Thursday, September 29, 2011

डॉ अनीता कपूर की कविताएँ


डॉ अनीता कपूर की कविताएँ

[बात 1986 की है । अनीता कपूर जी का पहला काव्य संग्रह अनमोल मोती पढ़ने का अवसर मिला । कविताओं का स्वर थोड़ा हटकर था ।वैयक्तिक अनुभूतियों का समष्टिगत विस्तार । इसी क्रम में ‘अछूते स्वर’ संग्रह भी आ गया । विमोचन के अवसर पर अनीता जी ने मुझे दिल्ली बुलाया  ।चाहकर भी मैं नहीं आ सका । परीक्षा-प्रभारी होने के कारण बाधा आ गई । इस संग्रह की कविताएँ और अधिक प्रभावित करने वाली थीं। उस समय मैंने किसी पुस्तक की समीक्षा भी लिखी थी ।कुछ वर्ष बाद सम्पर्क टूटा कि अचानक जुलाई 2005 में तब फोन पर बात हुई, जब अनीता कपूर बेटे की शादी के सिलसिले में दिल्ली आई हुई थीं। फिर वही अन्तराल । जीवन की भागदौड़ किसी आदमी को कहाँ पहुँचा दे ,पता नहीं । आपने विभिन्न परिस्थितियों में अपनी उसी काव्य ऊर्जा को और अपने उसी आत्मीय एवं पारिबारिक सौहार्द्र को आज तक सहेजकर रखा है । यहाँ डॉ अनीता कपूर के परिचय के साथ इनकी कविताएँ दी जा रही हैं।
-रामेश्वर काम्बोज ’हिमांशु’]
परिचय
डॉ.अनीता कपूर
जन्म : भारत
शिक्षा : एम . ए.,(हिंदी एवं इंग्लिश ), पी-एच.डी (इंग्लिश),सितार एवं पत्रकारिता में डिप्लोमा.
कार्यरत : कवियत्री / लेखिका/ पत्रकार (नमस्ते अमेरिका समाचारपत्र) एवं अनुवादिका
गतिविधियाँ : मीडिया डायरेक्टर (उ प मं ), उत्तर प्रदेश मंडल ऑफ़ अमरीका, AIPC  ( अखिल भारतीय  कवियत्री  संघ ) की प्रमुख सदस्या, भारत में लेखिका संघ की आजीवन सदस्या, वूमेन प्रेस क्लब दिल्ली की आजीवन सदस्या, अमेरिका में भारतीय मूल्यों के संवर्धन एवं सरंक्षढ़ हेतु प्रयत्नशील. नारिका (NGO) तथा भारतीय कम्युनिटी सेंटर में समय समय पर अपनी सेवाएँ देना, फ्रेमोंट हिन्दू मंदिर और सांस्कृतिक केंद्र में योगदान हेतु अनेकों बार पुरस्कृत, हिन्दी के प्रचार -प्रसार के लिए हिन्दी पढ़ाना और सम्मलेन करना, अमेरिका में हिंदी भाषा की गरिमा को बढ़ाना, बहुत से कवि सम्मलेन में कविता पाठ, अमेरिका और भारत के बहुत से पत्र-पत्रिकाओं एवं वेब पत्रिकाओं के लिए अनेक विधाओं पर लेखन,र साथ ही साथ ज्योतिष-शास्त्र में विशेष रुचि.
विशेष: फिल्म एंड सिटी सेंटर ,नोयडा द्वारा " ग्लोबल फैशन अवार्ड ", से सम्मानित. बहाई इंटरनेशनल कम्युनिटी, दिल्ली , द्वारा " महिलाओं के उत्कर्ष के लिए विशिष्ट योगदान " पुररस्कार से सम्मानित, लायंस क्लब द्वारा सामजिक कार्यों के लिए कई बार सम्मानित, टी.वी एवं रेडियो से कई कार्यक्रम प्रसारित, हिंदी अकादमी दिल्ली द्वारा आयोजित कवि समेलन में प्रथम पुरस्कार.
प्रकाशन: बिखरे मोती , अछूते स्वर  एवं कादम्बरी  (काव्य -संग्रह ), अनेकों भारतीय एवम अमेरिका की पत्र-पत्रिकाओं में कहानी, कविता, कॉलम, इंटरव्यू एवम लेख प्रकाशित. प्रवासी भारतीय के दुःख दर्द और अहसासों पर एक पुस्तक प्रकाशन के लिए तैयार.
संपर्क: 3248 Bruce Drive, Fremont, CA 94539 USA
Phone: 510-565-9025

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डॉ अनीता कपूर
1-मैंने देखा है 

मैंने देखा है -
लोग
आपस में बात करते हैं
अक्सर भूल कर चल देते हैं
 पीछे नहीं देखते;
मगर में कहती हूँ-
किसी से बात कर सकना भी
अपने में एक सम्बन्ध है
कई सम्बन्धों से गहरा सम्बन्ध
इसे नाम
चाहे जो दिया जाए
सम्बन्ध तो सम्बन्ध ही होते हैं
किसी के प्रति विशेष आकर्षण अनुभव करना
और लगने लगना  असाधारण 
वो आकर्षण
हटकर होता है
 शारीरिक आकर्षण से 
चुम्बकीय होता है
यह रिश्ता
खींचता है मन को
मन की तरफ
सींचता है
व्यक्तित्व को
पौधे की तरह 
फिर खिलते हैं 
फूल
विचारों के
और आती है सुगंध
अनुभवों की
तब अपने आप में
हो जाता है पूर्ण
वो सम्बन्ध अनजाना.

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2-वसीयत
हमारे
पूर्वजों की सारी
वसीयत
हमारी ही तो है
उनका अस्तित्व व संस्कृति हमारी ही
धरोहर है
फिर क्यों हम
आँखें मूँदें बैठे हैं
कितना अजीब व सुखद है 
यह एक शब्द 
पूर्वज
गौर से झाँकें
और डूबकर 
देखें
तो सारा अतीत हममें ही छिपा था
वर्तमान भी हमसे  है
भविष्य भी हमसे होगा
सुनहरा भविष्य 
तब ही होगा 
अगर
हम 
पूर्वज शब्द 
रखें याद
तो दोबारा 
हर युग  में
राम , नानक
बुद्ध और महावीर होंगें
जीवन धारा वही है
रसगंगा भी वही है
फिर यह
घाट
अलग अलग 
क्यों ?
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3-उसके जाने के बाद मैं 

उसके जाने के बाद मैं
ताकती रही उसके क़दमों के निशाँ
मैंने कहा था उसे 
-
हो सके तो उन्हें भी साथ ले जाना
अब कितना मुश्किल है उसका जाना..

जिंदगी के जाने के बाद मै
छूती रही उसकी परछाई के निशां
मैने कहा था उसे
हो सके तो साँसे भी साथ ले जाना
अब कितना मुश्किल है जीना ....

यादों के जल जाने के बाद मै
बिनती रही उसकी राख़ के निशां
मैने कहा था उसे
हो सके तो राख़ उढ़ा ले जाना
अब कितना मुश्किल हैं ढेर में जीना....
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Friday, September 23, 2011

मै जननी जन्भूमि !


मंजु मिश्रा

मै जननी जन्भूमि !
 ना जाने कब से
ढूँढ रही हूँ
अपने हिस्से की
रोशनी का टुकड़ा....
लेकिन पता नहीं क्यो
ये अँधेरे इतने गहरे हैं
कि फ़िर फ़िर टकरा जाती हूँ
अंधी गुफा की दीवारों से...
बाहर निकल ही नहीं पाती
इन जंज़ीरों से,
जिसमे मुझे जकड़ कर रखा है
मेरे ही अपनों ने
उन अपनों ने
जिनके पूर्वजों ने
जान की बाज़ी लगा दी थी
मेरी आत्मा को
मुक्त कराने के लिए,
हँसते -हँसते
शहीद हो गये थे
एक वो थे
जिनके लिए देश सब कुछ था
देश की आज़ादी सबसे बड़ी थी
एक ये हैं
जिनके लिए देश कुछ भी नहीं
बस अपनी सम्पन्नता और
संप्रभुता ही सबसे बड़ी है
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Tuesday, September 20, 2011

मन रोता है (हाइकु)

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

तोड़ें सपने
जब-जब अपने
मन रोता है

भीगा कम्बल
मन पर लिपटे
भारी होता है । 1

ठोकर खाते
पग को सहलाते
चल देना है

नहीं रुकना ,
गिरकर  उठना
बल देना है ।2

मेघा बरसे
या कभी न बरसे
फ़सलें बोना

आँसू उमड़ें
हूक बन घुमड़ें
जीभर रोना ।3

जनम हुआ
तब ढोल बजे थे
गाए सोहर

उड़ा है पाखी
कर खाली पिंजरा
खाली है घर । 4

भुजा कटी थी
बीच सफ़र में ही
रोना मुश्किल

आखर बाँचे
पर कोई न बाँचे
टूटा ये दिल । 5

मुँह मोड़ना
नहीं सीखा कभी था
मैं क्या करता

बस चलता
तो संग में चलता
संग मरता । 6

निकले तुम
सचमुच पाहन
गिरिवर के

दगा दे गए
तारे बनकरके
क्यों अम्बर के ?7 ।
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Sunday, September 11, 2011

मेरा भी कोई :चोका


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

जब मैं रुका
सोचकर अकेला
कि कौन मेरा?
तभी आवाज़ आई
‘इस जग में
है मेरा भी तो कोई
जो बिना बोले
मन की किताब का
हर आखर
साफ़ बाँच लेता है
किसी कोने में
दुबक जाए दु:
जाँच लेता है ।
उसका नेह-स्पर्श
टूटती साँस
हृदय की प्यास को
देता जीवन
यह अपनापन
बनता धड़कन।’
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Tuesday, September 6, 2011

होम कर दी (हाइकु गीत)


-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

ईर्ष्या का कुण्ड
लील गया सारी ही
सद्भावनाएँ ।

होम कर दी
हैं शुभकामनाएँ
प्यारी ॠचाएँ ।

दे दी आहुति
वाणी के संयम की
दो ही पल में,
पिला दिया ज्यों
दूध , मिलाकर के
हलाहल में;

घृणा का घृत
निर्मम चषक में
भर ही लाए ।

यज्ञ किया है
किस सुख के लिए ?
नहीं है पता,
मरता मन
शाप देकर और
करता ख़ता ;

उठेगा धूम -
गीली जो समिधाएँ
संग हवाएँ ।

अशुद्ध मन्त्र-
कुसमय  का पाठ
भारी पड़ता,
दुख ही देगा
भूल -शूल चुभके
जब गड़ता;

मन -अश्व  को
न रोकती बल्गाएँ
न वर्जनाएँ ।

आग लहकी
पुरोहित झुलसे
यजमान भी
नफ़रतों ने
भस्मीभूत किए हैं
सामगान भी

अहित सोच
जीवित रह पाती
न  प्रार्थनाएँ
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Sunday, September 4, 2011

शिक्षक -दिवस (हाइकु)


मुमताज -टी एच खान

1
जीवन-नौका
गुरु है पतवार
ले जाए पार ।
2

नि:स्वार्थ भाव
न कोई भेद-भाव
ज्ञान लुटाए
3
नेह लुटाए
हम पर सदा वो
पावन मन
4
अन्धेरी गली
बनकर उजाला
आया है गुरु
5
अन्ध जीवन
किरने उजाले की
लाया है गुरु
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मुमताज -टी एच खान