Tuesday, October 4, 2011

कँटीली शय्या(चोका)


 रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

 अरी अभागी
तू जब-जब जागी
गर्म छड़ों से
तभी गई थी दाग़ी
आँसू पोटली
आँगन में बिखरी
पाहन बनी
तनिक न बिफरी
कोई न आया
तब तुझे बचाने
ढाढ़स देने
न यम न देवता
आहत किया
जब देकर तानें
पीर समेटी
गर्म आँसू थे छाने
झोली भरके
अरी तूने कोकिला
तुझे जग का
था दु:ख-दर्द मिला
प्यार क्या होता
कब तुमने जाना
सिर्फ़ पढ़ा था
कभी कथा-गीत मे
लिखी भाग में
सदा कँटीली शय्या
शर का सिरहाना
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12 comments:

  1. बहुत मार्मिक...सीधे दिल को बेध गया यह चोका...निःशब्द छोड़ गया...।

    प्रियंका

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  2. रचना अच्छी है. फोटो भी रचना के अनरूप हैं.

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  3. मोरा दरद न जाने कोय।

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  4. rachna ke ek ek shbad dil mein chubhte chale gaye. jaane kyon kabhi kabhi peeda ki abhivyakti padhkar man ko sukoon milta hai jaise kisi ki avyakt vyathaa ko shabd mile aur usey raahat mili ho. bahut bahut dhanyawaad aur shubhkaamnaayen Kamboj bhai.

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  5. रामेश्वर जी ,
    आंसू पोटली ....एक नया प्रयोग है !
    कितना दर्द भरा है ........उफ !
    किसी के दिल की पीडा शब्द बन इस चोके में उतर आई है |
    शब्दों की पहुंच से परे की बात दिल को छू गई !
    हरदीप

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  6. इस चोका में जो दर्द भरे भाव छुपे हैं उसे तो सिर्फ आप ही शब्दों में बाँध सकते थे,सर|
    इस पर टिप्पणी देने के लिए कोई शब्द ही नहीं जुट रहे...
    सादर
    ऋता

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  7. बहुत बेहतरीन चोका है। इसका एक-एक शब्द मन को गहरे तक छू गया...और क्या कहूँ। मेरी हार्दिक बधाई...।
    मानी

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  8. nari pida ko bahut sunderta se samjha hai aapne aur shdon ka sanyojan ka to kya kahna
    bahut bahutu badhai
    saader
    rachana

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  9. बहुत पसंद आईं...

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  10. dard ki puri hi nadi umad padi hai ismen ...
    आँसू पोटली
    आँगन में बिखरी
    पाहन बनी
    तनिक न बिफरी...in panktiyon ke to javab nahi ...kal bhi sabse pahle tipanni ki na jane kahana chali gayi...

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  11. बहुत बढ़िया लिखा है आपने! भावपूर्ण चोका ! हर एक शब्द दिल को छू गई! चित्र भी बहुत सुन्दर लगा! लाजवाब प्रस्तुती!
    आपको एवं आपके परिवार को दशहरे की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें !

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  12. Himanshu ji
    jitni bar padho utni bar apke seedhe saral shabd jehan me utar jate hai.

    madhu tripathiMM

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