Monday, August 29, 2011

गीली चादर (चोका)


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
दु;ख में ओढ़ी
थे रोए अकेले में,
सुख में छोड़ी
भटके  थे मेले में ।
नहीं समेटी
सिर सदा  लपेटी
अनुतापों की
भारी भरकम  ये
गीली चादर ।
मीरा ने ओढ़ी
था पिया हलाहल
हार न मानी,
ओढ़ कबीरा
लेकर  इकतारा
लगे थे गाने-
ढाई आखर प्रेम का
काटें बन्धन
किया मन चन्द
शुभ कर्मों से ,
है घट-घ वासी 
वो अविनाशी
रमा कण -कण में
कहीं न ढूँढ़ो
ढूँढो केवल उसे
सच्चे मन में
वो मिले न वन में
नहीं मिलता
 तीरथ के जल में,
पटी जीवन में ।

16 comments:

  1. मन को छूती हुई ...बहुत सुंदर ज्ञानवर्धक रचना ...
    आभार.

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  2. सच्चे मन से ईश्वर को ढूंढने का प्रयास ....बहुत काम लोगो को प्राप्त होता है

    anu

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  3. है घट-घट वासी
    वो अविनाशी
    रमा कण -कण में
    कहीं न ढूँढ़ो
    ढूँढो केवल उसे
    सच्चे मन में
    दार्शनिकता का भाव लिए यह बिल्कुल सही सन्देश है|
    ईश्वर और शांति दोनों मन के ही अन्दर होते हैं जिसे हम समझ नहीं पाते|
    अच्छी रचना के लिए धन्यवाद|

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  4. सूफियाना भाव लिए बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना....

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  5. प्रेम चदरिया ओढ़ी हम ने।

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  6. नहीं मिलता
    तीरथ के जल में,
    कपटी जीवन में ।
    sunder bhav .aap to har vidha ke guru hai aur ek guru ko me kya likhun.haiku taka .choka kuchh bhi yo koi bhi vishya ho aap jab likhte hain hain bhav bolte hain aur shabd khud arth ban jate hain
    saader
    rachana

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  7. कहीं न ढूँढ़ो
    ढूँढो केवल उसे
    सच्चे मन में...sach ko ujagar karti rachna...or sachha man mushkil se milta hai...agar mil jaye to pahchaananaa mushkil hai...bahut bahut badhai...

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  8. गहरे भाव के साथ बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने जिसके बारे में जितना भी कहा जाए कम है! हर एक शब्द दिल को छू गई! आज के ज़माने में सच्चा और दिल से प्यार करनेवाला इंसान बहुत कम मिलता है! इश्वर ने हम सबको एक समान बनाया है पर कुछ लोग सच्चे और इमानदार होते हैं तो कुछ लोग बुरे होते हैं!

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  9. daarshanik rachnaaye. saargarbhit shabd...
    दु;ख में ओढ़ी
    थे रोए अकेले में,
    सुख में छोड़ी
    भटके थे मेले में ।

    pahli baar is vidha ki rachna padhi, bahut achchha laga, shubhkaamnaayen.

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  10. कहीं न ढूँढ़ो
    ढूँढो केवल उसे
    सच्चे मन में
    वो मिले न वन में
    नहीं मिलता
    तीरथ के जल में,
    कपटी जीवन में ।

    बहुत सुंदर लिखा है बधाई.
    सादर
    अमिता कौंडल

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  11. दुःख में सुमिरन सब करें ,सुख में करे न कोय
    जो सुख में सुमिरन करे ,दुःख काहे को होय |
    कबीर का यह दोहा याद आ गया आपकी पंक्तिया पढ़ कर ....
    दु;ख में ओढ़ी
    थे रोए अकेले में,
    सुख में छोड़ी
    भटके थे मेले में ।
    सहजता से आपने दार्शनिक बात समझा दी है ....सुन्दर रचना के लिए बधाई ....

    डा. रमा द्विवेदी

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  12. बहुत ही दर्द भरा चोका है .... सहजता से दार्शनिक बात समझाता हुआ ..
    दिल की गहराई से लिखा है !

    हरदीप

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  13. दुःख में ओढ़ी, सुख में छोड़ी, नहीं समेटी, अनुतापों की गीली चादर ...

    जिन्होंने सच्ची भक्ति की उन सबने ओढ़ी चाहे मीरा हों या कबीर .. सही एवं सार्थक सन्देश... ईश्वर को ढूंढना है तो निश्छल भाव से मन में ढूंढो वहीँ मिलेंगे, इधर उधर भटकने की कोई आवश्यकता नहीं है. बहुत सुन्दर रचना..

    सादर,
    मंजु

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  14. बहुत खूबसूरत चोका ।

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