Tuesday, May 31, 2011

मन दर्पन [चोका]


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

मन दर्पन
दरक गया जब,
बिखर गया
सारा सुख-जीवन ।
पाती अनाम
आती है आजकल
लूटे किसने ?
वे प्यारे सम्बोधन ।
आदि बेनामी
नहीं कुछ भीतर ,
लिये उदासी
हो रहा समापन ।
कोई न जाने
वह चुप्पी का दंश,
खूब रुलाए
साँसों पर बन्धन ।
सपने खोए
ज्यों गर्म तवे पर
थे आँसू बोए
किया सब तर्पण ।
कहाँ कन्हैया ?
गुम कहाँ बाँसुरी
भटके राधा
शापित वृन्दावन ।

मज़बूरी जो
हम वह भी जाने
व्याकुलता से
भरे, नयन करें
दु:ख का आचमन ।
-0-
*चोका की अधिक जानकारी के लिए हिन्दी हाइकु देखिएगा । 


Saturday, May 28, 2011

व्यंग्य–दोहे


रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1
मन में कपट -कटार है, मुख पर है मुस्कान ।
गलीगली में डोलते, ऐसे  ही  इंसान ।।
2
नफ़रत सींची रातदिन , खेला नंगा खेल ।
आग लगाकर डालते, खुद ही उस पर तेल ।।
3
जनता का जीना हुआ, दो पल भी दुश्वार ।
गर्दन उनके हाथ में, जिनके हाथ कटार ।।
4
ऊँची ऊँची कुर्सियॉं, लिपटे काले नाग ।
डॅंसने पर बचना नहीं, भाग सके तो भाग ।।
5
रातअँधेरी घिर गई, मुश्किल इसकी भोर ।
भाग्य विधाता बन गए, डाकूलम्पटचोर ।।
6
गुंडों के बल पर चला , राजनीति का खेल ।
भले आदमी रो रहे,   ऐसी पड़ी नकेल ।।
7
बनी द्रौपदी चीखती,अपनी जनता आज ।
दौर दुशासन का चला, कौन बचाए लाज ।।
8
अफसरअजगर दो खड़े , काको लागौ पाँय ।
बलिहारी अजगर तुम्हें ,अफ़सर दियो बताय ।।
9
बाती कौए , ले उड़े , चील पी गई तेल ।
बाज देश में खेलते , लुकाछिपी का खेल ।।
10
बिना खाद पानी बढ़ा, नभ तक भ्रष्टाचार ।
सदाचार का खोदकर, फेंका खरपतवार ।।
11
जनता की गर्दन सहे, झटका और हलाल ।
जन सेवक जी खा रहे, रोजरोज तर माल ।।
12
छल करने का लग सके, जरा न तन पर दाग ।
आस्तीन में रहा करो, बनकर काला नाग ।।
13
मित्रों में हमने लिखा, जबसे उनका नाम ।
धोखा खाने का किया , खुद एक इन्तजाम ।।



Monday, May 23, 2011

गॉव की चिट्ठी:दोहे


    रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
भीगे राधा के नयन, तिरते कई सवाल ।
 कभी न ऊधौ पूछता , ब्रज में आकर हाल ।।

  चिट्ठी अब आती नहीं, रोज सोचता बाप
  जबजब दिखता डाकिया , और बढ़े संताप ।।

रहरहकर के कॉपते, माँ के बूढ़े हाथ ।
 बूढ़ा पीपल ही बचा, अब देने को साथ ।।

बहिन द्वार पर है खड़ी,रोज देखती बाट ।
 लौटी नौकाएँ सभी, छोड़छोड़कर घाट ।।

   आँगन गुमसुम है पड़ा , द्वार गली सब मौन ।
    सन्नाटा कहने लगा , अब लौटेगा कौन ।।

  नगर लुटेरे हो गए, सगे लिये सब छीन ।
 रिश्ते सब दम तोड़ते,जैसे जल बिन मीन ।।

     रोज काटती जा रही,सुधियों की तलवार।
     छीन लिया परदेस ने , प्यारभरा परिवार ।।

       वह नदिया में तैरना, घनी नीम की छाँव ।
      रोज रुलाता है मुझे सपने तक में गाँव ।।

 हरियाली पहने हुए,खेत देखते राह ।
 मुझे शहर में ले गया, पेट पकड़कर बाँह ।।

डबडब आँसू हैं भरे, नैन बनी चौपाल ।
किस्से बाबा के सभी, बन बैठे बैताल ।।

  बँधा मुकद्दर गाँव का, पटवारी के हाथ ।
  दारू मुर्गे के बिना, तनिक न सुनता बात ।।
-0-

Tuesday, May 17, 2011

उजाले की किरनें


लाडो बिटिया जो आज के दिन दुनिया में आई थी ।

शब्दों के उजाले की किरनें  धरती पर जगाई थी ॥

इस दुनिया ने था जाना उसे हर-दीप के नाम से  ।

हमने तो उसमें सगी बहन की पाक सूरत पाई थी ॥

आज के दिन कहता है दिल -तू ऐसा उजाला बने ।

रौशन हो सारा यह जग ,रोज हर पल दिवाली मने॥                                         आज डॉ हरदीप कौर सन्धु का जन्म दिन है ।इस अवसर पर  इनका पंजाबी ब्लॉग http://punjabivehda.wordpress.com/2011/05/17/ਧੀਆਂ-ਧਿਆਣ
और हिन्दी ब्लॉग http://shabdonkaujala.blogspot.com/2011/05/blog-post_17.html भी देखिए ।
असीम शुभ कामनाओं के साथ
काम्बोज

Friday, May 13, 2011

अवधी हाइकु:रूपान्तर- रचना श्रीवास्तव



1-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
रूपान्तर : रचना श्रीवास्तव

1
दैईके नेह
दिन रात पीर  कै
फसल काटे 
2
बुढाय गये
लुटाय दिन्ह सब
कछु न पाये
3
बेटवा रहे 
करेजा के टुकरा
भुलाय गये
4
दै कै अमृत
सीचिस कुल रिस्ता
पईस विस 
5
मईया  याद
मन्दिर कै   दियवा
जरे हमेसा 
6
खेतवा हसें
दुरिया कै  तलक
खुस सीवान
7
मस्ताने खेत
मुडिया  कै  डुलावें
पाक  बालियाँ
8
काटे फसल
नाचत  जवनवा
बाजत  चंग
9
चन्दा रतियाँ
 गावें  खलिहनवा
सुने  गनवा
10
ढोल कै थाप
भाँगड़वा  कै जोस 
बंहियाँ डोले
11
चुकाई काव
जौउन तू दिहऔ
हम लिहन
12
तोहार हँसी 
भिगाय दे हमरा
मनवा
-प्रान
13
गीली अँखियाँ
लौउटाये दे चैन
मीठ बतियाँ
14
रिस्तों कै डोर
परेम मा लिपटी
उज्जर भोर
15
कल्हियां मिले
पहिचानल लागे
नीक विचार
16
तुहीं जोडैव   
पवितर हृदय
कै, नीक रिश्ता
17
आज कै दिन
ईश्वर दिहिन ज्यों
सरग राज
 
-0-
2- सुधा गुप्ता के हाइकु
रूपान्तर : रचना श्रीवास्तव
1
पेड़वा बान्धे
फुलवा केरी डार
लागे बारात
2
अमवा  पात
तपत लोहवा - सा
उकसावत 
3
किसोरी डार
किसलय लपेट
सरम लाग
4
फुलवा टोपी
हरियाली कै कुर्ता
दुल्हा वसन्त
5
फुलवा भरी
अनरवा कै झारी
लज्जा निहुरी
6
मीठ कै बोली
नाचत  बयार  मा
बुलबुल कै
7
चेरी पेड़वा
गुलाबी फुलवा से
खूबय सजा
8
भभक गैय
बुरूँश-फुनगी पै
चिनगारियाँ
9
चनार -पात
कहाँ पाईस आग    
बतावा जरा
10
दियवा लागे
घटिया मा खिलत
डैफ़ोडिल  हैं
11
बोगनबिला
के मरोरिस गार
कउन मिला
12
फूटी कोंपल
अंजीर कै पेडवा
कूका ‘बसन्ता’-
13
नाचत हवा
बजावत डफली
प्रेमी महुआ
14
बसौउडा मा 
बौरान  हवईया
 मारत सीटी
15
फुलवा  राखी
कलाई मा सजाये
खुस बसन्त
16
अमवा डारी
कोयलिया गावत
आग लगावे
-0-
बसौउडा=बाँसों के वन
-0-
3-डॉ हरदीप सन्धु
रूपान्तर : रचना श्रीवास्तव

1
तडपी हम
जैईसन मछरी
तोहरे बिना
2
मिलै बुंदिया
तोहरे पियर कै
अचरा भरी
3
जिन्नगी भर
बनयो परछाई
दुःख -सुख मा
4
सपनवा मा
भी, गरवा लगाऊँ
अपनन का
5
कँटवा बोये
उनहूँ  माफ़ करा
गरवा लगा
6
पियार नाही
पनिया बुलबुला
फुटि जो जाये
7
हिलत  नाही
जडिया पियार कै
तुफन्वा आवे
8
दरद  भगा
सीच दिहौ  पिरेम
से, जीवनवा
9
दुःख -दरद
पिरेम दवईया
कष्ट मिटावे 
10
मन मा आसा
पिघलन जो लागी
मोम जैसन
11
गलती भई
जीवन कै किनारा
बन ना पाईस 
12
दिलवा टूटे
तो आपन इच्छा के
मरे न दिहौ
-0-