Sunday, April 1, 2012

नये सेतु


सीमा स्मृति
1-संघर्ष
न्धकार से लड़ने की परिभाषा से दूर,
रोशनी से आवरित उस भीड में,
जिसकी चकाचौंध में मिचमिचाने लगी है आँखें,
धुँधलाने लगे है रास्ते,
खो गई है शक्ति,
स्त हो गई है सारी धारणाणाएँ,
संर्षसामर्थ्य और चेतना के संग
निकल पडा है जीवन
किसी नये सेतु के सहारे
उस पार
समकालीन जीवन -मं‍‍‍‍‍थन करने ।
-0-

2-मुलाकात

तुझसे मिलना
इक रवायत नहीं
किसी उम्र का
महकता सुरूर भी नहीं
बदली हवाओं में
थमा सा कोई नशा भी नहीं ।
तुझ से मिलना
जिन्दगी में मिले छालों को,
अपने ही हाथों से मरहम लगाना -सा
दर्पण में अक्स की पहचान सा
रात के बाद दिन से मुलाकात -सा
यथार्थ के टुकडों को सजोना -सा
अतीत में थमे एहसास सा लगता है मुझे ।
-0-

9 comments:

  1. वाह!!!
    तुझ से मिलना
    जिन्दगी में मिले छालों को,
    अपने ही हाथों से मरहम लगाना -सा

    बहुत खूबसूरत....मनभावन प्रस्तुति..........
    सादर.
    अनु

    ReplyDelete
  2. सूफी भाव की बहुत सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी रचनायें!

    ReplyDelete
  3. निकल पडा है जीवन
    किसी नये सेतु के सहारे
    उस पार
    समकालीन जीवन -मं‍‍‍‍‍थन करने

    bahut sundar... dharshanikta ka bhav liye huye prabhavshali rachna... jeevan rukta nahin... naye setu ka sahara hi sahi par jeevan chalta to hai hee ...

    ReplyDelete
  4. बहुत सुन्दर रचनायें हैं।

    ReplyDelete
  5. तुझसे मिलना
    इक रवायत नहीं

    bahut khubsurat bhav !

    ReplyDelete
  6. हर सुबह अंधेरों से जूझने के लिये निकलता है सूरज।

    ReplyDelete
  7. रात के बाद दिन से मुलाकात -सा
    यथार्थ के टुकडों को सँजोना -सा
    अतीत में थमे एहसास सा लगता है मुझे ।
    बहुत सुन्दर
    rachana

    ReplyDelete
  8. दोनों रचनाएँ गहनता को लिए हुये ॥सुंदर

    ReplyDelete
  9. Very Nice.. I m sharing....Thanks..

    ReplyDelete