Monday, March 28, 2011

जाएँगे हम


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
वश जो चले
चाहेगा कौन जीना
ज़हर पीना
2
जीवन-वन
भटकता ही रहा
चोटिल मन
3
सारे वसन्त
ले गया घर-द्वार
मिली दुत्कार
4
जाने नहीं ये
पाषाण का नगर
घाव हैं कहाँ?
5
अभागे हम
झुलसने पर भी
न भागे हम
6
मौत ने नहीं
अपनों ने सदा ही
मारा मुझको
7









अमृत-घट
जो पिलाने थे आए 
सभी लौटाए
8
ज़ुबान खोलें
जमा जितना विष
मन में घोलें
9
जाएँगे हम
ढूँढ़ो जो रोकर भी
लौटेंगे नहीं
10
ढूँढ़ा था घर
मिला था काँटों का
हमें बिस्तर
-0-


Sunday, March 20, 2011

तुमने कहा था



रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

तुमने कहा था-
मत भेजना मुझे कोई पाती
पाती की भाषा
किसी को नहीं  सुहाती;
क्योंकि तुम्हारे शब्द
पोंछ देते हैं मेरी सारी उदासी
बिना तुम्हारे शब्दों का आचमन किए
मैं रह जाती हूँ नितान्त प्यासी
लोगों को मेरा प्यासा मरना
बहुत सुहाता है,
जीने से नहीं ,
ज़्यादातर का मेरे मरने से
विशेष नाता है ।
तुम्हारे शब्द छुप जाते हैं
मेरे आँचल में
और बन जाते हैं सुरभित फूल
यह सौरभ बहुतों को नहीं रुचता
लोग चाहते हैं  कि
मेरे आँचल को काँटों से भर दें
और मुझे लहूलुहान होने के लिए
मज़बूर कर दें ।
हर लेते तुम्हारे शब्द
शीतल बयार बनकर
मेरे तन-मन की थकान
मुझे लगने लगता है जीवन
थार के बीच में मरूद्यान,
वे चाहते हैं -
भावनाओं के  प्रदूषण  में
मेरा  दम घुट जाए
 भावों का ख़ज़ाना जो मेरे पास है
सरे राह लुट जाए ।”
पाती न भेजने की तुम्हारी बात
मन मसोस कर मानी
व्याकुलता बढ़ी तो
तुम्हारे द्वार पर आया
होले से तुमको पुकारा -
“मैं आया हूँ यह जानने कि
तुम  अब कैसी हो
कैसा महसूस करती हो
अँधेरों में खुश हो और
उजालों से डरती हो ?”
“अरे तुम आ गए !
तुम्हारी वाणी का एक -एक शब्द
मेरी थकान हरता है
मेरे रोम -रोम से होकर
दिल में उतरता है
तुम्हारी आवाज़ से
मैं जीवन पा जाती हूँ
खुशियों की वादियों में
दूर कहीं खो जाती हूँ ;
मैं चाहती हूँ कि मरने से पहले
एक बार तुम्हें देखूँ !”
“द्वार तो खोलो”-मैंने कहा -
यह तो तुम्हारे वश में है,
मैं बाहर घिरते तूफ़ान में
बरसों से तुम्हारे द्वार पर खड़ा हूँ,
तुम्हें एक बार निहारने भर के लिए।”
वह हँसी ,आँसुओं में डूबी हुई हँसी-
अपने मन का द्वार
मैंने आज तक बन्द नहीं किया
ध्यान से देखो, द्वार भीतर से नहीं
बाहर से बन्द है
मैं अभिशप्त हूँ -
न मैं बाहर जा सकती  हूँ
न किसी को बुला सकती हूँ।
बस मेरे लिए इतना करना-
मेरे द्वार पर आकर
 अपनी शुभकामनाओं के
 दीप मत धरना ।
इस शहर को आप जैसों से
अनजाना डर है,
इसीलिए है अर्गला बन्द,
दिमाग़ बन्द , दिल संकुचित
नज़रिया सामन्ती ,चाल अवसरवादी !
मेरा सुख यहाँ सबसे बड़ा दुख है ,
सबको चुभता है ,
दिल में बर्छी -सा खुभता है !
मेरे सहचर ! मेरे बन्धु !! मेरे  चिर हितैषी !!!
लौट जाओ तुम ,जैसे लौट जाती है
सूरज की रौशनी शाम को !
लौट जाता है  जैसे सौभाग्य
अभागों के बन्द द्वार से।
और लौटा लो अपने ये
अपनत्व- भरे सम्बोधन-
मेरे सहचर ! मेरे बन्धु !!
मेरे  चिर हितैषी !!!”
मैं ब यह पूछता हूँ -
सब पर लग चुकी बन्दिश
अब मैं क्या करूँ ?
साँसों के बिना घुटकर
रोज़ मरूँ ?
कैसे जानूँ तुम्हारा दुख ?
कैसे समझूँ तुम्हारी हूक
कैसे पहुँचाऊँ शब्दों के बिना,
अपनी आवाज़ के बिना
तुम्हें सुख ?
बस बचा है मेरे पास केवल सोचना -
सदैव तुम्हारा हित ,
कल्पनाओं में  पोंछना तुम्हारे आँसू
ज्वर से तपते तुम्हारे माथे का स्पर्श
और फिर नितान्त एकाकी कोने में छुपकर
दबे स्वर में  खुद रो पड़ना
अपनी विवशता पर
अपने ही उर में कील की तरह गड़ना !
मेरे प्रिय ,मेरे सहचर ,मेरे बन्धु !
मेरे परम आत्मीय !
कभी समय मिले तो
मेरा कुसूर बताना
क्योंकि मैं कुछ भी बन जाऊँ
पाषाण नही बन सकता
अपने किसी सुख के लिए
किसी के आँगन में बाग़ लगा सकता हूँ
आग नहीं लगा सकता  ।

19 मार्च ,2011





Saturday, March 19, 2011

जन्मदिन की शुभकामनाएँ


आज 'हिमांशु जी ' का जन्मदिन है | मेरे  सन्धु परिवार और  हमारे ब्लॉग परिवार की तरफ़ से भी आदरणीय 'हिमांशु जी' को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ ....

 क्या हुआ 'गर हो गए हम बड़े
क्या हुआ 'गर काम -काज में उलझे
जब भी यह दिन डाले फेरा
महक उठे घर -आँगन तेरा

कोई तो जन्म दिन मनाए मेरा
जी तो चाहता ही होगा आज तेरा
आओ मिलकर हम आज सारे

बिन मोमबत्तियों को फूंक मारे
बिन केक और बिन गुब्बारे
मिल बैठकर कुछ बात चलाएँ
और आपका जन्म दिन मनाएँ !
   

हरदीप कौर सन्धु (बरनाला)



Friday, March 11, 2011

द्वार से लौटा याचक


रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

द्वार से  लौटे
याचक के दर्द को
कोई लिखता नहीं
सिन्धु-सा गहरा  भी हो
पर दिखता नहीं।
कौन जानेगा-
खाली झोली निहार
वह कितना रोया होगा !
आँसू छिपाने की कोशिश में
चेहरा कितना धोया होगा !
-0-
4 फ़रवरी ,2011

Tuesday, March 8, 2011

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस



थकाने वाला सफ़र
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

8 मार्च अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस विश्व भर में मनाया जा रहा है ।महिलाएँ अबला हैं यह धारणा बाहरी तौर पर देखें तो टूट चुकी है । ज्ञान विज्ञान ,खेल का मैदान ,राजनीति का घमासान साहित्य,कला ,संगीत, समाज-सुधार,शिक्षा,व्यापार आदि सभी क्षेत्रों में महिलाओं ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है ।यह सब एक दिन में नही हो गया ,वरन् बरसों के संघर्षों का परिणाम है । लेकिन इन सबके ऊपर एक भोगवादी एवं ढोंगी पीढ़ी हावी है । रूस ,चीन, अमरीका में आज तक किसी महिला को राष्ट्रपति बनने का अवसर नहीं मिल पाया है । भारत इस मायने में सबसे आगे है ।ये ऐसी बाते हैं जिन पर हम गर्व कर सकते हैं।इसी के साथ ऐसा भी बहुत कुछ है ,जो हमें बेचैन कर सकता है।
जब शादी की बात आती है तो इस सभ्य समाज का मूर्खतम लड़का भी सुघड़ ,सुन्दर, सुशिक्षित लड़की से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाता है ।उस की क़ीमत लाखों में आँकी जाने लगती है ।तमाम ऊँची शिक्षा के बावज़ूद वह बिकने के लिए तैयार हो जाता है।जितना बड़ा पद ;उतनी ऊँची बोली। इसे कौन प्रगति का नाम देगा? इस बाज़ार में बहुत सारे आदर्शवादी अपने खोखले आदर्शों को लालच के वशीभूत होकर चर जाते हैं ।ज़रा अवसर मिलते ही भूखे बाघ की तरह नारी का शोषण करने वाले क्या कर रहें  हैं? गहराई तक जाएँ तो दिल दहलाने वाले तथ्य प्रकाश में आएँगे । कितनी ही नारियों की हूक लाज-शर्म के पर्दे में घुटकर दम तोड़ देती है ।घर-परिवार वाले भी उसका शोषण करने में पीछे नहीं रहते ।इस विषम एवं विडम्बना-भरी परिस्थिति में वह कहाँ जाए ? किसके आँचल में छुपकर अपने आँसू पोंछे ?कामकाजी महिलाओं की स्थिति तो और भी दयनीय है ।उसे रोज अवांछ्नीय अधिकारियों की नीच हरक़तों का शिकार होना पड़ता है ।
मंचों पर स्त्री की आज़ादी की वकालत करने वाले अपने घरों में कुछ और ही करते नज़र आएँगे ।सुरक्षा को लेकर औरत हमेशा डरी हुई ही मिलेगी ।संभवत स्त्री का बदलता हुआ भोगवादी रूप(नारी की आज़ादी का शायद यही अर्थ हमने समझ लिया है ।) ही इसके लिए ज़्यादा ज़िम्मेदार है ।आज़ादी का सही अर्थ है -सुरक्षा एवं सम्मान के साथ काम करने और जीने की आज़ादी,अपनी उन्नति के लिए आगे बढ़ने की आज़ादी ,अपने विचारों को प्रकट करने की आज़ादी।जिस घर और समाज में नारी दुखी रहेगी ;वह सुख की कल्पना करे तो आश्चर्य ही होगा ।
कोई क्रान्ति हो , दंगा -फ़िसाद हो, दफ़्तर की तानाशाही हो , घर की रूढ़िवादी सोच या संस्कृति हो ,  ढोंगी साधु-सन्तों के मठ या अखाड़े हों , मन्दिरों की देवदासी परम्परा हो ;सबका पहला निशाना नारी ही बनती है । साधुवेश  के छली  आवरण में छिपे कामुक  भेड़ियों का  सबसे पहला निवाला असहाय नारी ही बनती है । हम हैं कि अपनी  छद्म संस्कृति का गुणगान करते नहीं थकते हैं । उसकी भावनाओं को न के बराबर महत्त्व दिया जाता है । वह हर तरह के शिकारी का आसान शिकार बन जाती है ।उससे हर प्रकार का खिलवाड़ किया जाता है ।
कुछ अप्रिय घटित हो जाए तो उसे या तो चुप रहना पड़ता है या कदम-कदम पर अपमान का घूँट  पीना पड़ता है  । न्याय की पगडण्डियाँ भी इतनी टेढ़ी-मेढ़ी हैं कि वह उनसे गुज़रकर कभी कुछ नहीं पा सकती । अफ़सोस तो तब होता है जब जनप्रतिनिधि भी  नारी को उसके अधिकार देने के नाम पर तरह-तरह के पेंच खड़े कर देते हैं ताकि कानून बनाने वाले उसी में उलझे रहें । आखिर इन सामन्ती सोच वालों का इलाज कौन करेगा ?
जब तक नारी को हमारे समाज में सम्मानजनक स्थान नहीं मिलता , तब तक हमारी सारी प्रगति , सारे विकास केवल छलावा हैं , इससे ज़्यादा और कुछ नहीं ।
-0-

Sunday, March 6, 2011

ये निर्मम शहर


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु
1
अश्रु का घर
ये निर्मम शहर
मत ठहर ।
2
मानव कम
धनपशु अधिक
बाँटें ज़हर ।
3
धूल बरसे
खुश ताज़ा हवा को
प्राण तरसें
4
बादलों से न
बरसता है जल
अम्ल बरसे
5
बिखरा विष
रसायनों का यहाँ
बना कहर ।
6
बाँझ धरती
यहाँ दम तोड़ती
रोज़ मरती
7
घूमे कुरूप
बेहया नग्न भूप
आठों पहर
8
मरे गरीब
भूख से या कर्ज़ से
हुए बेघर
9
नभ ऊपर
फुटपाथ बिस्तर
गुम ईश्वर
10
चौराहों पर
घूमता साँड जैसा
बेख़ौफ़ डर
11
घूमे दलाल
जो जहाँ मिल जाए
करें हलाल
12
दुराचार ही
 इनका युग-धर्म
जीवन-सार
13
नारी-शरीर
भेड़ियों की भूख से
घायल हुए
14
आँसुओं -भरी
कोठरियाँ तड़पें
जाएँ भी कहाँ ?