Thursday, February 9, 2012

हमने लिखा (चोका)


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
हमने लिखा-
चिड़िया उड़ो तुम
तोड़ पिंजरा
नाप लो  ये गगन
छू लो क्षितिज !
पार न कर सके
लेकिन हम
अपना ही आँगन ।
लाखों बातें कीं
तोड़कर पहाड़
नदी लाने की,
तोड़ न सके कभी
जर्जर ताला
सदियों से था जड़ा
रूढ़ियों पर,
हमारी सोच पर
डरता मन ;
टूट न जाए कहीं
ये घुन-खाया
दरवाज़ा  पल में
जो छुपाए है
कमज़ोर हाथों को-
उन हाथों को
जो कभी  नहीं बढ़े
मुक्ति पाने को
पिंजरों में बन्द ही
लिखते रहे
सदा मुक्ति का गीत
होकर भयभीत ।
-0-

16 comments:

  1. चौका के रूप में आपकी यह कविता श्रेष्ठ कविताओं में गिनी जाएगी, आप अगर इसे चौका न भी कहें तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। कविता अपने स्वरूप, भाव, विचार और संवेदना में इतनी उत्कृष्ट है कि यह कविता के हर प्रेमी को गहरे तक छू जाएगी… बधाई भाई साहब…

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  2. ्बेह्द शानदार और सशक्त चोका

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  3. बहुत गहन भावो को दर्शाती रचना..

    सादर नमन आपकी लेखनी को...

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  4. पार न कर सके
    लेकिन हम
    अपना ही आँगन ।waah.....

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  5. गीत शब्दों में लिखा जो,
    वह रहा अब शेष जीना,
    मुक्ति की करते प्रतीक्षा,
    टिमटिमायी, फिर दिखी ना,

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    1. प्रवीण भाई , आपकी इस काव्यमय मधुत टिप्पणी के लेइ बहुत बधाई!!

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  6. yathaarth ka bahut sateek chitran. sadiyon se aisa hota aa raha, sangharsh ke geet ab bhaymukt hokar gaane ka samay aa gaya hai...

    मुक्ति पाने को
    पिंजरों में बन्द ही
    लिखते रहे
    सदा मुक्ति का गीत
    होकर भयभीत ।
    man ko udwelit karti rachna ke liye badhai. shubhkaamnaayen Kamboj bhai.

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  7. आदरणीय रामेश्वर जी ,
    ये चोका हम सभी में छुपी उस चिड़िया की आवाज़ है जो नीले गगन में उड़ना चाहती है ...बिन पंखों के
    लेकिन हमने उसे बन्द कर रखा है |
    कमाल का लेखन है आपका .....इतनी बड़ी बात बहुत ही सहज ढंग से कह भी दी ..बिन आवाज किए ....लेकिन इसको सुनते ही मन में बेकाबू सा शोर सुनाई देने लगा है ....जो लेखक के लेखन की सफलता की निशानी है |
    आपकी कलम को नमन !
    हरदीप

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  8. bilkul satik rachna...man ki deewaro ko paar pana sach me namumkin sa lagta hai....iske paar hi azadi hai...

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  9. बहुत ही उम्दा रचना....हिम पंछी उन्मुक्त गगन के..पिंजरबद्ध ना गा पाएँगे...

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  10. गजब रचना ...सराहनीय|

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  11. पंछियों के माध्यम से संदेश देती रचना ...रूढ़ियों को तोड़ना है तो मात्र नारों से काम नहीं चलेगा ... गहन तथ्य छिपा है इस रचना में ॰

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  12. अंतर्स्पर्शी रचना |बेह्द गहन |

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  13. आपकी ये रचना अन्तर्मन में गहरी कहीं बैठ गई है आप इस रचना को किसी अच्छी पत्रिका में जरूर दें ये एकदम हटकर रचना निकली है आपके मन से।बहुत सारी शुभकामनाओं के साथ।

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  14. हमने लिखा-
    चिड़िया उड़ो तुम
    तोड़ पिंजरा
    नाप लो ये गगन
    छू लो क्षितिज !
    पार न कर सके
    लेकिन हम
    अपना ही आँगन

    पिंजरों में बन्द लिखते रहे मुक्ति का गीत...
    सुंदर ... अति सुंदर .... बहुत प्रभावशाली ढंग से जीवन का विरोधाभास व्यक्त हुआ है... मै सुभाष नीरव जी की टिप्पणी से पूरी तरह सहमत हूँ... "कविता अपने स्वरूप, भाव, विचार और संवेदना में इतनी उत्कृष्ट है कि कविता के हर प्रेमी को गहरे तक छू जाएगी"…

    यह अपने आप में बेमिसाल रचना साहित्य की एक धरोहर है, जिसे जो पढ़ेगा सराहे बिना रह ही नहीं सकेगा....

    सादर
    मंजु

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