Thursday, January 26, 2012

कल्‍पना या यथार्थ


सीमा स्‍मृति

उडेल सको अपनी थ‍कान,मुस्कान
 चिढ़ और गुस्‍सा
  चिल्‍लाया जा सके
 झल्‍लाया जा सके
  शब्‍द बोझ न हो
 जहाँ सोच पर बंधन न हो
 दर्द को दर्द की ही तरह बाँटा जा सके
 खुशी को जिया जा सके
 प्रश्‍नों के तीर न हों
 डर न हो रिश्‍ते की टूटन का
 भय न हो खो देने का
 छूट हो कुछ भी कहने की-
मन में जो भी धमक दे
 जहाँ लम्‍हें शर्तो पर न जिए जाएँ
 माँगे हो
न पूरी होने पर, अनजाना डर न हो
आदर सम्‍मान केवल शब्‍दों की चाशनी में लिपटे न हों,
रिश्‍ता बन सके ,आईना जिन्‍दगी का
पाना चाहता है हर शख़्स यह खूबसूरत रिश्‍ता
दे पाना, यह खूबसूरती
 आज भी है, प्रश्‍नों की सलीब पर ।

9 comments:

  1. प्रेम हो, जड़कन नहीं हो..
    सुन्दर प्रस्तुति

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  2. Waah kya baat hai, sunder rachna.

    Aabhaar..!!

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  3. रिश्ते शर्तों पर न हों ... लेकिन लोग उम्मीद लगा बैठते हैं और कुंठित होते रहते हैं ..सुन्दर अभिव्यक्ति

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  4. बढ़िया अभिव्यक्ति बहुत अच्छी रचना,..

    NEW POST --26 जनवरी आया है....

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  5. आपके इस उत्‍कृष्‍ठ लेखन के लिए आभार ।

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  6. bahut sunder abhivyakti rishton me jakdan nahi honi chahiye
    badhai
    rachana

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  7. वाह ...बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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  8. रिश्‍ता बन सके ,आईना जिन्‍दगी का
    पाना चाहता है हर शख़्स यह खूबसूरत रिश्‍ता
    दे पाना, यह खूबसूरती
    आज भी है, प्रश्‍नों की सलीब पर ।
    wah ak prabhavshali rachana lagi ...badhai

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