Friday, March 2, 2012

तुमको पाया( चोका )


तुमको पाया( चोका ) 
-रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
खाक़ थी छानी
वीरानों की हमने
कभी भटके
मोड़ पर अटके
कोई न भाया,
भरी भीड़ में तब
तुमको पाया ।
तुम कहाँ छुपे थे ?
यूँ बरसों से ,
खुशबू बनकर,
दूध-चाँदनी,
कभी भोर का तारा,
नभ-गंगा से
कभी रूप दिखाया ।
किया इशारा
तुम ही थे अपने
अन्तर्मन से
सुख-दु:ख के साथी
प्राणों की ऊष्मा
बनकर के आए
भर गले लगाया ।
-0-

7 comments:

  1. बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

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  2. बहुत ही खुबसूरत चोका ......तुमको पाया
    भाग्यवान हो जो उसको पा लिया है |
    नहीं तो आजकी ज़िन्दगी में भीड़ में खो जाने का ही डर बना रहता है !
    सुन्दर चोका के लिए बधाई !
    हरदीप

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  3. खुबसूरत रचना

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  4. सुन्दर कोमल अभिव्यक्ति..

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  5. bahut khoobsurat choka. man ki gahraaiyon mein na jaane kitna kuchh ankaha rahta hai aur waqt aane par ek bimb ke roop mein vyakt hota hai...
    तुम कहाँ छुपे थे ?
    यूँ बरसों से ,
    खुशबू बनकर,
    दूध-चाँदनी,
    कभी भोर का तारा,
    नभ-गंगा से
    कभी रूप दिखाया ।

    bahut shubhkaamnaayen.

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  6. Bahut apntav se paripurn choka...bahut2 badhai.

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  7. अमिता कौंडल06 March, 2012 20:32

    खाक़ थी छानी

    वीरानों की हमने

    कभी भटके

    मोड़ पर अटके

    कोई न भाया,

    भरी भीड़ में तब

    तुमको पाया ।

    बहुत सुंदर रचना है बधाई,

    सादर,

    अमिता कौंडल

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