Sunday, January 29, 2012

मन की चोट


-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

तन की चोट भरे कुछ दिन में
मन की चोट नहीं भर पाती
मिलना तो होता दो पल का
बिछुड़ें ,यादें रोज़ रुलाती।
मज़बूरी- दूरी दोनों में
युगों-युगों  तक का नाता है
दोनों ने मिलकर बाँधा जो
मोहपाश टूट न पाता है ।
जब दिन -रात बिछुड़ जाते हैं
हर आँख सभी  की भर आती ।
तन की चोट भरे कुछ दिन में
मन की चोट नहीं भर पाती

12 comments:

  1. तन की चोट भरे कुछ दिन में
    मन की चोट नहीं भर पाती ।
    sahi ek dam sahi
    shabd ander sab kuchh tod dete hain bas ek yudh ke bad kam sannata sa rah jata hai.
    aur bhavnaon ki siskiya bas sunai deti hai
    badhai
    saader
    rachana

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  2. मिलना तो होता दो पल का
    बिछुड़ें ,यादें रोज़ रुलाती।
    मज़बूरी- दूरी दोनों में
    युगों-युगों तक का नाता है

    यादें सच ही बहुत रुलाती हैं ... सुन्दर भावाभिव्यक्ति

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  3. तन की चोट भरे कुछ दिन में
    मन की चोट नहीं भर पाती

    सत्य वचन...सुंदर अभिव्यक्ति!

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  4. मन न दुखे किसी का भाई..

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  5. तन की चोट भरे कुछ दिन में
    मन की चोट नहीं भर पाती । bahut sahi kha kavita ke madhaym se.

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  6. sach me man ke ghaaw nahi bharte...sundar rachna...

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  7. man ke ghaaw sach me nahi bharte hai...sundar abhivyakti...

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  8. सच है बिलकुल...
    सुन्दर रचना..
    सादर.

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  9. तन की चोट भरे कुछ दिन में
    मन की चोट नहीं भर पाती
    मिलना तो होता दो पल का
    बिछुड़ें ,यादें रोज़ रुलाती।
    मज़बूरी- दूरी दोनों में
    युगों-युगों तक का नाता है

    एकदम सच बात कही ... मन के घाव बहुत गहरे होते हैं. सुंदर एवं भावुक रचना के लिए बधाई..
    सादर
    मंजु

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  10. दिनेश अग्रवाल जी की भेजी गई टिप्पणी-"मन की चोट":

    तन की चोट तो दिख जाती है
    मन की चोट नहीं दिख पाती
    तन की चोट तो मिट जाती है
    मन की चोट नहीं मिट पाती
    सराहनीय रचना.... बधाई.....

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  11. har hriday kee avyakt peeda...

    तन की चोट भरे कुछ दिन में
    मन की चोट नहीं भर पाती ।
    bahut sundar rachna, badhai Kamboj bhai.

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