Sunday, November 13, 2011

मुखौटा



रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
नेताजी को चुनाव लड़ना था। जनता पर उनका अच्छा प्रभाव न था। इसके लिए वे मुखौटा बेचने वाले की दूकान में गए। दूकानदार ने भालू, शेर, भेडिए,साधुसंन्यासी के मुखौटे उसके चेहरे पर लगाकर देखे। कोई भी मुखौटा फिट नहीं बैठा। दूकानदार और नेताजी दोनों ही परेशान।
दूकानदार को एकाएक ख्याल आया। भीतर की अँधेरी कोठरी में एक मुखौटा बरसों से उपेक्षित पड़ा था। वह मुखौटा नेताजी के चेहरे पर एकदम फिट आ गया। उसे लगाकर वे सीधे चुनावक्षेत्र में चले गए।
परिणाम घोषित हुआ। नेताजी भारी बहुमत से जीत गए। उन्होंने मुखौटा उतारकर देखा। वे स्वयं भी चौंक उठेवह इलाके के प्रसिद्ध डाकू का मुखौटा था।

11 comments:

  1. बडा गहरा कटाक्ष है।

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  2. डाकू का महिमामंडन....

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  3. सटीक बात!
    प्रभावी लघुकथा!

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  4. सटीक व्यंग्य्।

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  5. सटीक व सुपरिचित व्यंग्ंय ।

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  6. प्रभावशाली लघुकथा

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  7. बड़ा अच्छा कटाक्ष किया है आपने लघुकथा के माध्यम से...शुभकामनाएँ...

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  8. ओह तीक्ष्ण कटाक्ष... कुछ इसी भाव की रचना
    यहाँ पढ़ें

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