Sunday, September 30, 2012

बर्फ हुईं संवेदनाएँ


सुशीला श्योराण

ग्रीनपार्क की चौड़ी मगर सँकरी पड़ती सड़क
ठीक गुरुद्वारे के सामने
ट्रैफ़िक की रेलम-पेल में
रेंगती-सी ए.सी. कार में
बेटे का साथ
निकट भविष्य की मधुर कल्पना
और राहत फ़तेह अली खान के सुरों में खोई
आनंदमग्न मैं
ब्रेक के साथ बाहर दृष्‍टि पड़ती है
और जैसे मैं स्वप्नलोक से
दारुण यथार्थ में पटक दी जाती हूँ !

तवे-सा काला वर्ण
चीथड़ों में लिपटा नर-कंकाल
सड़क के बीचों-बीच
बायाँ हाथ दिल पर
चेहरे पर भस्म कर देने वाला क्रोध
दायें हाथ से बार-बार
हवा में 'नहीं' संकेतित करता
चारों दिशाओं में यंत्रवत घूमता
विक्षिप्‍त मानव
नहीं भूलता !

दिल ने पुकारा -
कहाँ हो दरिद्रनारायण ?
कितना आसान है
उसे पुकारना
और आँखें बन्द कर
आगे निकल जाना !
-0-

4 comments:

  1. मर्मस्पर्शी...यदा कदा जिन्दगी द्वारा छले गए ऐसे इंसान मिल जाते हैं|
    दिल ने पुकारा -
    कहाँ हो दरिद्रनारायण ?
    कितना आसान है
    उसे पुकारना
    और आँखें बन्द कर
    आगे निकल जाना !

    स्पष्ट अभिव्यक्ति!

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  2. ज्योत्स्ना शर्मा02 October, 2012 18:11

    यथार्थ और बहुत सशक्त रचना .....बधाई सुशीला जी

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  3. दिल ने पुकारा -
    कहाँ हो दरिद्रनारायण ?
    कितना आसान है
    उसे पुकारना
    और आँखें बन्द कर
    आगे निकल जाना !
    गहरी अभिव्‍यक्ति ! कदाचित निशब्द .....।

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