Tuesday, December 27, 2011

ओस की तरह


ओस की तरह (ताँका)
-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
हथेली छुए
तुम्हारे गोरे पाँव
नहा गया था
रोम-रोम पल में
गमक उठा मन।
2
समाती गई
साँसों में वो खुशबू
मिटे कलुष
तन बना चन्दन
मन  हुआ पावन।
3
तपी थी रेत
भरी दुपहर -सा
जीवन मिला
मिली छूने भर से
शीतल वह छाँव
4
आज मैं जाना-
मन जब पावन
खुशबू भरे
ये मलय पवन
ये तुम्हारे चरन।
-0-

Saturday, December 24, 2011

विष से भरी बयार (दोहे)


       त्रिलोक सिंह ठकुरेला
किस से अपना दु:ख कहें, कलियॉं लहूलुहान।
माली सोया बाग में, अपनी चादर तान।।
कपट भरे हैं आदमी, विष से भरी बयार।
कितने मुश्किल हो गये, जीवन के दिन चार।।
खो बैठा है गॉंव भी, रिश्तों की पहचान ।
जिस दिन से महॅंगे हुए, गेहूँ, मकई, धान।।
खुशियाँ मिली न हाट में, खाली मिली दुकान।
हानिलाभ के जोड़ में, उलझ रहे दिनमान।।
चौराहे पर आदमी, जायेगा किस ओर।
खडे हुए हैं हर तरफ, पथ में आदमखोर।।
जीवन के इस गणित का, किसे सुनायें हाल।
कहीं स्वर्ण के ढेर हैं, कहीं न मिलती दाल।।
सीख सुहानी आज तक, आई उन्हें न रास।
तार- तार होता रहा, बया तुम्हारा वास।।
घर रखवाली के लिए, जिसे रखा था पाल।
वही चल रहा आजकल, टेढ़ी -मेढ़ी चाल।।
द्वारे -द्वारे घूमकर, आखिर थके कबीर।
किसको समझाएँ यहॉं, मरा आँख का नीर।।
शेर सो रहे माँद में, बुझे हुए अंगार।
इस सुषुप्त माहौल में, कुछ तू ही कर यार।।
-0-

Tuesday, December 20, 2011

मान -सम्मान


कैनेडियन पंजाबी साहित्य सभा’टरांटो’ द्वारा पंजाबी और  हिन्दी के  दो प्रसिद्ध विद्वानों डा0  करनैल सिंह   थिन्द  और  रामेश्वर काम्बोज हिमांशु का मान -सम्मान

ब्रैम्पटन : (बलबीर मोमी/डा0सुखदेव झंड) रविवार 18 दिसम्बर को   ‘कैनेडियन पंजाबी साहित्य सभा टरांटो’  द्वारा अपनी  मासिक-संगोष्ठी में  पंजाबी और हिन्दी के दे दो प्रसिद्ध विद्वानों ‘गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर के  -रजिस्ट्रार और  प्रोफैसर हैड (डा0) करनैल सिंह   थिन्द  और  दिल्ली से पधारे प्राचार्य रामेश्वर काम्बोज हिमांशु को उनके द्वारा शिक्षा भाषा , साहित्य और सभ्याचार और लोक साहित्य के क्षेत्र में  किए गए  योगदान हेतु  सम्मान पत्र ,  घड़ियाँ और शॉल भेंट करके सम्मानित किया।
   सभा के आरम्भ में पिछले दिनीं पंजाबी भाषा के दिवंगत कलाकारों औए  लेखकों  कुलदीप माणक, देवानन्द ,पुष्पा हंस, सवरन चन्दन और  गुरमेल मडाहड़ को एक  इक मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि  भेंट की गई। इसके उपरान्त, सभा के  प्रधान प्रिंसिपल पाखर सिंह   और संरक्षक  प्रो0 बलबीर सिंह   मोमी नें दोनों विद्वानों का स्वागत करते हुए  सदस्यों को उनके बारे में संक्षिप्त जानकारी दी । । दोनों विद्वानों  ने   अपने -अपने  क्षेत्र में किए गए योगदान के बारे में  सभा के सदस्यों को विस्तारपूर्वक बताया । डा0 थिन्द  ने अपने  व्याख्यान में  फोकलोर (लोकसाहित्य) की परम्परा से मिलने वाली जानकारी दी  ।उन्होंने कहा कि  इसका  दायरा बड़ा विशाल है और  इसमें  लोक-गीत, लोक-धर्म, लोक-बोलियां ,टप्पे,  लोककथा , पहेलियाँ लोक-कला, रस्मो-रिवाजवहम-भ्रम, दवा-दारू, आदि सब कुछ आ जाता है। उन्होंने  पंजाबी भाषा को  अंगरेज़ी और अन्य  भाषाओं के सम्भावित ख़तरे से सावधान होने की बात भी  पूरा ज़ोर देकर की।
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु ने हिन्दी लघुकथा के बारे में चर्चा  करते हुए  अपनी  पुस्तकों के बारे में तथा  हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं  खास तौर से पंजाबी में एक दूसरे के सहयोग से हो रहे कार्यों के बारे में जानकारी दी । । उन्होंने कहा कि आज कम्प्यूटर -साफ़्टवेयर (कन्वर्टर) तैयार हो गए हैं , जिनकी  मदद से  अलग-अलग  भाषाओं के साहित्य को एक लिपि से दूसरी लिपि में बदलना और  लिखना-पढना सम्भव हो गया  है। उन्होंने अपने कुछ दोहे सुनाए और एक लघुकथा का भी पाठ किया।
सभा के दूसरे सत्र में कई सदस्यों ने अपनी  कविताएँ, गज़ल और  गीत सुनाए। सभा में  महिन्दर दीप ग्रेवाल, श्रीमती  दुग्गल, जगीर सिंह   काहलों, सुखिन्दर, कर्नल एस 0पी0सिंह  , प्रो: मदन बंगा, परमजीत ढिल्लों, अंकल दुग्गल, प्रिंसिपल चरन सिंह   भोरशी, मलूक सिंह   काहलों, डा0 सुखदेव झंड, तलविंदर मंड, मनजीत झम्मट, गुरदिआल सहोता, श्री  ग्रेवाल तथा कई और व्यक्ति उपस्थित थे।

काँच के घर ( ताँका)


छाया:हिमांशु

रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
1
काँच के घर
बाहर सब देखे
भीतर है क्या
कुछ न दिखाई दे
न दर्द सुनाई दे ।


2
काँच के घर
काँपती थर-थर
चिड़िया सोचे-
हवा तक तरसे
जाऊ कैसे भीतर।
3
छाया: हिमांशु
बिछी है द्वार
बर्फ़ की ही चादर
काँच के जैसी
चलना सँभलके
गिरोगे फिसलके ।

Wednesday, December 14, 2011

आती न पाती(हाइकु)


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1

आती न पाती
हूक -सी उठ तेरी
याद रुलाती

2
घायल पाखी
उड़ा न गगन में
मिलता कैसे

3
सागर पार
बिन कश्ती कठिन
ज्यों इन्तज़ार।

4
जीवन-साँझ
सिमट गई धूप
बची है रात।

Tuesday, December 13, 2011

सर्दी


सीमा स्‍मृति

सर्दी का अर्थ,
गरम रजाई में
कविता करते शब्‍दों में नहीं, ठिठुरता,
ए सी कारों  के दरवाजों से नहीं  झाँकता,
शरीरों की गर्मी से नहीं मिटता,
सर्दी के लिए सरकारी इंतज़ामों की डींगों से नहीं, ढकता
सर्दी का अर्थ,
भूखे पेट
सूखे बदन,
बिना छप्‍पर,
फटी शाल लिये,
सुबह अखबार और इंटरनेट के किसी कोने में
'शीत लहर से पाँच की मृत्‍यु '
सिर्फ़ अपने अर्थ खोजता है।
-0-

Wednesday, December 7, 2011

झरना बहाएँगे (ताँका)


झरना बहाएँगे (ताँका)
-रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
1
किसे था पता-
ये दिन भी आएँगे
अपने सभी
पाषाण हो जाएँगे
चोट पहुँचाएँगे।
2
जीवन भर
रस ही पीते रहे
वे तो जिए
हम तो मर-मर
घाव ही सीते रहे।
3
वे दर्द बाँटें
बोते रहे हैं काँटे
हम क्या करें?
बिखेरेंगे मुस्कान
गाएँ फूलों के गान।
4
काटें पहाड़
झरना बहाएँगे
भोर लालिमा
चेहरे पे लाएँगे
सूरज उगाएँगे ।
5
उदासी -द्वारे
भौंरे गुनगुनाएँ
मन्त्र सुनाएँ-
जब तक है जीना
सरगम सुनाएँ।
6
ओ मेरे मन !
तू सभी से प्यार की
आशा न रख
पाहन पर दूब
कभी जमती नहीं ।
7
मन के पास
होते वही हैं खास
बाकी जो बचे
वे ठेस पहुँचाते
तरस नहीं खाते
8
ये सुख साथी
कब रहा किसी का
ये हरजाई
थोड़ा अपना दु:ख
तुम मुझको दे दो।
9
पीर घटेगी
जो तनिक तुम्हारी
मैं हरषाऊँ
तेरे सुख के लिए
दु:ख गले लगाऊँ ।
-0-

Saturday, December 3, 2011

ओस है ये जिंदगी


ओस है ये जिंदगी
स्वाति वल्लभा राज

ओस की बूँदों की तरह ये जिंदगी,
रात की कोशिशों में बनती और
सूरज की पहली किरण में बिखर जाती

अगले पल से फिर वही नाकाम कोशिश,
खुद को बनाने की
बनने के बाद कुछ वक़्त ठहरने की|
ठहराव के बाद कुछ पल जीने की
पर जीने से पहले ही एक डर गुम जाने का
फिर डर  के सच्चाई का सामना

ओस की तरह दूब पे बिखर कर
चमकना चाहे ये ज़िन्दगी
पल भर को ही निडर हो,
जी जाना चाहे ये जिंदगी।
-0-