bhare koi
    कुटिया रोई रात भर , ले भूख और प्यास ।
    महल बेहया हो गए , करते हैं परिहास ।
    jis din mahal ko samajh aajayegi sare kasht hi dur ho jayenge
    bahut khoob
    badhai
    rachana

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  13. मार्मिक सत्‍य । आज के युग की कटु तस्‍वीर

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  14. बहुत भावात्मक दोहे।
    कुटिया रोई रात भर...बहुत खूब।

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  15. बहुत ही सटीक और भावपूर्ण दोहे ...बहुत कुछ सोचने को मजबूर करते हैं !

    बधाई हिमांशु जी !

    कुटिया रोई रात भर , ले भूख और प्यास ।

    महल बेहया हो गए , करते हैं परिहास । ।

    डॉ सरस्वती माथुर

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  16. बहुत अच्‍छे दोहे हैं काम्‍बोज जी, आपको बधाई ।।।

    क्‍या आप रोहिणी में रहते हैं, कहिएगा

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  17. बेहद शानदार लाइनें हैं...सही में

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  18. दीमक फ़सलें चट करें ,घूम -घूम घर द्वार ।

    गाँव- नगर लूटे सभी, लूटे सब बाज़ार । ।
    कमाल का अभिव्यक्त किया गया कौशल है जहां शब्द सुर और ताल में प्रवाहमान होकर रक्स कर रहे हैं॥सभी दोहे ...सुंदर, नगीनेदारी, कौशल को स्पर्श कर रहे हैं....बधाई

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  19. आ. हिमांशु जी ,सभी दोहे बहुत सटीक और समसामयिक हैं ,बहुत -बहुत बधाई ..... आपको और आपके परिवार को दीपावली की अनंत मंगलकामनाएँ ........

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  20. ह्रदय के दर्द को बहुत ही सशक्त ढंग से प्रस्तुत किया है आपने इन दोहों के माध्यम से ...

    कुटिया रोई रात भर , ले भूख और प्यास । महल बेहया हो गए , करते हैं परिहास ...

    सच है महलों में रहने वाले बेहयाई की हद से पार हो गए हैं .... उनको किसी की भूख प्यास या तकलीफ से कोई फर्क नहीं पड़ता वे तो बस अपने सुखों के उपभोग में ही मगन हैं ....

    सादर
    मंजु

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  21. सभी दोहे सामयिक हैं संवेदनाओं से परिपूर्ण. आज के जीवन का सच जो मन को आहत करता है...

    पोथी से डरकर छुपा , जेबों में कानून ।
    जिसकी जेबें हों भरी , उसको चढ़े जुनून । ।

    सभी दोहे बहुत अर्थपूर्ण, शुभकामनाएँ.

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  22. ज्योत्स्ना शर्मा24 November, 2012 17:33

    सामयिक सत्य को बहुत सशक्त रूप में अभिव्यक्त किया है आपने ...कुटिया रोई रात भर ...से ...सिर्फ बचा अपमान तक की व्यथा कथा मर्म स्पर्शी है !!

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  23. sundar...sundar....aur ati sundar.....

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  24. Sabhi dohe eak se badhkar eak hai..

    कर्ज़ चढ़ा हल तक बिका, बिके खेत खलिहान ।
    दो रोटी की भूख थी, सिर्फ़ बचा अपमान । ।

    is dohe men bahut teekshan kataaksh kiya hai jo taarefe kaabil hai ...hardik badhai...

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  25. apke dohe sarahniye hai, pratham aur pachva ati sunder

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  26. apke dohe bahut acche hai. Pratham aur pachva ati sunder.

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