Wednesday, October 19, 2011

धरती मिली (चोका)


धरती मिली
गगन से जब भी
पुलक उठी
क्षितिज हरषाया .
बदली मिली
पहाड़ों के गले
बरस गई
सावन लहराया.
ओ मेरे मीत !
मिलना तेरा मेरा
मिले हैं जैसे
नदिया का किनारा
मन क्यों घबराया ?
-0- 
'कमला'

18 comments:

  1. पूरा चोका ही मर्मस्पर्शी है , लेकिन ये पंक्तियाँ तो लाज़वाब हैं और उत्तम काव्य का उदाहरण हैं-
    बदली मिली
    पहाडों के गले से
    बरस गई
    सावन लहराया.

    ओ मेरे मीत !
    मिलना तेरा -मेरा
    मिले हैं जैसे
    नदिया का किनारा .
    -मेरी हार्दिक बधाई , उत्कृष्ट साहिय -सर्जन के लिए कमला जी ।

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  2. बहुत भावपूर्ण, हृदयस्पर्शी और उत्कृष्ट चोका...मेरी बधाई|

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  3. बहुत सुन्दर चोका... धरती से गगन का मिलना, पहाड़ों से बदली का गले मिलना.. और सुख का बरस जाना अत्यन्त सुन्दर कल्पना... बहुत बहुत बधाई कमला जी !

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  5. बहुत ही सुंदर ...कुदरत के जरिये से भावनापूर्ण मिलन को दर्शाना ...बधाई...

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  6. बदली मिली

    पहाडों के गले

    बरस गई

    सावन लहराया.
    bahut khub lage ye bhaav bahut achha manviykaran..

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  7. bahut sundar komal bhaavpurn abhivyakti. Kamla ji ko badhai.

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  8. कोमल एहसास के साथ बहुत ख़ूबसूरत चोका! शानदार प्रस्तुती!

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  9. यह हर्षमिश्रित घबराना है।

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  10. bahut sunder prstuti...............badhai
    saadr,
    amita kaundal

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  11. Bahut bhaopoorna aur marm sparshi choka. Bahut badhai

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  12. ओ मेरे मीत

    मिलना तेरा मेरा

    मिले हैं जैसे

    नदिया का किनारा .
    हृदयस्पर्शी.

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  13. शब्दों की सुन्दर कारीगरी

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  14. प्रकृति के माध्यम से प्रेम की बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति है...सुन्दर...।
    मेरी बधाई...।

    प्रियंका

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  15. बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण अभिव्यक्ति ....


    कमला जी को बधाई |

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  16. prakriti ka chitran behad achha laga..
    Deepawali kee haardik shubhkamnayen!!

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  17. कमाल का चोका है कमला जी का

    उमेश मोहन धवन, 13/134, कानपुर

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