Wednesday, April 18, 2012

साथी


सीमा स्‍मृति

जिन्‍दगी करती है सवाल हमसे
क्‍या है गम
और
है क्‍या खुशी ?
अतल सागर में
तलशाता है क्‍यों कोई निधि
प्रश्‍न, लहरो से उठते हैं निगाहों में
छू कर किनारा
कभी शांत- श्‍वेत मेघ से
लौट जाते हैं
और
कभी तोड़ डालना चाहते हैं किनारा
कठोर वक्‍त बन
सोचती हूँ-
उत्तर दूँ या नहीं
खुशी और गम की
कोई सीमा नहीं
हर बदलते क्षण में
ये बंध जाते हैं
प्रश्‍न करने से पूर्व
और
उत्तर की प्रतीक्षा में
संवेदना के ये साथी
रंग बदल जाते हैं।
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5 comments:

  1. संवाद बना रहे, प्रश्नों को उत्तर मिलता रहे।

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  2. गम और खुशी खोजती हुई ....मन की असीम उद्वेलित लहरें .....
    सुंदर रचना बन पड़ी है ....

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  3. भावोत्तेजक और विचारोत्तेजक सर.. एक अपनी सी कविता..

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  4. कुछ उत्तर यूँ ही प्रतीक्षारत रहते हैं... अच्छी रचना, आभार.

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  5. ऐसे प्रश्नों का जवाब कई बार खोजते रहने से नहीं मिलता और कई बार स्वत ही मिल जाता है ... पर फिर वो भी बदल जाता है ...

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