Friday, October 28, 2011

बँधी उन्हीं से डोर


बँधी उन्हीं से डोर
रामेश्वर काम्बोज ‘'हिमांशु'
1
मधुर-नधुर बोलें वचन ,भीतर कपट कटार ।
मौका मिलते ही करें, सदा पीठ पर वार ॥
2
वही दिया रौशन रहे, जिसमें होता तेल ।
स्नेह-भावना के बिना , कविता बनती खेल ॥
3
छल-प्रपंच के सह लिये ,अब तक अनगिन  वार  ।
कभी तोड़ पाया नहीं , हमें  कोई प्रहार ॥
4
धन-दौलत न बाँध सके, हमको अपने छोर ।
प्यार हमें जिनका मिला , बँधी उन्हीं से डोर ॥
-0-

20 comments:

  1. सभी दोहे एक से बढ़कर एक हैं|
    छल प्रपंच सहना बहुत कठिन होता है|

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  2. धन-दौलत न बाँध सके, हमको अपने छोर ।
    प्यार हमें जिनका मिला , बँधी उन्हीं से डोर ॥
    रामेश्वर कांबोज की कविता का भाव-बोध अपनी पूर्ण समग्रता में चिर शास्वत सत्य को उदघाटित करता है । सच ही कहा गया है-- प्रेम की रज्जु में वह शक्ति है कि एक बार जब कोई व्यक्ति उससे बध जाता है तो विना खीचें ही उस ओर अपने आप बढ़ते चला जाता है । इस पोस्ट पर आना बहुत ही अच्छा लगा । धन्यवाद ।

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  3. सत्य को कहते सार्थक दोहे ..

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  4. आदरणीय रामेश्वर जी ,
    ये दोहे उस दिल से निकले हैं ..जिसमें प्यार के सिवा और कुछ समा ही नहीं सकता | ऐसा हृदय जिस ने कभी नफरत करना सीखा ही नहीं | एक बात सीखी ...वो है बाँटना ....चाहे ज्ञान हो या मोह - मोहब्बत ....लेकिन एक बात है ये ज्ञान या प्यार ये अमृत बूंदें .... वही हासिल कर सकता है जो अपनी ' मैं' को अपने साथ न लेकर आया हो |
    आपकी कलम को नमन !
    हरदीप

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  5. सुन्दर व अर्थपूर्ण दोहे।

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  6. बहुत सुन्दर!
    --
    कल के चर्चा मंच पर, लिंको की है धूम।
    अपने चिट्ठे के लिए, उपवन में लो घूम।

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  7. जग-जीवन की सच्चाई को समेटे ये दोहे क्या नहीं कह जाते हैं। भाई साहब, आपके इन दोहों ने एकबार फिर मेरे अन्तस को छू लिया है…

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  8. खुबसूरत दोहे प्रभावशाली कथ्य ....शुक्रिया जी /

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  9. बहुत सुन्दर व प्रभावशाली दोहे।

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  10. प्यार हमें जिनका मिला , बँधी उन्हीं से डोर ॥

    बहुत सुन्दर दोहे|

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  11. सुन्दर और सार्थक दोहे..

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  12. बहुत ही मनभावन दोहे ... अति उत्तम .... मज़ा आ गया पढ़ के ...

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  13. ‘जीवन के यह सार हैं, दोहे उच्च अनुपम
    चन्दा जैसे रात का, हर लेता सभी तम.”
    सुन्दर दोहे...
    सादर...

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  14. मधुर-नधुर बोलें वचन ,भीतर कपट कटार ।
    मौका मिलते ही करें, सदा पीठ पर वार ॥
    Aaj ki paristithi men ekdam sach ko ko ujagar karta hai ye doha...

    धन-दौलत न बाँध सके, हमको अपने छोर ।
    प्यार हमें जिनका मिला , बँधी उन्हीं से डोर ॥

    Ye aapke pavitr dil ki aavaj hai...aapka nisavarth apnapan hi hai jo logon ko aapki or aakarshit karta hai varna to sage riston men bhi log bas daulat ko hi pujte hain...jitni prasansha ki jaye kam hai...hardik badhai...

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  15. अपनेपन से पगी हर टिप्पणी के लिए बहुत आभार !
    रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

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  16. धन-दौलत न बाँध सके, हमको अपने छोर ।
    प्यार हमें जिनका मिला , बँधी उन्हीं से डोर ॥
    सभी दोहे एक से बढ कर एक। बधाई।

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  17. जिस कविता में स्नेह भावना नहीं , वह सिर्फ खेल ...
    धन दौलत पर चढ़ती नहीं निश्छल रिश्तों की बेल ...
    सुन्दर अभिव्यक्ति !

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  18. sabhi dohe bahut arthpurn. satya hai...

    धन-दौलत न बाँध सके, हमको अपने छोर ।
    प्यार हमें जिनका मिला , बँधी उन्हीं से डोर ॥

    bahut aabhar.

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  19. मधुर-नधुर बोलें वचन ,भीतर कपट कटार ।

    मौका मिलते ही करें, सदा पीठ पर वार

    यही तो आज कल की रीत है...लेकिन इन सब के बीच भी निस्वार्थ भाव और निश्छल ह्रदय आज भी है .. उसी के दम पर तो यह दुनिया कायम है... बुराई चाहे जितनी बड़ी क्यों न हो... अच्छाई को ख़त्म नहीं कर सकती.

    सादर

    मंजु

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